वाल्मीकि रामायण

तथा

आयुर्वेद

डॉ. प्रेरणा माथुर प्राच्य संस्कृत विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ

पीयूष प्रकाशन

दिल्‍ली-0094

॥58९ सर्वाधिकार प्रकाशक

संस्करण

978-8-88622-20-6

लेखिका

पीयूष प्रकाशन

ए-40 कबीर नगर, गली नं.-8 शाहदरा, दिलली-0094

202

500.00

शिवानी आर्ट प्रेस, वेस्ट गोरख पार्क शाहदरा, दिल्ली-0032

समर्पण

परमपूजनीय पिताश्री आचार्य मुक्तेश माथुर तथा माता श्रीमती चन्द्रकान्ति माथुर

प्रेरणा

दूरभाष : का. 223925॥

डॉ. राकेशधर त्रिपाठी मंत्री सी. एच. नं. : 3279

मंत्री

उच्च शिक्षा, उ.प्र. विधान भवन : लखनऊ

“सन्देश”

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि आप द्वारा रचित पुस्तक “वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद” का प्रकाशन किया जा रहा है। जिसमें सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं आदि काल से ही “आयुर्वेद” का अमूल योगदान समाज के व्यक्तियों के स्वस्थता के विकास में अग्रणी रहा है।

आप द्वारा रचित इस पुस्तक में अन्य विशिष्ट विषयों पर विद्वत्तापूर्ण आलेख निश्चित रूप से योग के महत्व को चरितार्थ करेगी। यह निर्विवाद है कि आयुर्वेद समाज की आदि-आदि काल से सेवा करता रहा है। आपके अतुलनीय सहयोग से लोगों को प्राचीन काल में प्रचलित आयुर्वेदिक पद्धति. से परिचित कराने में उपयोगी सिद्ध होगी। यह पुस्तक समाज के लिये उन्नति एवं प्रगति के नये आयाम उपलब्ध कराते हुए उन्हें भविष्य में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी।

मैं पुस्तक के सफल प्रकाशन की कामना करता हूँ।

डॉ. राकेशधर त्रिपाठी डॉ. प्रेरणा माथुर, प्रवक्‍ता, प्राच्य संस्कृत विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ उत्तर प्रदेश

ज््कः

प्रो. राजेन्द्र मिश्र दूरलेख : “श्रुतम्‌'

पूर्व - कुलपति कार्यालय : (0542) 2204089

सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय (0542) 220423

खवाराणसी-22002 निवास : (0452) 220667 (

: (0452) 2207457 फैक्स : (0452) 220667 छिनाक्षों: ४९०5५५५_शा5६)$89/क्षावाल,ी

नान्दीवाक्‌

संस्कृत कविता का जन्म प्रकृति की गोद में हुआ, यह मेरी दृढ़ आस्था है। दार्शनिक पदावली में कहूँ तो कविप्रतिभा कविता का यदि निमित्त कारण है तो प्रकृति उसका 'अपादान कारण”। इस सत्य के दर्शन हमें वेदमंत्रों में ही होते हैं जब उपषस्‌-सूक्त में ऋषि उषा के विलक्षण-सौन्दर्य को नाना प्रतिमानों एवं अप्रस्तुत विधानों से आँकता है। सुन्दरी उषा का अनुगमन करता तरुण सूर्य उसे वरमण्डप का 'दूल्हा' दिखाई पड़ता है। मण्ड्कसुक्त में वर्षागम से आहलादित टरटराते मेढक उसे वेदपाठी से प्रतीत होते हैं।

प्रकृति-रस से अभिषिक्त यह कविता आर्षकाब्यों में पहुँचते ही पूर्ण समरस हो उठती है निसर्ग से। संस्कृत के अदिकाव्य रामायण में तो प्रकृति जड़ता का कब्चुक उतार, पूर्ण चेतन बन जाती है। महर्षि वाल्मीकि को लाल रंग वाली, आकाश से विलीन होती तथा समदित-तारका संध्या एक सुन्दरी नायिका सीही परिलक्षित होती है जो नायक के रुंस्पर्शमात्र से पुलकित एवं शिधिलवसना हो उठती है-

चब्चच्चन्द्रकरस्पर्शा हर्षोन्मीलिततारका।

अहो रागवती सन्ध्या जहाति स्वयमम्बरम्‌ ।।

वाल्मीकि-कविता में कन्दलित प्रकृति की यहीं नित्वचेतना”

8 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

महाकवि कालिदास के कवित्व का आभूषण बन जाती है।

डॉ. प्रेरणा माथुर ने वाल्मीकिरामयण में निहित आयुर्वेदिक सामग्री को केन्द्र में रखकर विगत शताब्दी के अन्तिम दशक (994 ई.) में एक प्रशंसनीय शोधकार्य सम्पन्न किया था जिसके अवलोकन का अवसर मुझे प्राप्त हुआ था। आज यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि विदुषी अनुसन्धात्री का वह शोधश्रम ग्रन्थरूप में प्रकाशित हो रहा है। अतिशय विलम्ब से निर्व्यूढ इस सारस्वत उपक्रम का मैं हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ तथा डॉ. प्रेरणा माथुर को साधुवाद एवं आशीः प्रदान करता हूँ।

वाल्मीकि रामायण लौकिक संस्कृत-कविता का उत्स है। वह रामकथा की प्रस्तुति के बहाने, भारत राष्ट्र की समूची आध्यात्मिक आधिदैविक एवं अधिभीतिक उपलब्धियों को समेट कर, आगे प्रवृत्त होता है। अरण्य में बिखरी प्रकृति रामायण में मात्र उद्दीपन-विभाव के रूप में टहीं प्रत्यत “अलड्कार्य” के रूप में, आंलम्बन के भी रूप में अवतीर्ण होती है" आर, *क वैशिष्ट्य तो उस अनेकान्त प्रकृति का मात्र एक 'अन्त' (पक्ष ०556) मूग जा “कता है।

डॉ. प्रेरणा माथुर त्ण यह प्रष्ट जिस दृष्टि से लिखा गया है, उसकी उपादेयता, प्रासंगिकता 7”प युफ्धर्णिटा को कथमपि नकारा नहीं जा सकता। हमारे चारों ओर बिखरी एक्रति ऐें कित्तना 'जीवनामृत” भरा है यह आयुर्वेद बताता है। उस भूले-बिसरे अग्युर्देद ल्‍्मी नये सिरे से प्राणप्रतिष्ठा में आज राष्ट्र के अनेक मनीषी दत्तचित्त हैं। ऐप स्थिति पें विदुधी लेखिका का प्रकाशन एक “सन्दर्भग्रंथ की प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा, यह मेरी शुभाशंसा है।

शिमला सस्नेह

24 दिसम्बर, 200 ई. अभिराज राजेन्द्र मिश्र

डॉ. सनत्कुमार शास्त्री पूर्व ऐसोसिएट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष-संस्कृत विभाग ने.मि.शि.ना. दास कॉलेज, बदायूँ पत्राचार : मारुति निलयम, विजयनगर कॉलोनी, बदायूँ-24360/उ.प्र. मो. 940428876 पुराण भारतीय साहित्य के गौरव ग्रन्थ है। बिना पुराण के अध्ययन के कोई भी व्यक्ति विचक्षण एवं शास्त्र कुशल नहीं हो सकता। पुराण तो हमारे सनातन धर्म के प्रामाणिक तथा प्राचीन ग्रन्थ हैं। वेद का उपबृंहण करने वाला पुराण इसीलिए वेद का पूरक माना जाता है। प्राचीन भारत का काल और विज्ञान, पशु तथा पक्षी विज्ञान, वनस्पति, आयुर्वेद सब एकत्र कर पुराणों में भर दिया गया है। इसका परिणाम यह है कि पुराण विश्वविद्या का कोष हैं। अग्नि, नारद, भरुड़ पुराणों की रचना ज्ञान-विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिये की गई है। पुराण जनता का ग्रन्थ है विद्वानों का नहीं। पुराण सरल भाषा में रचित ग्रन्थ है शास्त्रीय भाषा में नहीं। आजकल के पापूलर-एजूकेशन की दृष्टि इस विषय में पौराणिक दृष्टि का अनुगमन करती है। पुराण वास्तविक अर्थ-प्राचीन या पुराना है, इसमें प्राचीन कथानक, इतिहास, भूगोल, ज्ञान-विज्ञान आदि सभी प्रांचीन तत्त्वों का समवेश है, अतः इसे पुराण नाम दिया गया। प्राचीन परम्परा के प्रतिपादक ग्रन्थों को पुराण, विश्वरचना के इतिहास को भी पुराण ही कहा है। इनकी रचना काल के अन्तर्गत पुराणों की पूर्व सीमा 600 ईं. पूर्व के लगभग और अन्तिम सीमा 500 ई. के लगभग मानी जा त्तकती है। पुराणों में मुख्य काल रूप से प्रतिपाद्य विषयों का विवरण इस प्रकार मिलता है यथा-() किसी देव या देवी की उपासना एवं उसी को सबसे बड़ी शक्ति मानना तथा देवों से बड़ा मानना। (2) ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से किसी एक को इष्टदेव मानना (3) सृष्टि की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय का वर्णन करना (4) देवों, ऋषियों और महर्षियों की वंशावली तथा उनका जीवनवृत्त देना (5) प्रत्येक मनु का नाम उसका समय तथा प्रमुख घटनाएं (6) नन्द, मौर्य-शुंग, आन्ध्र और गुप्त आदि सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी राजाओं का वर्णन (7) तीर्थों, भौगोलिक स्थानों एवं तीर्थ यात्राओं का वर्णन (8) व्रत, जप, उपवास, प्रार्थना उपासना एवं विविध इष्टियों का अनुप्ठान सहित वर्णन (9) अवतारवाद, मूर्ति पूजा एयं देवी ऐशशाएँं में अतिशय श्रृद्धा की स्थापना (0) सगुणोपासना एवं भक्ति मार्ग को प्रमुखता का वर्णन (॥) दार्शनिक, धार्मिक, राजनीति एवं आचार शास्त्रीय विषयों का 0 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

विश्लेषण (2) व्याकरण, काव्यशास्त्र, ज्योतिष, शरीर-विज्ञान, आयुर्वेद आदि _ शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक विषयों से सम्बद्ध तथ्यों का संकलन। पुराणों के ग्राह्म विषयों में सर्वप्रथम धार्मिक विषय आते हैं, सनातन धर्म इनको वेदों के तुल्य ही अप्राप्त एवं प्रामाणिक मानता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, सूर्य की उपासना पद्धति का प्रमाणिक बोध पुराणों से ही ग्राह्म है। राजा परीक्षित से लेकर पद्दनन्द तक का अज्ञात इतिहास पुराणों से ही मिलता है। मौर्य वंशावली के लिये विष्णु पुराण, आन्ध्रवंशावली के लिये मत्स्य पुराण, गुप्त वंशावली के लिये वायु पुराण अत्यन्त प्रामाणिक सिद्ध हुए हैं। इनके अन्त में आभीर गर्दनभ, शक, यवन, तुषार हृण आदि राजवंशों की वंशावली इसके ऐतिहासिक महत्व को प्रकट करते हुए साहित्य के लिये ग्राह्म विषय माने जा सकते हैं। पुराणों में चतुर्दीपा वसुमती, सत्पद्वीपा वसुधा 8 द्वीप 4 भुवन, क्षीर सागर आदि भू-विभाजन, तीर्थों, समुद्रों-नदियों पर्वतों एवं भौगोलिक महत्व के स्थानों का यत्र-तत्र वर्णन मिलता है जिससे काव्यों में इनका वर्णन साहित्य श्री वृद्धि को ही प्रकट करता है। पुराणों में वर्णाश्रम के गुण-कर्म विविध संस्कार आश्रम पारिवारिक सम्बन्ध गुरु-शिष्य परम्परा एवं धर्म राजधर्म आदि का महत्वपूर्ण विवेचन पुराणों के ही ग्राह्म विषय हैं। इसके अतिरिक्त व्याकरण छन्द ज्योतिष, धर्मशास्त्र, दर्शन, आयुर्वेद शरीर-विज्ञान आदि शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक विषयों का महत्वपूर्ण विवेचन उपलब्ध है। पुराणों का एक और ग्राह्म विषय है अवतारवाद- जिसका अर्थ पुराणों में आविर्भाव का प्रयोग पाया जाता है। अवतार की बात किसी अलौकिक शक्ति से सम्पन्न व्यक्ति भगवान विष्णु, शंकर या इन्द्र आदि के लिये ही उपयुक्त मानी जाती है। कार्यवंश भगवान का बिना रूप परिवर्तन किये ही आविर्भाव होना अवतार के भीतर ही माना जाता है। पुराणों ने सभी वर्णो के लिये लोक-परलोक में आनन्द से जीवन प्राप्त करने का सबसे सुगम उपाय बतलाया है। पुराणों में प्रतिपादित एकादशी व्रत का अनुष्ठान सुखपूर्वक अल्प-धन से तथा स्वल्प क्लेश से किया जा सकता है। फल की महानता हेतु यमलोक से निवृत्ति पाने की अभिलाषा से प्रत्येक मनुष्य को यावज्जीवन एकादशी व्रत करना चाहिये। जनता के कल्याण के लिये, नाली, कूप, तालाब का खुदवाना, मन्दिर का निर्माण करना, याचकों को अन्न प्रदान करना पूर्द कहलाता है। और इसी धर्म का अनुष्ठान पुराणों के द्वारा बहुशः पतिष्ठित है। परोपकार को ही मुख्य धर्म बतलाने वाले कतिपय मुख्य दृष्टव्य एवं ग्राह्म है। पुराणों में ती्थों का महत्व एवं महिमा

का विपुल वर्णन मिलता है। तीर्थ यात्रा के पौराणिक प्रसंगों को भूगोल का पूरक मानना चाहिये किसी स्थान पर किसी विशिष्ट द्वारा की गई तपश्चर्या से परिप्रृत स्थान विशेष की संज्ञा तीर्थ है।

अतः यह सर्वविदित है कि पुराण बहुविद्या के आकर-प्रन्थ हैं। वाल्मीकिरामायण का वर्ण्य भी विविधिवर्णी है। भूगोल, राजधर्म, राजनीति, लोकनीति, समाज-धर्म पारिवारिक-दायित्व मानव-मूल्य, देव-माहात्म्य, स्वास्थ्य-रक्षा, आयुर्वेद सहित ऐसा कौन सा विषय है जो इसमें सविस्तार वर्णित हो।

मेरी अतिशय प्रिय डॉ. (श्रीमती) प्रेरणा माथुर ने कठोर श्रम करके इस ग्रन्थ का आयोजन किया है। मेरा विश्वास है कि यह ग्रन्थ भारतीय-चिकित्सा शैली एवं भारतीय चिकित्सकों का पाथेय बनेगा। इस ग्रन्थ के माध्यम से हमारी वर्षों पुरानी मान्यता “जीवेमः: शरद शतम्‌” का परिपाक हो ऐसी माँ वागेश्वरी से मैं याचना करता हूँ।

और अन्त में ग्रन्थकर्त्री डॉ. प्रेरणा माथुर को अनगिन आशीष देते हुए उनके शुभ की कामना करता हूँ।

इत्यलम्‌

दिनांक : 5-2-200 सस्नेह

डॉ. सनत्कुमार शास्त्री

2 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

छः

दो शब्द

वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

वाल्मीकि रामायण के आभ्यन्तर निर्हत आयुर्वेदिक सामग्री के मूल्यांकन का चिर- प्रतीक्षित प्रयास है। संस्कृत वाड्मय में “वाल्मीकि रामायण” का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। महाकाव्य के सभी लक्षणों के अतिरिक्त इसमें अनेक विषयों का समावेश है। “रामायण” भारतीय साहित्य का पहला महाकाव्य और विश्व साहित्य के प्राचीनतम महाकाव्यों की तुलना में भाषा भाव छन्द रचना विधान एवं रस व्यंजना सभी दृष्टियों से एक उत्कृष्ट कृति प्रमाणित हो चुकी है। यदि कवि के इस असामान्य व्यक्तित्व का परिचय “रामायण” एक ऐसी कृति है, जिसकी प्रत्येक बात, अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त हुई है। उसकी सर्वांगीण भावना का परिचय उसके कलेवर में ही परोक्ष रूप से मिलता है उसकी इस सर्वाज्लीण भावना को लक्ष्य करते हुए स्थान-स्थान पर कभी उसे “काव्य” कभी “आख्यान” कभी “गीता” और कभी “संहिता” कहकर स्मरण किया गया है।

रामायण सम्बन्धी आख्यान काव्यों की वास्तविक रचना वैदिक काल के बाद इक्ष्वाकु वंश के सूतों ने आरम्भ की। इन्हीं आख्यान काव्यों के आधार पर वाल्मीकि ने “रामायण” की रचना की इस “रामायण में अयोध्याकाण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक की कथावस्तु का वर्णन था और उसमें सिर्फ 2000 श्लोक यै।

महामुनि वाल्मीकिकृत “रामायण” के कलेवर का मूल रूप क्या था और उसमें कितने श्लोक थे, इस सम्बन्ध में प्राचीन ग्रन्थों से लेकर आधुनिक विद्वानों तक अलग-अलग स्थापनाएँ देखने को मिलती हैं। यह प्रवाद है कि वाल्मीकि मुनि ने रामायण कथा को 00 करोड़ श्लोकों में निवृत्त किया था। 'रामायण” के बाल काण्ड में रामायण” के कलेवर के सम्बन्ध में जो 500 सर्गों और 24000 श्लोकों

4 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

का उल्लेख है वह भी प्रक्षिप्त अंश होने से- विश्वास योग्य नहीं है। 'पद्मपुराण'

के शेषांश है-

ततः वर्णयामास राघवं-ग्रन्थकोटिभिः

महामुनि वाल्मीकि के नाम से उपलब्ध “रामायण” की वर्तमान प्रति सात खण्डों में एवं 24,000 श्लाकों में मिलती है। “रामायण” की जो प्राचीन हस्तलिखित प्रतियाँ उपलब्ध हुई हैं उनके साथ मिलान करने पर वर्तमान प्रति का कलेवर-विस्तार ठीक-ठीक नहीं मिलता। “रामायण” के संप्रति चार प्रामाणिक संस्करण उपलब्ध एवं प्रचलित हैं :

. औदीच्च : गुजराती प्रिंटिंग प्रेस बंबई, और निर्णय सागर प्रेस बंबई से प्रकाशित है। यह पाठ अधिक प्रचलित एवं प्रामाणिक है। इसी पर नागेश भट्ट की “रामीया व्याख्या" टीका है।

2. गौडीय : दूसरा संस्करण डॉ. जी. गोरेसियो ने 848-67 के बीच कलकत्ता संस्कृत सीरीज से प्रकाशित किया और उन्होंने ही इटेलियन में अनुवाद कर उसको पेरिस से भी प्रकाशित किया।

3. पश्चिमोत्तीय : इसको काश्मीरी संस्करण कहा जाता है, जिसका प्रकाशन 928 ई. में डी. ए. वी. कॉलेज लाहौर से हुआ। इसका प्रचलन उत्तर-पश्चिम में है।

4. दाक्षिणात्त्य : चौथा दाक्षिणात्त्य संस्करण माध्यविलास बुक डिपो कुमकोवम, मद्रास से 929-80 के बीच दो जिल्दों में प्रकाशित हुआ। बम्बई के संस्करण से यह अभिन्‍न है।

“रामायण' जैसे लोकप्रिय ग्रन्थ पर अनेक टीकाएं लिखी गयीं, जिनमें से कुछ ही सम्प्रति उपलब्ध हैं। इन टीकाओं में रामवर्मन्‌ “तिलक” टीका अधिक प्रमाणित एवं विख्यात है। रामवर्मन से पहले भी “रामायण” पर एक टीका लिखी गयी थी, जिसका नाम 'कतक' था और जिसको बड़े सम्मान के साथ उन्होंने अपनी वतिलक' टीका में उद्धृत किया है; किन्तु वह आज प्राप्त नहीं है।

इसके अतिरिक्त माहेश्वरी तीर्थ कृत “रामायण-तत्त्व-दीपिका; श्री राम कृत “अमृत-कटक; गोविन्द राज कृत “श्रृंगांर' (भूषण), रामानन्द तीर्थ-कृत “रामायण-कूट' अहोबल कृत “वाल्मीकि हृदय; अप्पय-दीक्षित कृत “रामायण-तात्पर्य संग्रह; ज्यम्बक मा्खिन कृत “धर्माकूत; विश्वनाथ कृत “वाल्मीकि-तात्पर्य तरणि:! और वरदराज मैथिल भट्ट कृत “विवेक तिलक” उल्लेखनीय टीकाएं हैं। नागेश भट्ट ने भी “रामायण” पर '“रामीया व्याख्या -नामक एक सुंदर टीका लिखी।

प्रस्तुत ग्रन्थ का आधार “वाल्मीकि रामायण” का दाक्षिणात्य संस्करण

दो शब्दू-/ 5

(औदीच्य भी वही है) है। इसी का सर्वत्र प्रचार तथा प्रामाण्य है। गीता प्रेस, . गोरखपुर का तीसरा संस्करण (सं. 2033) जो दाक्षिणात्य संस्करण तथा औदीच्य संस्करण पर पूर्णतया आधारित है, इस ग्रन्थ का प्रमुख मार्ग-दर्शक है।

“वाल्मीकि-रामायण” के सभी संस्करणों में आयुर्वेद विषयक सामग्री प्रायः समान ही है। महर्षि की दृष्टि में ज्योतिष, तन्त्र, आयुर्वेद शकुन आदि शास्त्रों की प्राचीनता एवं समीचीनता ज्ञात होती है। यथा त्रिजय्‌ के स्वप्न, श्री राम का यात्रा कालिक मुहूर्त विचार, विभीषण द्वारा लंका के अपशकानों का प्रतिपादन (लंका कांड 0 वां सर्ग) आदि ज्योतिर्विज्ञान के ज्ञापक तथा समर्थक हैं। श्री राम जब अयोध्या से चलते हैं तब नौ ग्रह एकत्र हो जाते हैं-इससे लंका युद्ध होता है। दशरथ जी श्री राम से ज्योतिषियों द्वारा अपने अनिष्ट फलादेश की बात बतलाते हैं। (अयो.4/8 )) युद्ध काण्ड 02/32-34 के श्लोकों में रावण-मरण के समय की गृह स्थिति भी ध्येय है। युद्ध काण्ड सर्ग में आयुर्वेदविज्ञान की बातें हैं। युद्ध 8 वें सर्ग तथा 65/2 से 25 श्लोक तक राजनीति है। यु. कां. 73/24-28 में तन्त्र शास्त्र की भी प्रक्रियाएँ हैं। इसमें रावण तथा मेद्यनाद को भारी तान्त्रिक दिखलाया गया है। मेद्वनाद की सब विजय तन्‍्त्र मूलक है। जब वह जीवित कृष्णछाग की बलि देता है, तब तप्तकाञ्चन के तुल्य अग्नि की दक्षिणावर्त शिखाएँ उसे विजय सूचित करती हैं-'प्रदक्षिणावर्त-शिखस्तप्तकाञ्वचन संनिभः ।' (6/73/28) रावण भी भारी तान्त्रिक है। उसकी ध्वजा पर (कौल-चिन्ह) नरशिरकपाल-मनुष्य की खोपड़ी का चिन्ह था। (6/00/4) किंतु उसके पराभव आदि द्वारा ऋषि वाम-मार्ग के इन बलि मांस-सुरादि क्रियाओं की असमीचीनता ही प्रदर्शित करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी “तजि श्रुति पंथ बाम मग चलही'-अयो. 68/7-8, 'कौल काम बस कृपन बिमूढा (लंका) आदि से इसी बात का समर्थन किया है, भगवान श्री राम समयमार्ग के उपासक दीखते हैं। इस प्रकार हमें महर्षि की दृष्टि में ज्योतिष, तन्त्र आयुर्वेद, शकुन आदि शास्त्रों की प्राचीनता एवं समीचीनता ज्ञात होती है।

प्रस्तुत ग्रन्थ 0 परिवर्तों में विभाजित किया गया है।

प्रथमः परिवर्त शीर्षक “विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन है” जिसमें संस्कृत साहित्य की विशालता, वाल्मीकि रामायण का स्वरूप, साहित्यिक ग्रन्थों का आयुर्वेद दृष्टि से महत्त्व, आयुर्वेद का स्वरूप एवं अष्टाइ़, आयुर्वेद का साहित्य-विभाजन एवं वाल्मीकि रामायण के समक्ष विद्यमान आयुर्वेद आदि विषयों पर विचार किया गया है।

द्वितीय परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामाग्रण में शरीर-विज्ञान प्रकरण” है जिसमें आयु और उसका आधार, आत्म-तत्त्व, शरीर की रचना, प्रणिभाग अन्तःकरण 6 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

इन्द्रियां, प्रकृति भेद, प्रशस्त सामुद्रिक लक्षण, स्वास्थ्य का महत्त्व, स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले तत्त्व माँस तत्त्व, स्वस्थवृत्त एवं सदवृन्‍्त आदि विषयों पर विचार किया गया है।

तृतीय परिवर्त का शीर्षक “शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थ वृत्त की सामग्री है जिसमें दिनचर्या, सन्ध्योपासना, सामाजिक स्वस्थवृत्त, सदृवृत्त या आचार-परक स्वस्थवृत्त भक्ष्याभक्ष्विचार, आहार, भोजन के गुण, प्रकार, षट्रस पेय-भोजन, भोजनोत्तर कर्म, माध्यनिन्दनीयकर्म, रात्रिचर्या मधुपान, मदिरापान, ऋतुचर्या आदि विषयों पर विचार किया गया है।

चतुर्थ परिवर्त का शीर्षक वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध-परिचय एवं द्रव्य-गुण शास्त्र की सामग्री है। इसके अन्तर्गत भौतिक एवं प्राकृतिक औषधियों यथा पृथ्वी, जल अग्नि, वायु आदि वानस्पत्य औषधियों यथा अगर, अर्जुन, अनार, अश्वत्थ आदि, धातुज औषधियों यथा हिरष्य पिज्ञाः नमः वज़ः आदि पर विचार किया गया है।

पज्चम परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण” है इसके अन्तर्गत शारीरिक कारण यथा वात-पित्त-कफ आंदि, मानसिक कारण यथा काम, क्रोध, मोह आदि, आगन्तुक कारण-आधघातजन्य, ऋतु सम्बन्धी, स्थान सम्बन्धी आदि विषयों पर विचार किया गया है।

षष्ठ परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान” है इसके अन्तर्गत शारीरिक रोग यथा अतिसार ज्वर, अंग-भेदन, शिरो-रोग, राज यक्ष्मा, कुष्ठ, गुल्म व्रण आदि, मानसिक रोग-मूर्चर्छा उन्‍्माद अपस्मार आदि, आगन्तुक रोग अर्दित-आघात, वमन विरेचन आदि, स्त्री रोग एवं गर्भावक्रान्ति यथा रजस्वला, गर्भहास॑ गूढ़ गर्भ आदि उदर-पाटन द्वारा गर्भ निकालना। आदि विषयों पर विचार किया गया है। इसके अतिरिक्त विष-विधान यथा सर्प विष कन्द विष एवं कृत्रिम विष आदि पर भी विचार किया गया है।

सप्तम परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामायण में प्राकृतिक चिकित्सा विधान” है जिसमें अग्नि द्वारा, चिकित्सा जल द्वारा, मृत्तिका द्वारा एवं वायु द्वारा चिकित्सा आदि विषयों पर विचार किया गया है।

अष्टम परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामायण में तान्त्रिक चिकित्सा एवं भूत-विद्या विषयक सामग्री” है। इसमें मणि बन्धन अभिमार्जन, कृत्या आशीर्वाद तंत्र-मंत्र, अपमृत्यु निवारक उपचार, शकुन-विज्ञान, स्वप्न विज्ञान आदि का वर्णन किया गया है।

नवमू परिवर्त का शीर्षक “वाल्मीकि रामायण में शल्य-चिकित्सा विधान” है

दो शब्द / ॥7

जिसके अन्तर्गत शल्य अवस्था उपकरण, विधियाँ, रोगीः परिचर्या, मेषवृषण आदि विषयों पर विचार किया गया है।

दशम परिवर्त अंतिम परिवर्त है। इसका शीर्षक “उपसंहार-निष्कर्ष एवं मूल्यांकन” है। इसमें ग्रन्थ का सार दोहन कर उपलब्धियों की उपस्थापना की गई है। इसी में परिशिष्ट भी वर्णित किया गया है।

6 परिशिष्टों में रामायण-उपन्यस्त वनस्पतियों, औषधियों, रोगों, खनिज द्रव्यों, जाइ्षम द्रव्यों शरीर विशेषज्ञों एवं शरीरावयवों आदि की ससन्दर्भ तालिका भी प्रस्तुत की गयी है।

प्रस्तुत अध्ययन परिपूर्ण हो जाने पर मेरा अपना यह नम्र निवेदन है कि साहित्य-काव्य में कुछ एक काव्यग्रन्थों के अतिरिक्त रामायण ही प्रमुख काव्यग्रन्थ है जिसमें आयुर्वेद की प्रचुर सामग्री विद्यमान है। यह केवल आयुर्वेद के विभिन्‍न ग्रन्थों के विशिष्ट अंश का संग्रह मात्र ही नहीं है अपितु लुप्त-गुप्त एवं अद्यावधि अप्रकाशित आयुर्वेद के तथ्य पर भी प्रकाश डालने वाला है। इस काल में शल्य-चिकित्सा की उपलब्धि हो गयी थी तथा संजीवनी विशल्यकरणी जैसी अचूक औषधियाँ भी प्राप्त होती थीं।

वाल्मीकि रामायण का राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा अन्य विविध दृष्टि कोणों से सम्बन्धित अध्ययन किया जा चुका है, किन्तु इसमें निहित आयुर्वेदिक तत्त्वों की ओर किसी भी विद्वज्जन का ध्यान नहीं गया है।

मेरी बाल्य-काल से ही वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद दोनों के प्रति विशेष रूचि थी। इसी कारण मैं इसी क्षेत्र में कुछ शोध-पूर्ण कार्य करना चाहती थी, किन्तु दो अलग-अलग तथा व्यापक क्षेत्र होने के कारण निर्णय नहीं कर पा रही थी किन्तु पिताश्री का आयुर्वेद के प्रति लगाव एवं माता जी की धार्मिक प्रवृत्ति ने शीघ्र ही मुझे प्रस्तुत विषय प्रदान किया। अतः परिवार में आयुर्वेद का वातावरण होने के-कारण “वाल्मीकि रामायण' में आयुर्वेदिक सामग्री को खोजने के प्रति किया गया प्रयास विद्वानों के सम्मुख प्रस्तुत करने का दुस्साहस किया जा रहा है। इस आधार पर आयुर्वेदिक सामग्री को संकलित कर उनका भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करना भारतीय साहित्य, आयुर्वेद और इतिहास दोनों के लिये बहुमूल्य है। इसी आधार पर मुझे “वाल्मीकि रामायण' में प्रतिपादित आयुर्वेदिक सामग्री पर कार्य करने की प्रेरणा मिली। रामायण का आयुर्वेदिक दृष्टि . से समीक्षात्मक- अध्ययन करना अधिक उपयोगी है, क्योंकि अभी तक उसकी आयुर्वेदिक सामग्री का समीक्षात्मक दृष्टि से कहीं भी सर्वाज्ञीण. अध्ययन नहीं हुआ है।

8 / वाल्मीकिं रामायण तथा आयुर्वेद

इस ग्रन्थ का वैशिष्टय इस प्रकार है-

. “रामायण में उपन्यस्त आयुर्वेदिक विषयों के पाठों को तत्तत्‌ स्रोत विषयों से तुलना कर उनकी पाठ शुद्धि की गयी है तथा यह पाठ शुद्धि अभी तक रामायण के किसी भी प्रकाशित संस्करण या उस पर किये गये किसी भी अध्ययन ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं है।

2. चरक, सुश्रुत, अष्टाइसंग्रह, अष्टाइ हृदय, भाव प्रकाश आदि में उपलब्ध अनेक विषयों का परीक्षण रामायण के प्रकाश में किया गया है।

3. परिशिष्ट में आगामी शोध कार्यकारणार्थ विभिन्‍न वनस्पतियों, धातु उपधातुओं, खनिजों, रत्नों, खादूयद्रव्यों, शरीरावयव-पर्यायों, रोगों एवं स्नोतोभूत समान श्लोकों की तुलनात्मक तालिका ससन्दर्भ प्रस्तुत कर दी गयी है ताकि सम्बन्ध क्षेत्र के तद्‌विद, विद्वान उनका लाभ उठा सकें।

4. रोगो में वैदिक एवं तान्त्रिक प्रक्रियाओं का उपस्थापना इस ग्रन्थ की पूर्णता हेतु- मैं सर्व प्रथम अपने श्रेष्ठ गुरुदेव डॉ. सनत्कुमार

शास्त्री जी के प्रति कृतज्ञता पूर्वक आभार प्रकट करती हूँ कि उन्होंने अपने

व्यस्ततम जीवन में मुझे सदैव अमूल्य समय दिया तथा मुझ निरुत्साहित को सदा उत्साह प्रदान करते हुए कार्य पथ पर चलने की प्रेरणा दी तथा समय-समय पर मेरा मार्ग प्रशस्त किया- गूढ़ रहस्य युक्त तथ्यों एवं गुत्थियों को सुलझाने में भी मेरी सहायता की। आज उन्हीं के चिराशीष से मैं इसको विद्वानों के समक्ष इस भावना से प्रस्तुत कर रही हूँ कि इस विषय पर विशेष कार्य करने की इच्छा अभी भी मुझमें है।

इस ग्रन्थ को लिखने में जिन-जिन स्वनामधन्य महानुभावों से सहयोग मिला उनमें मेरे परम पूजनीय पिता श्री आचार्य मुक्तेश माथुर का नाम सर्वाग्रणी है, उन्हीं के प्रयासों एवं आशीर्वाद से मैं आज सफलता की इस सीपान पर पहुँची हूँ। मेरे पूर्व जन्मों में किये गये सत्कर्मों का ही यह परिणाम है, जो मैंने उन्हें पिता के रूप में पाया। जीवन के जिस क्षेत्र में और इस प्रबन्ध को लिखते समय जहाँ भी मैं उत्साहहीन या परेशान होती दिखाई दी, उन्होंने सदैव मुझे समझाया तथा कर्त्तव्यबोध कराया उनकी यहाँ प्रशंसा करते हुए आज मुझे अत्यन्त हर्ष हो रहा है।

इस ग्रन्थ की पूर्ति में मेरी प्रेरणास्रोत माता श्रीमती चन्द्रकान्ति माथुर का वरदहस्त भी सदा मुझे प्राप्त होता रहा है जिन्होंने मेरे कार्य में होने वाली त्रुटियों का सूक्ष्म अवलोकन कर मुझे सदैव श्रेष्ठ कार्य के लिये प्रेरित किया और इस कार्य की पूर्ति में मेरा सहयोग किया। सरस्वती स्वरूपा माँ को प्राप्त कर आज मैं स्वयं

दो शब्द / 9

को सर्वाधिक भाग्य-शालिनी अनुभव कर रही हूँ।

मैं अपने परम आदरणीय गुरु श्री बी. बी. एल. अग्रवाल प्राचार्य, सम्माननीय अंकल डॉ. यू. सी. सक्‍्सैना (एलोपैथिक चिकित्सक) गुरु तुल्य सम्माननीय बाबा-वैद्य श्री तेज पाल शर्मा (आयुर्वेदिक चिकित्सा) के प्रति हृदय से कृतज्ञता ज्ञापन करना अपना परम कर्त्तव्य समझती हूँ, जिन्होंने समय-समय पर अपने बहुमूल्य सुझावों से मेरा पथ-प्रदर्शन किया।

कर्त्तव्य-पथ का बोध कराने में सदैव अग्रणी अपनी नानी जी श्रीमती आनन्दी देवी को विस्मृत कर देना मेरी महान मूर्खता ही होगी, जिन्होंने सदा अपने आशीर्वाद एवं स्नेह से मेरा मार्ग प्रशस्त किया।

गुरु परिवार के प्रेम की मैं चिरऋ्णी रहूँगी। गुरु पत्नी श्रीमती राकेश शर्मा, प्रणव शर्मा, सोनी (पीयूष) एवं बहिन प्रत्यूषा एवं पल्‍लवी का स्नेह एवं सम्मान भाव सदैव मुझे सत्कार्य के लिये प्रेरित करता रहेगा, जिन्होंने सदैव मुझे बड़ी बहिन के समान सम्मान एवं सत्कार दिया।

इस ग्रन्थ को अंतिम चरण तक पहुँचाने में जिन आदरणीय महानुभवों से सहयोग मिला उनमें, जहाँ मुझे स्वयं से एक पल भी दूर कर पाने वाले अपरिमित प्रेम वर्षक श्रद्धेय एवं पूजनीय पतिदेव “श्री राजीव माथुर” का नामोल्लेख करते हुए सौभाग्य का अनुभव हो रहा है, वहीं अपने आदरणीय पिता श्री (श्वसुर) श्री राम किशोर जी माथुर एवं माता जी (सास) श्रीमती कृपा माथुर की कृपा, स्नेह एवं पथ-प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए भी अपार हर्ष हो रहा है। इस कार्य की पूर्ति हेतु मेरी छोटी बहिन पूनम (नन्द) एवं छोटे भाई संजीव (देवर) भी धन्यवाद के पात्र हैं, जिन्होंने इस कार्य को पूरा कराने में मेरी सहायता की।

मेरे कार्य में अनेक अवरोध और प्रतिरोध उत्पन्न हुए जिनसे मैं कई बार किंकर्त्तव्यविमूढ जैसा आचरण करने लगी, किंतु उनके निवारण में मेरे छोटे भाई मयंक माथुर ने मुझे अविस्मरणीय प्रेरणा दी तथा मेरे कार्य में हर सम्भव मेरी सहायता की। मेरा आशीर्वाद एवं शुभ कामनाएँ सदैव उसके साथ रहेंगी।

इस ग्रन्थ की पूर्ति के लिये मैं अपने मौसेरे भाई स्व. श्री योगेश माथुर की भी हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने विविध पुस्तकालयों एवं चिकित्सालयों आदि में मुझे स्वयं ले जाकर मेरी विविध प्रकार से सहायता की।

इस पुस्तक के प्रकाशन हेतु मैं अब उन नये लोगों की भी हृदय से आभारी हूँ जो इसके लेखन काल में नहीं थे, पर प्रकाशन में उन्होंने मेरा हर सम्भव सहयोग किया जिनमें सर्वप्रथम-मैं अपने दोनों पुत्रों 'मेधज माथुर” एवं 'शिवांग माथुर” को अनेकशः आशीष देना चाहूंगी क्योंकि उन्हीं के समय में से समय लेकर

20 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

मैं इस कार्य का प्रकाशन करा सकी। मैं अपने छात्र डॉ. शिवशंकरं, डॉ. बिन्दु की भी आभारी हूँ। अन्त में मैं भैया सुरेश चौधरी जी का भी हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ जिन्होंने अत्यन्त अल्प समय में इसका सुन्दर प्रकाशन किया।

इस ग्रन्थ में मानव सुलभ अनेक न्यूनताओं का रह जाना स्वाभाविक है अतः मैं उसके लिये क्षमाप्रार्थी हैँ। आशा है इस दिशा में मुझसे उत्तरकालीन व्यक्तियों द्वारा और भी सुन्दर कार्य सम्पन्न हो सकेंगे।

“प्रेरणा माथुर

दो शब्द / 2

संकेत सूची

संकेत च. सू. आ. सं. सू. सु. सू. अ. ह. च. सू. नि. च. सू. वि. सु. सू. पू. सु. सू. उ. शा. सं. * वा. रा. कि. - बा. 20/30 - अयो. आर. - कि. +-यँं; .. प्र. 7/2 .. 8 / प्रा. * नया. सू. - आ. वै. इ.

9 फफका कछ के

शक कु हा कक पाक 5७: 03.५ कह 8 उस. हक ह#& 3 9 5 ८४8

22 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

विस्तृत रूप

चरक सूत्र

अष्टाड़ संग्रह सूत्र

चुश्ुत सूत्र

अष्टाड हृदय

चरक सूत्र निदान

चरक सूत्र विमान

सुश्रुत सूत्र (संहिता) पूर्वाद्ध सुश्ुत सूत्र (संहिता) उत्तरार्द्ध शारइ्धर संहिता पु वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा बालकाण्ड 20 वाँ सर्ग 30 वाँ श्लोक अयोध्या काण्ड

अरण्य काण्ड

किष्किन्धा काण्ड

सुन्दर काण्ड

युद्ध काण्ड

उत्तर काण्ड

प्रक्षिप्त सर्ग |/2

3वें सर्ग का. प्रारम्भ

न्याय सूत्र

आयुर्वेद का वैज्ञानिक इतिहास

अनुक्रम

प्रथम परिवर्त- विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन. -92 द्वितीय परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में शरीर-विज्ञान प्रकरण ' 938-60 तृतीय पंरिवर्त-शरीर शुद्धि एवं वैयक्तिक स्वस्थ वृत्त की सामग्री 6-229 चतुर्थ परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध औषध-परिचय एवं

द्रव्य गुण शास्त्र की सामग्री 280-554 पंचम परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में रोगोत्पत्ति के कारण 255-874 षष्ठ परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में वर्णित रोग एवं उनका निदान 375-455 सप्तम परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में प्राकृतिक चिकित्सा विधान 456-467 अष्टम परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में तांत्रिक चिकित्सा एवं

भूत विद्या विषयक सामग्री 468-490 नवम परिवर्त-वाल्मीकि रामायण में शल्य-चिकित्सा विधान 49-506 दशम परिवर्त-उपसंहार-निष्कर्ष एवं मूल्यांकन 507-564

प्रथम परिवर्त

विषयावतरण-संस्क्ृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन

प्रथम परिच्छेद संस्कृत साहित्य की विशालता

संस्कृत भारत की प्राचीनतम भाषा है और इसका देव-वाणी नाम इसकी इसी पुरातनता को द्योतित करता है। संस्कृत भाषा के वाजइमय में हम भारत के साहित्यिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, आध्यात्मिक एवं राजनीतिक जीवन की समग्र झाँकी पा सकते हैं।

प्राचीन काल में संस्कृत का प्रयोग केवल पठन-पाठन में ही नहीं होता था, वरन्‌ जन सामान्य अपने दैनिक व्यवहार में भी इस भाषा का प्रयोग करते थे। रामायण में इल्वल राक्षस ने ब्राह्मण का रूप धारण कर ब्राह्मणों को निमंत्रित करने के लिए संस्कृत भाषा का प्रयोग किया था। अशोक वाटिका में पहुँचकर बहुत सोच-विचार कर हनुमान जी ने सीता से संस्कृत भाषा में ही बोलने का निश्चय किया।'

यास्क ने वैदिक संस्कृत से इतर संस्कृत को भाषा कहकर उसका जन साधारण द्वारा प्रयुक्त होना सूचित किया है। पाणिनी ने भी संस्कृत को लौकिक भाषा कहा है। संस्कृत का प्रचार ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य वर्णों में भी पाया जाता था। महाभाष्य में एक सारथि के द्वारा एक वैयाकरण से सूत शब्द की व्युत्यति पर विवाद किया जाना दिखाया गया है। उस समय संस्कृत बोलने वालों को शिष्ट कहा जाता था, किन्तु उसे बोलने वाले भी उसे समझते अवश्य थे। उस समय राज-कार्य में संस्कृत का ही व्यवहार होता था।

भारत के प्राचीन इतिहास का पर्यवेक्षण करने के लिए संस्कृत साहित्य का अध्ययन नितान्त अपेक्षणीय है।

संस्कृत साहित्य में कालिदास, माघ, भारवि आदि की चुनी हुई रचनाएँ ही नहीं हैं, वरन्‌ वह तो विस्तृत क्षेत्र में लौकिक एवं पारलौकिक सभी विषयों का सूक्ष्म एवं विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है। क्‍या दर्शन, क्या ज्योतिष, क्या

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन /

आयुर्वेद, क्या विज्ञान, क्या व्याकरण, क्या धर्म, क्या संगीत और क्या अन्य, अनेकों विषय-सभी की चर्चा संस्कृत साहित्य में सर्वाह्ररूपेण की गयी है। खोज करने पर पता चला है कि संस्कृत साहित्य के ग्रन्थों की संख्या ग्रीक और लेटिन के ग्रन्थों की मिली हुई संख्या से भी बहुत अधिक है। यदि किसी देश का साहित्य उस के समाज एवं संस्कृति का दर्पण कहा जा सकता है तो संस्कृत साहित्य भारतीय समाज एवं संस्कृति का वह विमल दर्पण है जिसमें अपने अतीव गौरव की झाँकी देखकर हम आज भी गर्व से अपना सिर ऊँचा कर सकते हैं। संस्कृत साहित्य की सहस्र वर्षो की अजस्र रचना के समक्ष अंग्रेजी साहित्य की अजस्नता अत्यधिक अल्प ही है। * इन्हीं सब कारणों से हमारे प्राचीन महर्षियों ने संस्कृत भाषा को देवीवाक्‌

अर्थात्‌ देवताओं की वाणी कहा था। दे

संस्कृत साहित्य में काव्य की प्रथम झलक ऋग्वेद में देखने को मिलती है। पुनश्च ब्राह्मण-ग्रन्थों के कतिपय प्रसंगों तथा इतिहास, पुराण काल में काव्य की रचना का कूछ अधिक परिपाक हुआ। परन्तु महाकाव्य की रचना की दृष्टि से यह काल भी विवेचनीय नहीं है। वस्तुतः वाल्मीकि कृत रामायण ही हमें आदि महाकाव्य के रूप में उपलब्ध होती है। संस्कृत साहित्य दो भागों में विभक्त है

. वैदिक साहित्य

2. लौकिक साहित्य

चैदिक वाड्मय प्राचीनता, उत्कृष्टता एवं साहित्यिक तथा सांस्कृतिक वैभव की दृष्टि से केवल भारतीय साहित्य का उत्तमांश है, अपितु इसे भारतीय साहित्य का प्राचीनतम अवशेष और विश्व साहित्य की अमूल्य निधि माना जा सकता है। भारतीय प्रज्ञा और सारस्वत साधना का परमोज्ज्वल रूप वैदिक साहित्य में प्रतिष्ठित है। इसे केवल भारतीय वाड्मय का मूर्धन्य होने का श्रेय है अपितु यह विश्व-साहित्य की उपलब्ध सर्वथा प्राचीन एवं महान रचना है। इसे भारतीय प्रतिभा एवं पाण्डित्य का महासागर कहा जा सकता है।

वेद और वैदिक साहित्य दो भिन्‍न एवं निरपेक्ष अर्थों के द्योतक हैं। वेद से केवल चार मंत्र-संहिताओं का बोध होता है-कऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद इस प्रकार वैदिक साहित्य वेद विषयक समस्त वाड्मय का द्योतक है, जिसके विस्तृत परिवेश में संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्‌ एवं वेदांग समाविष्ट हो जाते हैं। संहिता भाग.में मंत्रों का संग्रह है, जिसमें कान्तदृष्टा ऋषियों द्वारा की गयी स्तुतियों का संकलन है। इनमें विभिन्‍न ऋषियों-मुनियों के अनुभव लि आध्यात्मिक विचार संगृहीत हैं। संहिता भाग के चार खण्ड हैं-ऋक्‌, साम, यजुः एवं अथर्व। कालान्तर में कर्मकाण्ड, उपासना काण्ड तथा ज्ञानकाण्ड के आधार चर ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्‌ ग्रन्थों का निर्माण हुआ। 2 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

ब्राह्मण ग्रन्थों में विधि-भाग का वर्णन किया गया है आरण्यक उन व्यक्तियों के लिये उपयोगी है जो वीतराग होकर, अरण्य का सेवन करते हुए शांत वातावरण में भगवद्‌ उपासना में लीन रहते हैं। इनमें ब्राह्मण-ग्रन्थों में वर्णित वैदिक कर्मों या याज्ञिक कर्मों के आध्यात्मिक पक्ष का उद्घाटन किया गया है। उपनिषद्‌ वेद के अन्तिम भाग हैं और वे ज्ञान-काण्ड से सम्बद्ध हैं, इनमें वैदिक मंत्रों की दार्शनिक व्याख्या हुई है।

वेदांग की संख्या छः है-शिक्षा, कल्प, व्याकरण निरुक्त, छन्‍्द और ज्योतिष वेदों की भाषा की शुद्धता एवं उच्चारण को सुरक्षित रखने के लिए शिक्षा ग्रन्थों की रचना हुई है। कल्प के चार विभाग हैं-श्रौत सूत्र, गृद्य सूत्र, धर्म सूत्र तथा शुल्व सूत्र

प्रत्येक वेद के अलग-अलग कल्प सूत्र हैं। श्रौत सूत्रों में विविध यज्ञों का विधान तथा गृद्य सूत्रों में सामाजिक संस्कारों-विवाह, उपनयन, श्राद्ध आदि का वर्णन है। धर्म सूत्रों में चारों वर्णों एवं आश्रमों के कर्तव्य-कर्म का विवेचन एवं शुल्व सूत्रों में वेदिका मापन विधि का वर्णन या अनुचिंतन है। व्याकरण के अन्तर्गत वेदों का व्याकरण प्रस्तुत किया गया है। सम्प्रति वैदिक व्याकरण उपलब्ध नहीं है, पाणिनी व्याकरण में ही वेदों का व्याकरण निर्मित हुआ है। निरुक्त में वैदिक शब्दों की व्युत्पति दी गयी है, निघण्टु की टीका का नाम निरुक्त है और निघण्टु में चुने हुए वैदिक शब्द हैं। छन्द के अन्तर्गत वैदिक छन्दों का विवेचन हुआ है। वेदों की रचना छन्दोबद्ध है। इसमें कई प्रकार के छन्दों का प्रयोग हुआ है, जिनका विश्लेषण प्रतिशाख्यों तथा पिज्ललकृत “छन्द सूत्र” में किया गया-है। यज्ञ सम्पादन के लिये काल ज्ञान की आवश्यकता को देखकर ज्योतिष ग्रन्थों की रचना हुई है। इनमें रात, दिन, ऋतु, माह, वर्ष, नक्षत्र आदि का सम्यक्‌ अनुशीलन किया गया है।

ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना गद्य में हुई है और प्रत्येक वेद के पृथक्‌-पृथक्‌ ब्राह्मण हैं। इनका प्रधान विषय है-कर्मकाण्ड, जिसमें यज्ञीय कमों तथा मंत्रों का यज्ञ-सम्बन्धी विनियोग वर्णित है तथा अनेकानेक लौकिक एवं आध्यात्मिक आख्यानों का कथन किया गया है। आरण्यक तो ब्राह्मण-प्रन्थों के परिशिष्ट हैं और इनमें दर्शन सम्बन्धी विचार भरे पड़े हैं। वेद के अन्तिम भाग को उपनिषद्‌ कहा जाता है जिसका प्रधान प्रतिपाद्य ब्रह्म-विद्या है। इनकी संख्या 08 से भी अधिक है, जिनमें ] प्रधान हैं-ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्ड, माण्डूक्य, तैतिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक एवं श्वेताश्वतर।

मौलिक अर्थ में वेद ज्ञान का प्रत्यापक है किन्तु “विद्या” शब्द से विद के इसी धातु से उत्पन्न होने के कारण मूलतः विद्या और वेद शब्द समानार्थक हैं। “आश्वलायन गृह्य-सूत्र' नें (0-7) वेद शब्द अनेक विद्याओं के साथ प्रयुक्त हुआ विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 3

है। 'यजुर्वेदोवेदः, 'अथर्वाणोवेद:, 'असुरविद्यावेदः, 'पुराणविद्यावेदः, 'इतिहासोवेद:” (' प्राचीन वाइमय में भी वेद, ब्रह्म और विद्या तीनों एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते रहे हैं। अनेक स्थलों पर तीनों वेदों के लिये “त्रयं ब्रह्म”, “त्रयीविद्या” तथा “त्रयोवेदाः” तीनों ही प्रकार के प्रयोग उपलब्ध होते हैं। 'शतपथ ब्राह्मण” (4/6/7/) में त्रयी के साथ विद्या शब्द भी. प्रयुक्त हुआ है- “नत्रयी वै विद्या ऋचो यजूंषि सामानि।” “ब्रयं ब्रह्म सनातनम्‌............. अग्यजु: सामलक्षणम्‌” ।-मनुस्मृति /28 “शवं त्रयीधर्ममनुप्रपनना''-गीता-9/श* वेद विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ तथा भारतीय .संस्क्रृति के प्राण हैं। प्राचीन धर्म, साहित्य, सभ्यता तथा दर्शन सभी की आधारशिला वेदों के राजप्रासाद पर अधिष्ठित है। “वेद” का व्याकरण लब्ध अर्थ है 'ज्ञान' | मनु के अनुसार “वेद” पितृगण, देवता तथा मनुष्यों का सनातन तथा निरन्तर विद्यमान रहने वाला चक्ु है। सायण के अनुसार प्रत्यक्ष या अनुमान द्वारा दुर्बोध तथा अज्ञेय उपाय का ज्ञान कराने में वेद की वेदता है। वेद का प्रयोग मंत्र और ब्राह्मण के लिए हुआ है जिसका मनन किया जाये उसे मंत्र कहते हैं। इनके द्वारा यज्ञानुष्ठान एवं देवता की स्तुति का विधान होता है-मननात्‌ मंत्र: ब्राह्मण शब्द ग्रन्थ विशेष का द्योतक है, ब्रह्मन के कई अर्थ होते हैं, उनमें एक अर्थ यज्ञ भी है। अतः ब्राह्मण ग्रन्थ उन्हें कहा जायेगा जिनमें यज्ञ की विविध क्रियाओं का वर्णन हो। ब्राह्मण के तीन विभाग किये जाते हैं . ब्राह्मण। 2. आरण्यक। 3. उपनिषद्‌ वेदों के रूप में भारत वर्ष की अखण्ड साहित्यिक परम्परा छः सहस्र वर्षों से सतत प्रवाहमान है वैदिक युगीन ऋषियों ने प्रकृति के वाह्य सौन्दर्य पर मुग्ध होकर अपने हृदय की भावधारा की जो तीव्र अभिव्यक्ति की है, वह वैदिक साहित्य की ही नहीं, विश्व वाडूमयं की अपूर्व निधि है। वेद का समय-निरूपण भारतीय परम्परा वेदों को अपौरुषेय, अनादि, नित्य तथा कालावच्छिन्न , मानती है। इस दृष्टि से इसके अनुसार वैदिक-काल-निर्णय का प्रश्न ही नहीं उठता। वेद ब्रह्म की वाणी के रूप में समावृत हैं, अतः इनकी प्राचीनता सृष्टि की प्राचीनता से अनुस्यूत है। पर, आधुनिक युग के विद्वान वैज्ञानिक आधार पर उक्त विचार को संदेह की दृष्टि से देखते हैं और वे प्राचीन भारतीय आचार्यों के काल सम्बन्धी मतों के प्रति श्रद्धा नहीं रखते। वे वेदों को ऋषि प्रणीत या उनकी कृति मानकर उन्हें पीरुषेय स्वीकार करते हैं। उन्होंने इन्हें मनुष्यकृत कहकर इनक़ी जो 4 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

सीमा निर्धारित की उसमें निष्पक्षता का भाव अनुगुंजित नहीं होता और वह पूर्वाग्रहग्रस्त दीख पड़ते हैं। इनके निष्कर्षों को अन्तिम सत्य नहीं माना जा सकता, पर इनकी शोधात्मक पद्धति एवं निष्कषों को सर्वथा निर्मूल एवं.उपेक्षणीय नहीं कहा जा सकता और इनके मतों का अवमूल्यन किया जा सकता है।

पाश्चात्य पण्डितों में सर्वप्रथम मैक्समूलर ने इस प्रश्न की छान-बीन में जीवन-पर्यन्त शोध-कार्य किया। उन्होंने 859 ई. में अपने ग्रन्थ 'प्राचीन संस्कृत साहित्य में सर्वप्रथम ऋग्वेद” का निर्माण काल खोजने का प्रयतत किया और अपना निर्णय दिया कि इसकी रचना ईस्वी पूर्व बारह सौ वर्ष हुई है। उन्होंने अपने निर्णय का “केन्द्रीय तिथि बिन्दु बौद्ध-धर्म के उदय को मानकर'ं बताया कि उस समय तक सभी वैदिक साहित्य (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्‌ एवं वेदाड़) का निर्माण हो चुका था, ब्राह्मणों और श्रौत सूत्रों में वर्णित यज्ञानुष्ठान का ही बुद्धदेव द्वारा घोर विरोध किया गया था। मैक्समूलर ने समस्त वैदिक वाइमय को. चार युगों या भागों में विभक्त किया-छन्दकाल, मन्त्रकाल, ब्राह्मणकाल एवं सूत्रकाल तथा प्रत्येक काल के लिये दो-दो सौ वंषों का समय निश्चित करते हुए सूत्रकाल को छः सौ वर्ष ईस्वी पूर्व ब्राह्मण को छः सौ-से आठ सौ ईस्वी पूर्व और मन्त्रकाल को एक हजार ईस्वी पूर्व स्वीकार किया। उनके विचारानुसार वैदिक संहिताओं का रचनाकाल बारह सौ ईस्वी पूर्व माना गया।'

पाश्चात्य विद्वानों को मैक्समूलर के इस अवैज्ञानिक और भ्रम पूर्ण निर्णय का भान हुआ और उन्होंने उनके विचारों का खण्डन किया। हिटनी ने उनकी इस अंध परम्परा की निंदा की तथा श्रेडर ने अपनी खोजों के आधार पर संहिताकाल को 500 ईस्वी पूर्व से 2000 ईस्वी पूर्व पहुँचाने का प्रयास किया, उसी समय हर्मन याकोबी ने ज्योतिष विज्ञान की गणना के आधार पर वेदों का समय चार सहस्र वर्ष ईस्वी पूर्व निर्धारित किया तथा भारतीय विद्याविद्‌ लोकमान्य तिलक ने ज्योतिष विज्ञान के साक्ष्य पर वेदों का रचनाकाल 6000 वि० पू० से 2500 विक्रम पूर्व तक निश्चित किया। तिलक के पूर्व प्रसिद्ध महाराष्ट्री विद्वान शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ भारतीय ज्योतिष” में (पूना 896) ज्योतिष गणना के आधार पर क्रग्वेद का काल 3500 वर्ष विक्रम पूर्व निर्धारित किया। जर्मन विद्वान हर्मन याकोबी ने कल्पसूत्रा के विवाह प्रकरण में वर-वधू को ध्रुव दिखाने के वर्णन “ध्रुव इव स्थिरा भव” का काल 2600 ईस्वी पूर्व माना है। याकोबी ने ऋग्वेद का काल 4000 ईस्वी पूर्व निश्चित किया है।

भारतीय पण्डितों में डॉ> अविनाश चन्द्र व्यास ने “ऋग्वेदिक इण्डिया” नामक ग्रन्थ की रचना भौगोलिक तथा भूगर्भ सम्बन्धी घटनाओं के आधार पर. की और बताया कि वैदिक सभ्यता का आविर्भाव ईसा पूर्व 25000 वर्ष हुआ था। उनके इस मन्तव्य की खिल्ली उड़ाते हुए पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने इसे अवैज्ञानिक एवं भावुक ऋषियों की कल्पना की उक्ति प्रदान की। एक अन्य विद्वान पण्डित

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 5

दीनानाथ शास्त्री चुलेट” ने 'वेद उग्र गिर्श4' नामक ग्रन्थ में ज्योतिष शास्त्र को आधार ग्रहण करते हुए वेदों का निर्माण काल आज से तीन लाख वर्ष पूर्व सिद्ध . किया है।

“इस प्रकार वेदों के रचना काल के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के परस्पर विरोधी मत प्रचलित हैं जिनमें समन्वय स्थापित करना सम्भव नहीं है। डॉ. विण्टरनिट्स ने भी इस विषय में अपने विचार रखे हैं।

ऋग्वेद या वैदिक संहिताओं के काल-निर्णय के सम्बन्ध में पाश्चात्य पण्डितों के ये ही विचार हैं, जो वेदों का निर्माण काल ईस्वी पूर्व 2500 वर्ष से अधिक स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं, पर इस सम्बन्ध में अभी अनुसंधान अपेक्षित है। अनेक भारतीय विद्वानों के मतों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि ईसा से 4000 वर्ष पूर्व वैदिक संहिताओं का निर्माण काल निश्चित करना अधिक समीचीन प्रतीत होता है फिर भी इस सम्बन्ध में प्रामाणिक साक्ष्य के आधार पर कुछ भी “इदमित्थं” नहीं कहा जा सकता। वेदों के भाष्य

वेद के अर्थ को स्पष्ट करने के लिये अथवा इसके निगूढ़ तत्वों की विवृति के लिये भाष्यों की रचना हुई है। जब वेद मन्त्रों की दुरूहता स्पष्ट होने लगी तब सभी वैदिक ग्रन्थों का आधार ग्रहण कर वेद भाष्यों का निर्माण होने लगा। प्रसिद्ध भाष्यकारों में स्कन्द स्वामी, वेंकट माधव, आनन्द तीर्थ, भट्ट भास्कर, नारायण, माधव भटूट, धानुष्कयज्वा, आत्मानन्द तथा सायण के नाम उल्लेखनीय हैं।

. स्कन्द स्वामी

ये ऋग्वेद के भाष्य कर्ता हैं। इनका समय 625 ईस्वी है। इन्होंने 'निरुक्त” पर भी टीका की रचना की थी। 2. नारायण

स्कन्द स्वामी, नारायण तथा उद्गीथ ने क्रमशः सम्मिलित रूप से ऋग्वेद भाष्य का प्रणयन किया है।

3. उदगीथ

उद्‌गीथ ने ऋग्वेद के अन्तिम भाग का भाष्य किया है। 4. माधव भट्ट

ऋग्वेद के माधव नामक चार भाष्यकारों का उल्लेख प्राप्त होता है। इनमें एक का सम्बन्ध सामवेद से तंथा शेष का सम्बन्ध ऋग्वेद से है। एक माधव तो सायणाचार्य ही हैं और दूसरे .वेंकट माधव। तीसरे मद्रास के हैं जिन्होंने प्रथम अष्टक की टीका की।

5. वेंकट माधव + इन्होंने सम्पूर्ण ऋग्संहिता पर भाष्य की रचना की है।

6 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

6. धाजुष्कयज्वा

यह 3800 वि. सं. के पूर्ववर्ती हैं। इन्होंने तीन वेदों पर भाष्य की रचना की है। 7. आनन्द तीर्थ

प्रसिद्ध द्वैतवादी आचार्य मध्व का नाम ही आनन्द तीर्थ था। इन्होंने ऋग्वेद

. के प्रथम मण्डल के चालीस सूक्तों पर पद्यबद्ध व्याख्या लिखी है।

8. आत्मानन्द

इन्होंने ऋग्वेद के अन्तर्गत “अस्यवामीय” सूक्त पर भाष्य की रचना की है। 9. सायणाचार्य हि

वेदार्थानुशीलन के विचार से सायणाचार्य के भाष्यों का अत्यधिक महत्व है इसके भाष्यों को <वेदार्थ प्रकाश” के नाम से अभिहित किया जाता है। साम-भाष्य |

सायण द्वारा सामवेद का भाष्य लिखने से पूर्व दो भाष्यों का उल्लेख मिलता है। इसके प्रथम भाष्य-कर्ता के रूप में माधव () का नाम माधव आतां- है। इन्होंने सामवेद के दोनों ही खण्डों-छन्द आर्चिक तथा उतरार्चिक पर अपने भाष्य की रचना की थी। इनके भाष्य को क्रमशः (छन्दसिका विवरण) एवं (उतर विवरण) कहा जाता है। 2. भरत स्वामी

इन्होंने भी सामसंहिता पर भाष्य की रचना की थी, जो प्रकाशित नहीं हुआ है। इन्होंने सामवेद की सभी ऋचाओं का भाष्य लिखा है, इन्होंने साम संहिता के अतिरिक्त साम ब्राह्मणों पर भी भाष्य लिखा है। 3. गुणविष्णु

इन्होंने 'साम-मन्त्र व्याख्यान” नामक सामवेद का भाष्य लिखा है। इनका “छन्दोग्य-मन्त्र-भाष्य” कलकत्ता से प्रकाशित हो चुका है, जो सामवेद की कौशुमशाखा पर है। शुक्ल-यजुर्वेद भाष्य माध्यन्दिन संहिता

इसके दो भाष्यकार थे-

. उब्बट।

2. महीधर। 4. उब्बट

माध्यन्दिन संहिता के अतिरिक्त इनकी अन्य रचनाएँ इस प्रकार हैं--“ऋक्प्रतिशाख्य की टीका', यजुः प्रतिशाख्य की टीका', 'ऋक्‍्सर्वानुक्रमणी' पर

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन ./ 7

भाष्य तथा ईशावास्य उपनिषद्‌ पर भाष्य। 2. महीधर

इन्होंने 'वेददीप” नामक भाष्य की रचना की है जो कि उव्वट भाष्य की छाया से छायान्वित है। इन्होंने तन्‍्त्र विषयक “तन्त्र महोदधि” नामक ग्रन्थ की रचना की। काव्य संहिता भाष्य . हलायुध

इनके भाष्य का नाम ब्राह्मण सर्वस्व” है। इन्होंने काण्व संहिता के उत्तरार्द्ध पर भाष्य की रचना की है। कृष्णयजुर्वेद की तैतिरीय संहिता

इस पर सर्व-प्रथम सायण ने भाष्य लिखा। कुण्डिन ने भी 'तैतिरीय संहिता” पर भाष्य की रचना की है। अवस्वामी-ने तैतिरीय संहिता पर भाष्य की- रचना की। गुहदेव-देवराज्यज्वा के निघण्टुभाष्य में गुहदेव को तैतिरीय संहिता का भाष्यकार कहा गया है। खझुर-इन्होंने भी तैतिरीय संहिता पर भाष्य की रचना की। “संहिता ऋग्वेद'

वैदिक ग्रन्थों पर भाष्य लिखने के बाद संहिता युग आया जिसमें प्रत्येके वेद पर संहिता ग्रन्थ लिखे गये। “ब्राह्मण युग?

वैदिक संहिताओं के पश्चातू संस्कृत या वैदिक साहित्य के इतिहास में एक ऐसा युग आया जो वर्ण्य-वेषय या शैली की दृष्टि से सर्वथा भिन्न शा। प्रत्येक वेद. के पृंथक्‌-पृथक्‌ ब्राह्मण हैं जैसे-ऋग्वेद के ब्राह्मण ऐतरेय तथा शांखायन, शुक्लयजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण, क्ृष्णयजुर्वेद के-तैतिरीय ब्राह्मण, सामवेद के ताण्ड्य, षडविंश, सामविधान, आर्षेय, दैवत, उपनिषद्‌ ब्राह्मण, संहितोपनिषद्‌ तथा जैमिनीय ब्राह्मण अथर्ववेद का-गोपथ ब्राह्मण है। “आएरण्यक!

आरण्यक ब्राह्मण-ग्रन्थों के परिशिष्ट माने जाते हैं। इनमें ब्राह्मणों से सर्वथा भिन्न विषयों. का चिंतन किया जाता है। सायणाचार्य:न्रे अरण्य में पठ्यंमान होने के कारण इनकी संज्ञा आरण्यक दी है।....'

आएरण्यकों का आध्यात्मिक तत्व: उपनिषदों. के. तत्व चिंतन का पूर्वरूप है, « जिसका पूर्ण-विकास उपनिषयों में प्रदर्शित होता है। प्रत्येक वेद में पृथक्न्पृथक - आएरण्यक हैं। ऋग्वेद के तीन: आरण्यक्‌ हैं+-

. एतरेय

8 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुवंद

2. शांखायन

3. तैत्तिरीय

अथर्ववेद का कोई आरण्यक प्राप्त नहीं होता है।

सामवेद का आरण्यक “'तलवकार' है।

“उपनिषद्र $

भारत के आध्यात्मिक इतिहास में उपनिषदों का महनीय योग है, जिनसे यहाँ का साहित्य, दर्शन और धर्म सहस्नावधियों से शासित होता रहा है।

उपनिषदों की संख्यां के विषय में पर्याप्त मत भेद हैं। साधारणतः उनकी संख्या 08 मानी जाती है। जिनमें 0 या 2 उपनिषद्‌ प्रधान हैं + 'मुक्तिकोपनिषद्‌" में उनकी संख्या 08 दी गयी है, जिनमें 0 का सम्बन्ध ऋग्वेद से है, 9 का शुक्ल यजुर्वेद से, 2 का कृष्ण यजुर्वेद से, ।6 का सामवेद से तथा 8 का अथर्ववेद से है।

आचार्य शंकर ने दस उपनिषदों पर भाष्य की रचना की है--ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्ड, माण्डूक्य, तैतिरीय, एतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक। इनके अतिरिक्त कौषीतकि, श्वेताश्वतर तथा मैत्रायणीय उपनिषद्‌ भी प्राचीन हैं। वेदाइ! वैदिक संहिता एवं उनसे सम्बद्ध साहित्य के विधिवत्‌ अध्ययन के क्रम जिस साहित्य का विकास हुआ उसे वेदाइ् के नाम से जाना जाता है। वेदाज्ञ नाम इस बात का द्योतक है कि वेदानुशीलन के अंग रूप में, इस साहित्य का प्रणयुन हुआ या वेद का वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिये वेदाजञों की रचना हुई, जिसके द्वारा वस्तु के स्वरूप का परिज्ञान होने में सहायता मिले, उसे “अंग” कहा जाता है। वेद के अर्थ की दुरूहता को दूर करने तथा कर्मकाण्ड सम्बन्धी तथ्यों के प्रतिपादन में वेदाज्लों की उपयोगिता असंदिग्ध है। ऐसे ग्रन्थों के छः वर्ग हैं।

शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।

“अनुक्रमणी?

“अनुक्रमणी” का अर्थ सूची है प्रत्येक वेद की पृथक्‌-पृथक्‌ अनुक्रमणियों की रचनां हुई। शौनक एवं कात्यायन अनुक्रमणी के प्रसिद्ध लेखकों में हैं। शौनक ने ऋग्वेद की रक्षा के लिये 0 अनुक्रमणियों की सृष्टि की है। . आर्षानुक्रमणी, 2. 2. उन्दोज्नुक्रमणी, 3. देवतानुक्रमणी, 4. अनुवाक्‌, 5. सूक्तानुक्रमणी, 6: ऋग्विधान, 7- पादंविधान, 8. वृहद्देव्ता, 9. प्रातिशाख्य एवं 0. शौनकस्मृति।

कात्यायन ने . बृहदुदेवता,- 2. सर्वानुक्रमणी 3. सामवेदीय अनुक्रमणी 4. वृहत्सर्वानुक्रणणी की रचना की।

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन. /

इस प्रकार संक्षेप में वैदिक साहित्य का सार प्रस्तुत किया गया।

वैदिक संस्कृत साहित्य की पूर्ण जानकारी संक्षेप में करने के पश्चात्‌ लौकिक संस्कृत साहित्य का प्रारम्भ रामायण से करते हैं- रामायण

रामायण भारत का राष्ट्रीय महाकाव्य एवं सम्पूर्ण जातीय जीवन की महागाथा है। भारतीय साहित्य में वाल्मीकि “आदि कवि' के रूप में प्रतिष्ठित हैं और उनका काव्य “रामायण” “आदि काव्य” के नाम से अभिहित किया जाता है। वैदिक साहित्य' के समापन के पश्चात्‌ संस्कृत में जिस साहित्य की अवधारणा हुई उसे क्लासिक या श्रेण्य साहित्य कहते हैं और उसका विभाजन इतिहास, काव्य, पुराण के अन्तर्गत किया गया है। ऐसे काव्यों में रामायण सर्वाधिक महनीय रचना के रूप में समादृत है। वस्तुतः वाल्मीकि रामायण से ही संस्कृत में कवित्वमय सर्जनात्मक काव्यधारा का प्रवर्तन हुआ; जो साहित्यिक संवेदनशीलता से अभिप्रेरित था।

इसमें राम रावण के दुर्घोष एवं भीषण युद्ध का वर्णन है और राम के चरित्र का काव्यात्मक वर्णन किया गया है। वाल्मीकि रामायण को भारत का गौरव मानकर इसे बहुमूल्य राष्ट्रीय निधि के रूप में मान्यता प्राप्त हुई है। यह लौकिक संस्कृत साहित्य की सर्वप्रथम रचना है, जिसमें कवि का मुख्य अभिप्रेत केवल राम, रावण के युद्धों एवं विजयों का ही वर्णन नहीं है अपितु यह अलंकृत भाषा के माध्यम- से समस्त मानव जीवन का चित्रण प्रस्तुत कर उसे प्रकृति की रमणीय पृष्ठभूमि में सजाता है।

वस्तुतः रामायण के द्वारा ही संस्कृत साहित्य में वैदिक शैली से सर्वथा भिन्‍न 'एक नई काव्य शैली का सूत्रपात हुआ, जिसमें सर्वप्रथम मानव चरित्र का अंकन किया गया था। वाल्मीकि रामायण का आधार-फलक अत्यन्त विस्तृत एवं मानव की विराट तथा प्रबुद्ध सांस्कृतिक चेतना से परिपुष्ट है। यह लौकिक साहित्य की प्रथम काव्य-धारा है जिसने अनन्त कांल तक मानव मन को आप्लावित किया है, और भविष्य में भी करता रहेगा। इसमें निषाद के बाण से बिद्ध क्रौंज्व पक्षी की करुणावस्था देखकर कवि का भावाकुल हृदय द्रवीभूत होकर काव्य के माध्यम से प्रस्फुटित हुआ है या यह कवि की करुणा विगलित भावों की द्रवणशील अभिव्यक्ति है, जिसमें केवल राम के जीवन को अंकित किया गया है अपितु यह भारतीय संस्कृति, समाज, धर्म, एवं चिंतन पद्धति का आकर ग्रन्थ है। इसमें भारतीय जीवन-पद्धति एवं सांस्कृतिक चेतना को भावात्मक रूप प्रदान किया गया है अर्थात्‌ रामायण भारतीय जीवन का मंजुल उद्गीथ है।

रामायण 'चतुर्विशति संहिता” के नाम से विख्यात है, क्योंकि इसमें 24000 श्लोक हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार आदि कवि ने त्रेता-युग के प्रारम्भ में, राम के जन्म के पूर्व ही रामायण की रचना की थी।

सम्पूर्ण रमायण सात काण्डों में विभक्त है-बालकाण्ड, अयोध्या काण्ड,

0 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

अरण्य काण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्ध काण्ड एवं उत्तर काण्ड। महाभारत .

महाभारत भारत का राष्ट्रीय ऐतिहासिक काव्य तथा आर्य-जीवन की विराट और सार्व-भौमिक महत्त्व से युक्त महागाथा है। इसके विशाल कलेवर का इस प्रकार निर्माण किया गया है, जिसमें पुराण, इतिहास, महाकाव्य, धर्म-शास्त्र तथा नीति दर्शन का मिश्रित स्वरूप प्रतिबिम्बित होता है। प्रसिद्ध विद्वान भारतीय विद्याविद्‌ डॉ. विन्टरनिट्स ने इसे अत्यन्त सीमित अर्थ में इतिहास और काव्य कहा है, किन्तु वास्तव में वे इसे अपने में एक पूर्ण साहित्य मानते हैं। भारतीय मनीषा ने शतादियों से प्रवहमान जिस ज्ञान एवं विचारणा का अन्वेषण किया था और युगनयुग से भारत ने सुचिंतित ढंग से जीवन की जो व्याख्या प्रस्तुत की थी उन सब का अखण्ड रूप एक प्राण होकर महाभारत में उत्कीर्ण है। यह,ऐसा:ज्ञान कोश है जिसमें मानव मस्तिष्क की समस्त चिंतन परम्परा एवं सांस्कृतिक चेतना आकर समाहित हो गयी है। एक शब्द में यह एक महान विश्व कोश है। इसमें ज्ञान के प्रत्येक पक्ष का केवल संस्पर्श ही नहीं किया गया है अपितु यह अपने सर्वागीण कलेवर में विभिन्‍न विषयों की सर्वोच्च मान्यताओं और चिंतन सरणियों को गुम्फित कर भारत का ज्ञान सर्वस्व होने के कारण आर्ष-ग्रन्थ या पंचम वेद के रूप में प्रतिष्ठित है।

भारतीय परम्परा के अनुसार महाभारत धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पदार्थों को देने वाला, समस्त कार्यों का साधक एवं कोकिल के मधुर स्वर की भांति शीतल एवं ताप नाशक है। इसे कौरवों एवं पाण्डवों की केवल युद्ध गाथा ही नहीं कहा जा सकता, यह सनातन धर्म के समस्त स्वरूप का निरूपक पवित्र धर्म-ग्रन्थ भी है और गीता के रूप में इसने भारतीय-तत्व-चिंतन का नवनीत प्रस्तुत किया है। भारतीय जीवन-मूल्य को समझने में महाभारत के द्वारा अत्यन्तं सुविधा प्राप्त होती है। संस्कृति को विद्वानों ने किसी जाति -के जीवनगत वैशिष्ट्य की संज्ञा दी है। “संस्कृति से तात्पर्य व्यक्तित्व की वे विशेषताएँ हैं, जिनका उपयोग वांछित मूल्यों के प्रकाशन उत्पादन से होता है ”*

महाभारत के अन्तर्गत हमें प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं इतिहास का समेकित रूप प्राप्त होता है-विशेषतः इसकी सांस्कृतिक गरिमा अत्यन्त प्रौढ़ >है। *

महाभारत में एक लाख श्लोक प्राप्त होते हैं, उसकी पुष्टिः गुप्तकालीन एक शिलालेख से होती है जहाँ इसके लिये “शतसाहस्नी-संहिता” कां प्रयोग हुआ है।

महाभारत का प्रणयन 8 पव्ों में हुआ है, जिनके नाम इस प्रकार हैं-आदि, सभा, वन, विराट, उद्योग, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, सौष्तिक, स्त्री, शान्ति, अनुशासन, अश्वमेध, आश्रमवासी, भौसल, महाप्रस्थानिक तथा स्वेगरिहण |

महाभारत के रचयिता व्यास जी हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार महर्षि व्यास ही महाभारत के प्रणेता हैं और इसके प्रमाण ग्रन्थ में उपलब्ध होते हैं। ये

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन /

कृष्णद्वैपायन व्यास महाभारत के रचविता. होते हुए भी उसके एक प्रधान पात्र के रूप में चित्रित हैं और कौरवों तथा पाण्डवों के दादा कहे गये हैं। पुराण पुराण भारतीय संस्कृति और साहित्य के महत्त्वपूर्ण अंग हैं इनमें कवित्वपूर्ण रचनात्मकता के साथ ही साथ भारतीय इतिहास का गौरवमय अंग उपन्यस्त है।, पुराणों में कुल चार लाख श्लोक हैं और उनकी संख्या 8 मानी गयी है तथा उतने ही उप-पुराण हैं। इनमें महाकाव्यीय पुराकथाओं का बृहत्‌ भण्डार संचित है तथा धर्म, दर्शन, इतिहास, भूगोल, मानव-सृष्टि और संहार के अतिरिक्त मनुष्यों के उत्तरदायित्वों के सिद्धान्त की शिक्षाएँ भरी पड़ी हैं। उप-पुराणों में महाकाव्यीय स्वरूप की मंदतां और याज्ञिक तत्व की सर्वाधिक प्रधानता दिखाई पड़ती है। आधुनिक युग के विद्वान्‌ सम्प्रदायिकता के वैशिष्ट्य के कारण पौराणिक साहित्य को विशेष महत्त्व नहीं देते, पर परम्पराओं तथा ऐतिहासिकता के विचार से ये भारतीय वाड्मय के अत्यधिक उपादेय अंग सिद्ध होते हैं। पुराणों को पंचलक्षण समन्वित माना जाता है। स्वयं पुराणों में भी इस बात का उल्लेख है कि पुराणों के प्रतिपाद्य विषय हैं-सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग, वंश, मन्व॒न्तर, और वंशानुचरित। सर्ग का अभिप्राय सृष्टि की रचना या उत्पति से है। संसार या उससे सम्बद्ध नाना प्रकार के पदार्थों की उत्पत्ति ही सर्ग है। पुराणों की संख्या पुराण और उप-पुराण के नाम से दो प्रकार के पौराणिक ग्रन्थ हैं। “देवी भांगवत' में पुराणों के आद्य अक्षर कें अनुसार 8 प्रकार कहे गये हैं। मकरादि से दो मत्स्य तथा मार्कण्डेय-पुराण, भकरादि से दो-भागवत्‌ तथा भविष्य ब्र अक्षर से तीन-ब्रह्म, ब्रह्मवैवर्त तथा ब्रह्माण्ड पुराण। व.अक्षर से चार-वामन, विष्णु, वायु तथा चबाराह पुराण। अ, ना, पदूम, लिं, ग, क, स्क, के अनुसार-अग्नि, नारद, पदूम, लिंग, गुण, कूर्म तथा स्कन्द-पुराण। विष्णु तथा भागवत में एक विशेष क्रम से ये ही नाम. प्राप्त होते हैं-ब्रह्म, प्रदूम, विष्णु, शिव, भागवत, नांरदीय, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैव्र्त, लिंग, बराह्, स्कन्द, -वामन; कूर्म, मत्स्य, गरुण तथा ब्रह्माण्ड। , जैन दर्शन * आदिकालः से ही-भारतीय-विचारधारा हमें दो रूपों में विभक्त हुई मिलती-है। पहली. परम्पसमूलक, ब्राह्मण्य या ब्रह्मवादी, जिसका विकास वैदिंक साहित्य. के बृहत्स्वरूप मैं प्रकट हो चुकाः था और दूसरी पुरुषार्थ मूलक, प्रगतिशील, श्रामण्य या श्रमण-प्रधान, जिसमें आचरण को प्रमुखता दी गयी है। जैन साहित्य * है श्वेतांम्बर संप्रदाय के अंग-पग्रन्थ *, 3्वेताम्बर संप्रदाय के आचार्यों ने ।2 आगमिक या अंग-ग्न्धों का संग्रह 2 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

किया था उनके नाम इस प्रकार हैं- - आचारांग सुत।

2. सूयगडंग।

3. थाणंग।

4. समवायांग। 5. भगवती सूत्र 6.

प्र

8.

9.

* नायाधम्मकहाओ।

'. उवासग दसाओ।

अन्तगड दसाओ।

'. अणुतरोव वाइय दसाओ। 40. पण्हावागरणि आइ। . विवाग-सुयं।

2. दिढ़ठिवाय।

प्रकीर्ण ग्रन्थ

- चतुःशरणं।

- आतुएप्रत्याख्यान।

« भक्ति-परिज्ञा।

- संस्तार।

* ताण्डुलवैतालिक।

. चंद्रवेध्यक |

' देवेन्द्रस्तव

8. गणित-विद्या।

9. महाप्रत्याख्यान।

0. वीरस्तव।

यापनीय सम्प्रदाय और उसका साहित्य

प्रमुख आचार्य ग्रन्य का नाम :

. उमास्वाति तत्वार्थाधिगम सूत्र

2. शिवाचार्य आंराधना।

3. शाकटायन शब्दानुशासन, अमोघवृति, सिद्धिमुक्ति

4. स्वयंभू पउमचरिउ, रिट्ठणेमि चरिड।..._

5. त्रिभुवन स्वयंभू 'पउमचरिउ, रिट्ठणेमि पंचमिचरिउ।

6. वादि राज पार्श्वनाथ चरित, यशोधरचरित, एकीभावस्त्रोत, न्याय विनिश्चय, विवरण, प्रमाण निर्णय

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 3 री

कफ एफ फ्रे

पंचस्तूपान्चय और उसका साहित्य

जैन साहित्य के प्रसिद्ध आचार्य वीरसेन, जिनसेन और गुणभद्र पंचस्तूपान्वय सम्प्रदाय के प्रमुख विद्वांन हुए, उनका साहित्य इस प्रकार है। वीरसेन

इन्होंने तीन ग्रन्थ लिखे थे, जिनमें धवल टीका, जयधवल टीका दो ही उपलब्ध हैं। जिनसेन

संयुक्त कृति 'जयधवला” के अतिरिक्त जिनसेन ने 'पाश्व्युदय” और “आदि पुराण” की भी रचना की है। गुणभद्र

इन्होंने “उत्तर पुराण” एवं “आत्मानुशासन” नामक दो ग्रन्थ लिखे। आवक धर्म एवं उसकी आचार्य परम्परा

जैन धर्म में श्रावकाचार की आचार्य परम्परा बहुत पुरातन है। इस उपलब्ध आचार्य परम्परा का क्रम इस प्रकार है-आचार्य कुन्द-कुन्द, स्वामी कार्तिकेय, आचार्य उमास्वाति, आचार्य यतिवृषभ, स्वामी समन्तभद्र, आचार्य जिनसेन, आचार्य सोमदेव, आचार्य देवसेन, आचार्य अमितगति, आचार्य अमृतचन्द्र, आचार्य वसुनन्दि और पं. आशाधर। बौद्ध युग बौद्ध धर्म-प्राचीन भारत का राजधर्म

भगवान तथागत के जीवन-दर्शन के दो ही प्रमुख आधार रहे हैं :

एक व्यष्टिमय और दूसरा समष्टिमय।

प्राचीन भारंत के राजवंशों में मौर्य साम्राज्य का प्रतापी सम्राट अशोक बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा अनुयायी और आश्रयदाता रहा है। बौद्ध साहित्य पालि

पालि साहित्य की रचना तथागत से लेकर आज तक अंबाध गति से हो रही है। पालि के इन १500 वर्षों के इतिहास को बौद्ध साहित्य के दिग्गज विद्वान्‌ श्री अरत सिंह उपाध्याय ने दो मोटे भागों में विभाजित किया है।

. पालि या पिटक साहित्य

2. अनुपालि या अनुपिटक साहित्य त्रिपिटक साहित्य

भगवान के बुद्धत्व प्राप्त करने से लेकर परिनिर्वाण प्राप्त करने के बीच उन्होंने जो कुछ भी कहा उसी का संग्रह-संकलन त्रिपिटक में है। त्रिपिटक अर्थात्‌ तीन पिटारियाँ। जिनका नाम है-सुतपिटक, विनयपिटक एवं अभिधम्मपिटक।

4 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद [

. विनय पिटक इसमें निम्नलिखित ग्रन्थ आते हैं--

. पतिमोक्ख 2. सुक्तविभंग 3. खंधकस 4. परिवार सुतपिटक हि इसमें निम्नलिखित ग्रन्थ आते हैं- . दिघनिकाय 2. मज्झिम निकाय 3. संयुक्त निकाय 4. अज्जतर निकाय 5. खुदूदक निकाय इनमें भगवान बुद्ध के प्रवचन संग्रहीत हैं। अभिधम्म पिटक इसमें निम्नलिखित ग्रन्थ आते हैं- . धम्म संगनी 2. विभंग 3. कथा-वत्थु 4. पुग्गल पनती 5. धातु कथा 6. यमक 7. पत्थनि अनुपिटक साहित्य पु पिटक साहित्य के बाद अनुपिटक साहित्य की रचना हुई, जिसकी स्थिति आज तक बनी हुई है।

प्रथम 'प्राग्वुद्धघोषयुग” में रचे गये अनुपिटक-साहित्य के ग्रन्थों में 'नेतिप्रकरण' "पेटकोपदेश', 'सुतसंग्रह', 'मिलिचन्दपञ्ह” और इतिहास प्रसिद्ध 'दीपवंश” का नाम प्रमुख है। दूसरे 'बुद्धघोषयुग' का आरम्भ आचार्य बुद्धघोष के ग्रन्थ विशुद्धिभग्ग तथा उनके द्वारा रचित “आर्थकथाओं' से होता है। इसके अतिरिक्त बुद्धदत, धम्मपाल की “अर्थकथाएँ” लंका में रचित बृहदूग्रन्थ 'महावंश” 'कच्चान व्याकरण” और अनिरुद्ध का 'अभिधम्मत्थ” संग्रह, आदि की गणना की जाती है। तीसरा उत्तर बुद्धघोष युग” बृहद्‌ अर्थकथा-साहित्य की टीकाओं एवं अनुटीकाओं का युग है, जिसमें रचे गये ग्रन्थों में आचार्य बुद्धघोष कृत 'अर्थ-कथाओं' का मगध भाषा में लिखित टीका कार्य प्रथम है जिसका निर्माण लंका के राजा पराक्रमबाहु के समय बारहवीं शताब्दी में हुआ। बारहवीं, तेरहवीं शताब्दी में सिंहल के भिक्षु सारिपुत एवं उनके शिष्यों ने भी इस दिशा में कार्य किया। “महावंश” का “चूलवंश” भाग भी इसी युग में निर्मित हुआ। बरमी भिक्षुओं ने अनिरुद्ध के “अभिधम्मत्थ” संग्रह की परम्परा में अनेक ग्रन्थों की रचना इसी समय की। वर्तमान सदी में रचे गये आचार्य धर्मानन्‍्द कोशाम्बी के “विशुद्धिमग्गदीपिका” और “अभिधम्मत्थ संग्रह-टीका” भी उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं। निष्कर्ष यह है कि पालि साहित्य के इस तीसरे युग में बर्मा, आदि देशों में विषयावतरण-संस्क्ृृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 5

अनेक अच्छी कृतियों का निर्माण हुआ। संस्कृत के ग्रन्थकार जिस प्रकार बौद्ध धर्म की स्थविरवादी शाखा के प्रायः सम्पूर्ण ग्रन्थ १; भाषा में लिखिंत हैं उसी प्रकार सर्वास्तिवादी शाखा के प्रवर्तक और अनुवर्तक विद्वानों की प्रायः समग्र कृतियाँ संस्कृत भाषा में लिखी हुई मिलती है। बौद्ध विद्वानों की यह एक बड़ी दूरदर्शितां थी कि उन्होंने अपनी कृतियों का प्रणयन पालि को छोड़कर संस्कृत भाषा में किया। अश्वघोष इस प्रकार के संस्कृतानुरागी बौद्ध-विद्वानों में पहला नाम अश्वघोष का है।. अश्वघोष संस्कृत साहित्य के एक सुपरिचित महाकवि एवं बौद्ध न्याय के प्रकाण्ड दार्शनिक भी थे। संस्कृत साहित्य में उनकी गणना भास एवं कालिदास जैसे उच्चकोटि के ग्रन्थकारों से की जाती है। नागार्जुन बौद्ध-न्याय के यशस्वी निर्माता होने के कारण बौद्ध-साहित्य के इतिहास में एवं शीर्ष-स्थानीय भारतीय दर्शनकारों की कोटि में आचार्य नागार्जुन के बहुमुखी व्यक्तित्व एवं उनकी असामान्य प्रतिभा को आदर के साथं स्मरण किया जाता है। कृतियाँ - माध्यमिक कारिका। दशभूमिविभाषा शास्त्र। महाप्रज्ञापारमिता सूत्र कारिका। उपाय-कौशल्य प्रभाव विध्वंसन। विग्रह व्यावर्तिनी। चतुःस्तव। युक्ति षष्ठिका। शून्यता-सप्तति 0. प्रतीत्यसमुत्पादहदयमू। . महायान विंशक। 2. सुहल्लेख। असंग “महायान-संपरिग्रह”, “प्रकरण आर्यवाचा”, “योगाचार भूमि-शास्त्र” “महायानसूत्रलंकार' वसुबन्धु हीनयान संप्रदाय विषयक कृतियां- 'सद्धर्भपुण्डशीकटीका' “महापरिनिर्वाणसूत्र-टीका'

6 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

एस छाए मो छू

“*वज्छेदिका-प्रज्ञापारमिता टीका” “विज्ञप्ति मात्रता सिद्धि!

आचार्य दिडूनाग

आचार्य दिड्नाग ने न्याय-दर्शन पर लगभग 00 पुस्तकें लिखीं। चन्ध गोमिन्‌

इन्होंने 'शिष्यलेख-धर्मकाव्य', आर्यसाधन-शतक, आर्य-तारान्तर-वलिविधि, लोकानंद, चांद व्याकरण लिखीं। धर्मकीर्ति

'प्रमाण-विनिश्चय”, “न्याय-बिन्दु', 'संबंध-परीक्षा', हेतुबिंदु', 'वाद-न्याय', 'समानान्तर सिद्धि” आदि लिखीं। दर्शन शास्त्र

भारतीय दर्शनों की विकास परम्परा को अभ्युदय, भाष्य और वृति, इन तीन कालों में विभक्त किया जा सकता है। सूत्रकाल दर्शनों का अभ्युदय युग है, जिसकी सीमा ईसा की दूसरी-तीसरी शताब्दी तक पहुँचती है। तदन्‍्तर लगभग प5वीं शताब्दी तंक सूत्र ग्रन्थों की निरन्तर व्याख्या होती रही। यही उनका भाष्य-काल है। भाष्य-काल का कुछ भाग और उसके बाद की कुछ शताब्दियाँ उनके बृतिकाल की सूचक हैं।

भारतीय दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण युग उनका भाष्य युग है। इस युग में भारतीय दर्शनों पर जो व्यापक प्रकाश डाला गया, उसके कारण उसका महत्व विश्वविश्रुत हुआ। पारलौकिक जीवन की श्रेष्ठता के सम्मुख ऐहिक जीवन की निष्क्रियताओं की हेय बताने वाले भारतीय दर्शन मानव की बौद्धिक पराकाष्ठा के उज्ज्वल प्रमाण इसी समय सिद्ध हुए नास्तिक दर्शन

नास्तिक वादियों ने वेदों को भाँड, धूर्त और निशाचरों की रचनाएँ बताया है तथा उन पर चलने या विश्वास करने वाले लोगों को अज्ञानी कहा है। चार्वाक्‌-दर्शन घोर जड़वादी दर्शन है। नास्तिक दर्शन की पंचतत्वों के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने की है।.पंचतत्व की जिन सूक्ष्मताओं का विश्लेषण और वैज्ञानिक अध्ययन. द्वारा उनक़े मौलिक पक्षों का प्रतिपादन इन आचारयों ने किया है वह सचमुच अदूभुत एवं विचारणीय है। चार्वाक्‌ दर्शन

यह षड़्‌ नास्तिक दर्शनों में शीर्षस्थानीय है। सांख्य दर्शन

इसके प्रवर्तक महर्षि कपिल हुए। योग दर्शन

योग दर्शन के प्रवर्तक आचार्य पतंजलि हुए।

विषयावतरण-संस्क्ृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन 7

न्याय दर्शन

पदार्थ-मीमांसा के प्रणेता महर्षि गौतम तथा उनकी कृति न्याय-सूत्र है। प्रमाण मीमांसा का अभ्युदय मिथिला के सुप्रसिद्ध नैयायिक गंगेश उपाध्याय ने (१2वीं श.) में 'तत्व चिन्तामणि' ग्रन्थ को लिखकर किया। वैशेषिक दर्शन

इसके प्रवर्तक महर्षि कणाद्‌ हुए, जिनका नाम उलूक तथा कणभुक्‌ भी था, इनके कणादू-सूत्र को औलूक्य दर्शन भी कहते हैं। मीमांसा दर्शन

इसके प्रवर्तक महर्षि जैमिनी हैं। व्याकरण शास्त्र

भाषा और विचारों के तारतम्य के इतिहास को बाँधने वाली भाषा व्याकरण है। व्याकरण एक शास्त्र है, जिसका अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है और जो अपने आप में सवांगपूर्ण है। व्याकरण शास्त्र के आदिम सृष्टा वक्ता एवं प्रवक्ता

संस्कृत साहित्य का यह सर्व-सम्मत सिद्धान्त है कि सभी विद्याओं एवं सारे शास्त्रों के आदिम वक्ता महाज्ञानी ब्रह्मा थे। यद्यपि यह “ब्रह्मा” शब्द कर्तृत्व के कारण अनेक व्यक्तियों का अभिधान वाची रहा है। किन्तु यह प्रायः निश्चित सा हो गया है कि सर्व-विद्या-विद्‌ महा-मेधावी आदि में ब्रह्मा नाम से एक ही व्यक्ति था और वह ऐतिहासिक व्यक्ति था।

ब्रह्मा के बाद व्याकरण शास्त्र के प्रवक्ता बृहस्पति हुए, ब्राह्मण ग्रन्थों में जिन्हें देवों का पुरोहित कहा गया है। वह अर्थशास्त्रकार थे और अगद-तन्त्र का रंचयिता भी उन्हें ही कहा जाता है।

इन्द्र भी व्याकरण के प्रवक्ता थे, उन्होंने बृहस्पति से प्रतिपदपाठ द्वारा शब्दोपदेश का विशेष ज्ञान प्राप्त किया था, किन्तु उनके सम्बन्ध में एक विशेष बातं यह है कि उन्होंने पदों के प्रकृति प्रत्यय विभाग द्वारा तथा शब्दोपदेश प्रक्रिया की कल्पना द्वारा परम्परागत व्याकरण ज्ञान का संस्कार भी किया। उन्होंने पूरा आगत अव्याकृत वाणी को प्रकृति प्रत्यादि संस्कार युक्त किया। व्याकरण के लिये इन्द्र की यह विशेष देन थी।

इस दृष्टि से व्याकरण के आदिम बक्ता ब्रह्मा हुए तथा प्रवक्ता बृहस्पति, इन्द्र, भारद्वाज आदि ऋषि एवं ब्राह्मण

वर्तमान उपलब्ध साहित्य में पाणिनी की अष्टाध्यायी सर्व-विदित है। कुछ आचार्यों का उल्लेख अष्टाध्यायी में किया गया है किन्तु कुछ उससे पूर्व के भी हैं, जिनमें वायु, भारद्वाज, भूगुरि, पौष्करसादि आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। ज्योतिष शास्त्र

ज्योतिष-शास्त्र अपने मूल रूप में बहुत प्राचीन है, उसकी व्यापकता और

8 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

प्रभाव-वेदमंत्रों तक विस्तृत है। ज्योतिष का अस्तित्व वेदों में जितना पुराना है। वेद-मंत्रों और वैदिक साहित्य में हमें उसके सूत्र बिखरे हुए मिलते हैं। इन सूत्रों की व्याख्या और उन पर आगे के विचारकों द्वारा किये गये अनुसंधान के ही फलस्वरूप इतने वृहद्‌ शास्त्र का निर्माण हुआ।

काल-विभाजन . अंधयुग आदिकाल से 0000 ईस्वी पूर्व तक 2. उदयकाल 0000-500 ईस्वी पूर्व तक 3. आदिकाल 500 ईस्वी पूर्व से 500 ईस्वी तक 4. पूर्वमध्यकाल «... 500-000 ईस्वी तक 5. उत्तरमहमध्यकाल 000-600 ईस्वी तक 6. आधुनिककाल 600 ईस्वी से अब तक

भारतीय ज्योतिष के क्षेत्र में महाराज सवाई जयसिंह का नाम आदर के साथ लिया जाता है। जयसिंह का जन्म 686 ईस्वी में हुआ और 699 ईस्वी के , लगभग ॥3 वर्ष की उम्र में ही वे गदूदी पर बैठे। उनके प्रोत्साहन से भारतीय ज्योतिष में अन्वेषण की नवीन दिशाएँ प्रकाश में आयीं।

भारतीय ज्योतिष का प्रचार-प्रसार अरब तथा अरब से यूरोप और फिर अमेरिका आदि देशों में हुआ। शब्दांकों का प्रयोग

भारत में शब्दांकों को प्रयोग का प्रचलन वैदिक युग में ही विद्यमान था। अक्षर संकेतों का प्रयोग

अंकों की संख्या को सूचित करने के लिये शब्द संकेतों के अतिरिक्त अक्षर संकेतों या वर्ण संकेतों का भी प्रचलन भारतीय ज्योतिष में सर्वत्र मिलता है। शब्द संकेतों की पद्धति कुछ जटिल, विस्तृत और दुःसाध्य होने के कारण ही सम्भवतः अक्षर संकेतों का प्रयोग हुआ। आयुर्वेद शास्त्र

आयुर्वेद के महान ज्ञान का इतिहास बहुत लम्बा है। आयुर्वेद शास्त्र के पहले उपदेष्टा सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हुए। युगक्रम के अनुपात से बुद्धि विवेक को दृष्टि में रखकर बाद में इन्द्र से भारद्वाज, धन्वन्तरि आदि ने जो ज्ञान प्राप्त किया थौं, वह अष्टाज़् पूर्ण होता हुआ भी किसी एक अंग पर अधिक केन्द्रित था। उदाहरणार्थ धन्वन्तरि ने भिषक्‌ क्रिया पर अधिक बल दिया, तो पुनर्वसु ने काग्र-चिकित्सा पर - और कश्यप ने केवल कौमार-भृत्य पर।

एक जीवनोपयोगी शास्त्र होने के नाते आयुर्वेद ने यथेष्ट लोकप्रियता और प्रसिद्धि प्राप्त की उसने अपना स्वतन्त्र सर्वाज्नीण विकास किया और दूसरे शास्त्रों का प्रपूरक होने के कारण बड़ी मान्यता प्राप्त की। स्मृतियों और पुरांणों की विधियों में शरीर शास्त्र की पर्याप्त चर्चाएँ मिलती हैं। साँख्य एवं योग प्रभृति

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 9

दर्शन के सम्प्रदायों से आयुर्वेद विषय का बौद्धिक पक्ष प्रभावित है। इसी प्रकार वेदांत दर्शन ने उसको आद्यात्म बल दिया।

आयुर्वेद में यद्यपि शरीर-विज्ञान की विधियाँ बतायी गयी हैं तथापि उसकी आयु सहतसरों वर्ष प्राचीन है। ऋग्वेद में आयुर्वेद के जन्मदाता दिवोदास, भारद्वाज और अश्विनी कुमार आदि आचार्यों और परमर्षियों का उल्लेख मिलता है। काश्यप संहिता में आयुर्वेद का उद्भव “अथर्व-उपनिषद्‌” के रूप में कहा गया है। आयुर्वेद के उपयोगी ज्ञान से संस्कृत के सभी प्रमुख ग्रन्थकारों की कृतियाँ प्रभावित हैं। धर्म-शास्त्र

स्मृतियों का निर्माण हिन्दू धर्म की चरमोन्‍नति का सूचक है। “श्रुति! और स्मृति” ये दोनों शब्द व्यापक अर्थ के पर्यायवाची शब्द हैं। श्रुति से जिस प्रकार बेद, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्‌ आदि ग्रन्थों का बोध होता है, उसी प्रकार स्मृति शब्द के अन्तर्गत घड़वेदांग, धर्म-शास्त्र, इतिहास, पुराण, अर्थ-शास्त्र और नीति-शास्त्र इन सभी विषयों का अन्तर्भाव हो जाता है। श्रुति और स्मृति का यही व्यापक अर्थ-बोध है। विशिष्ट रूप से स्मृति शब्द को, बाद के ग्रन्थकारों ने धर्म-शास्त्र का पर्यायवाची मान लिया, किन्तु “श्रुति! के साथ जहाँ भी “स्मृतिः शब्द को संयुक्त करके कहा जाता है, वहाँ उसका अर्थ धर्म-शास्त्र तक सीमित रहकर वह व्यापक अर्थ का बोध कराता है। धर्म-शास्त्र उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें राजा-प्रजा के अधिकार, कर्तव्य, सामाजिक आचार-विचार, व्यवस्था, वर्णाश्रमधर्म, नीति, सदाचार और शासन-सम्बन्धी नियमों की व्यवस्था का वर्णन होता है।

स्मृतियों के निर्माता हुए हैं-मनु, याज्ञवल्क्य, अत्रि, विष्णु, हारीत, उशसनू, अंगिरा, यम, कात्यायन, पराशर, व्यास, दक्ष, गौतम, वशिष्ठ, नारद, भृगु।

“मानव-धर्म-शास्त्र” इस विषय का सर्वाधिक प्राचीन अंग था। मनु को मानव जाति के आदि पुरुष के रूप में संहिता और ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में स्मरण क्रिया जाता है। इस दृष्टि से यह प्रतीत होता है कि बहुत सम्भव है कि वर्तमान मनु स्मृति की रचना “मानव-धर्म-शांस्त्र' के सूत्रों के आधार पर की गयी हो। संगीत शास्त्र हि

भारतीय संगीत के पहले आचार्य भरत, हुए। भरत के नांट्य-शास्त्र में ज़ातियों का जो वर्णन दिया गया है, प्रकारान्तर से वह राग-रागनियों का सूचक है। राग“रांगनियों की चर्चा सर्वप्रथम नारदकृत “संगीत मकरन्द” में मिलती है। तत्पश्चात्‌ शिवमत, कृष्णमत, भरतमत औरं हन्मुन्मत का आविर्भाव हुआ। इन सबके पश्चात्‌ संगीत रत्नाकर” इस दिंशां का उल्लेखनीय ग्रन्थ है। शब्द कोश मु

_ प्राचीन समय में व्याकरण और कोश का विषय लगभग एक ही श्रेणी में 20./ वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

गिना जाता था। यही कारण था कि जिन पुरातन आचारयों ने व्याकरण की रचना की, वही प्रायः कोशकार भी थे। व्याकरण और कोश, दोनों एक ही शब्द शास्त्र * के अंग थे।

सभी प्राचीन कोश प्रायः विलुप्त हैं। वैदिक शब्दकोश

निघण्टु और निरुक्त, प्राचीन वैदिक शब्द कोशों के सम्बन्ध में यथा स्थान उल्लेख किया जा चुका हैं। निधण्दु और निरुक्त का एक संस्करण डॉ.. लक्ष्मण स्वरूप ने लाहौर से प्रकाशित कराया था। 'वेदार्थ-शब्दकोश” नाम से भी चमूपति ने एक सुन्दर शब्दकोश तीन भागों में लाहौर से प्रकाशित कराया था। लौकिक शब्दकोश

लौकिक संस्कृत में कोश ग्रन्थों के निर्माण का प्रारम्भ, बैंदिक शब्द कोश निघण्टु के ही आधार पर एवं उसी की शैली अनुसार हुआ। लौकिक संस्कृत के शब्दकोश एक ही प्रकार के नहीं हैं। कुछ कोशों में तो संज्ञा शब्दों एवं धातु शब्दों का ही संग्रह है और कुछ शब्द कोंश संज्ञा शब्दों तथा अवयवों को ही लेकर रचे गये। ऐसे शब्द कोशों का क्रम अकारादि वर्णों से होकर पद्यबद्ध रूप से हुआ है। इन शब्द कोशों में समानार्थक और नानायिक, दो प्रकार के शब्दों पर विचार किया गया है। आधुनिक कोश

कोश-प्रन्थों का कार्य आज भी उत्कर्ष पर है। आधुनिक कोश ग्रन्थों में तारानांथ तर्कवाचस्पति का वाचस्पत्यं, राधाकांत देव का “शब्द कल्पद्ठुम, विजयराजेन्द्रसूरि का 'अभिधान राजेन्द्र-कोश', सुखानन्द नाथ का 'शब्दार्थचिन्तामणि/ आदि विश्व-कोश के स्तर के वृहद्‌ ग्रन्थ हैं। नाटक

संस्कृत-साहित्य में नाटकों की अपनी एक विशिष्ट परम्परा रही है। ऋग्वेद के निर्माण तक, जो कि वैंदिक साहित्य का प्राचीनंतम भाग और विश्व-साहित्य के क्षेत्र में पहला ज्ञान संग्रह है, नृत्यकला पर्याप्त प्रकाश में चुकी थी। संस्कृत के नाटकों की अति प्राचीनता के सम्बन्ध में ऋग्वेद के बाद यजुर्वेद में भी कुछ विस्तार से चर्चा की गयी है। यजुर्वेद की 'वाजसनेईसंहिता” के एक प्रसंग से अवगत होता है कि वैदिक युग में एक शैलूष नामक जाति के लोग व्यावसायिक रूप से नाटकों का आयोजन कर जीविकोपार्जन किया करते थे।

सेंस्कृत साहित्य में नाटकों की व्यवस्थित परम्परा का अनुवर्तन भास से होता है। आधुनिक विद्वानों को भास का परिचय यंद्यंपि हाल ही में प्राप्त हुआ है, किन्तु उनके व्यक्तित्व की महिमा बाण, दण्डी, भामह, वाक्पतिराज, वामन, राज-शेखर, अभिनव गुप्त, पृभृति काव्यकारों एवं काव्य-शास्त्रियों की रचनाओं में सर्वत्र बिखरी हुई थी। हु

विषयावत्तरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 2]

भास

भास की कृतियों का प्रसिद्ध अर्थशास्त्री बृहस्पति और कौटिल्य के साथ भाषा वैज्ञानिक परीक्षण के बाद इतिहासकारों ने यहाँ तक सिद्ध किया है कि भास का स्थितिकाल पाँचवीं से चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व था।

भासकृत 8 नाटक कृतियों' का रचनाक्रम विद्वानों ने इस प्रकार बताया है-दूतवाक्य, कर्ण-भार, दूतघटोत्कच, ऊरुभंग, मध्यमव्यायोग, पंचरात्र, अभिषेक, बाल-चरित, अविमारक, प्रतिमा, प्रतिज्ञायौगन्‍्धरायण, स्वप्नवासवदत्त, चारूदत्त। कालिदास

नाठकों के निर्माण की परम्परा में भास के बाद कालिदास महाकवि का नाम आता है। कुछ विद्वानों ने कालिदास से भी पहले 'मृच्छठकटिकम्‌” के रचयिता शूद्रक का उल्लेख किया है किन्तु हम कालिदास को शूद्रक के पूर्ववर्ती मानते हैं।

नाढकों के क्षेत्र में महाकवि ने “मालविकाम्निमित्रम्‌', 'विक्रमोर्वशीयम्‌', “अभिज्ञान-शाकुन्तलम्‌” इन कृतियों का प्रणयन किया है।

अश्वघोष

कालिदास के बाद अश्वघोष का नाम उल्लेखनीय है। इनका “शारिपुत्र-प्रकरणः या “शरद्धतीपुत्र-प्रकरण” उपलब्ध होता है। -शूद्क संस्कृत नाटकों की समृद्ध परम्परा के क्रम में शाकुन्तल के बाद “मृच्छकटिकम्‌' का नाम आता है जिसका लेखक शूद्रक नामक कोई राजा या कवि था। हर्षवर्धन शूद्रक के बाद हर्षवर्धन का क्रम आता है। सम्राट हर्ष वर्धन के ऐतिहासिक व्यक्तित्व के बारे में विद्वान्‌ एक मत होने पर भी उनके नाम से संबद्ध नाटकों का रचयिता उन्हें मानकर उनके नाम पर लिखे हुए, उनके किसी आश्रित कवि को मानते हैं, किन्तु इस कारण की पुष्टि के लिये कोई प्रमाण नहीं है। (प्रियदर्शिका', 'रत्नावली” और “नागानन्द” ये तीन कृतियाँ हर्ष के नाम से प्रचलित हैं। भवभूति भवभूति ने रामायण की कथा के आधार पर *“उत्तररामचरितम्‌, मालतीमाधवम्‌, नागानन्द, रामाभ्युदय” नामक नाटक लिखे। विशाख दत भवभूति के बाद-विशाख दत का क्रम आता है। “मुद्राराक्षस” “देवीचन्द्रगुप्त'- के अतिरिक्त विशाख़दत ने एक तीसरी नाट्यकृति “राघवानन्द” का भी निर्माण किया, जो सम्प्रति उपलब्ध नहीं है, किन्तु उसके उद्धरण सुभाषित ग्रन्थों में विद्वानों को मिले हैं। 22 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

नारायण भटूट

नारायण भट्ट के वेणी-संहार' का स्थान भवभूति एवं विशाख दत के नाटकों के बाद आता है। मुरारि

इन्होंने अनर्धराघव” की रचना की है। अनंगहर्ष

अनंगहर्ष “मातृराज” ने “तापसवत्सराज” नाटक लिखा, जिसका समय अविदित है। मायुराज

एक अज्ञात लेखक मायुराज ने रामायण की कथा के आधार पर “उदातराघव! नाटक की रचना की, जो अपने मूल रूप में उपलब्ध नहीं है। शक्ति भद्र

आठवीं शताब्दी में विद्यमान शक्तिभद्र नामक एक नाटककार का नाम मद्रास में प्रकाशित उनके “आश्चर्य-चूड़ामणि" नामक नाटक से ज्ञात हुआ है। 'कीथ' ने इसका नाम “आश्चर्य-मंजरी” लिखा था। हनुमनूनाटक का रचियता

आठवीं शताब्दी के बाद दक्षिण में एक “'हनुमन्‍नाटक' या 'महानाटक' लिखा गया। आज उसके दो बहुत भिन्‍न पाठ उपलब्ध होते हैं। पहला दामोदर कृत और दूसरा मधुसूदन कृत। इन दोनो में दामोदर मिश्र की रचना मूल ग्रंन्‍्थ के अधिक निकट है। राजशेखर

“बाल-रामायण” से विदित होता है कि राजशेखर ने छः प्रबंधों की रचना की थी, जिनमे 5 ही उपलब्ध हैं। उनके नाम हैं- कर्पूर मंजरी, विद्धशालाभम्जिका, “बाल-रामायण' और “बाल-भारत” ये उनकी नाट्य कृतियाँ हैं और * काव्य-मीमांसा' अलंकार-ग्रन्थ है। उनके छठे महाकाव्य * हर विलास” का भी उल्लेख हेमचन्द्र ने किया 'है। अपने अलंकार ग्रन्थ में उन्होने स्वरचित एक भूगोल विषयक ग्रन्थ “भुवन-कोश” का उल्लेख किया है।

राजशेखर ने भीम कृत पाँच नाटकों का उल्लेचा किया है, जिनके लेखक का समय .राजशेखर से पहले होना चाहिए था वे सभी नाटक सम्प्रति उपलब्ध नहीं हैं। उनमें तीन के नाम हैं-- 'स्वप्न दशानन', 'प्रतिज्ञा चाणक्य” और “मनोरमावत्सलराज!। क्षेमीश्वर

क्षेमीश्वर ने 'चण्डी शतक” और “नैषधानन्द” नामक दो नाटक लिखे। दिज्लनाग

राजशेखर के बाद दिड्नाग की “कुन्द माला” में सस्कृत नाटकों की परम्परा पुनरुज्जीवित हुई। सन 928 ई० में “कुन्द माला” का प्रकाशन हो चुकने के बाद

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 23

दिड्जनाग के सम्बंध में उनके आलोचकों ने कुछ बाते कहीं-जो भ्रमपूर्ण थी किन्तु अब यह सर्वथा निराकृत हो चुका है कि तो 'कुन्द माला” के रचियता दिज्ञनाग भवभूति के पूर्ववर्ती थे, और ही कालिदास “मेबदूत” में उद्धृत दिज्ञनाग, नाटककार दिड्नाग थे। साथ ही यह भी निश्चित हो चुका है कि बौद्ध दिज्ञनाग, नाटककार दिड्ढनाग से भिन्‍न एवं पूर्ववर्ती थे। ॥7 वीं शताब्दी के अन्य नाटक

क्षेमेन्द्र 'चित्र-भारत', 'कनकजानकी” विल्हण “कर्णसुन्दरी” कृष्णमिश्र प्रबोध चन्द्रोदय' 2 वीं शताब्दी के नाटक

यशचन्द्र 5 'मुदितकुमुतद-चन्द्र' कनकाचार्य “घन्डजयविजय' रामचन्द्र गा “नलविलास', “निर्भय भीम', 'सत्यहरिश्चन्द्रा

“कौमुदीमित्रा नन्‍द', “यादवाभ्युदय” आदि। विग्रहराजदेव विशालदेव -- हरकेलि नाटक

सोमदेव विग्रहराज सुभट कवि. - दूतांगद 3 वीं शताब्दी के नाटक जयदेव गा प्रसन्‍नराघव मदनकवि +- परिजातमंजरी यशपाल मोह-पराजय मोक्ष्तादित्य॒ भीमविक्रम रामभद्रमुनि . प्रबुद्ध रौहिणेय रविवर्मा जे प्रचुम्नाभ्युदय बालकवि . - रन्तुकेतूदय, रविवर्माविलास

हस्तिमल्ल.. + विक्रान्तकौरव, मैथिली कल्याण, अंजनापवनज्जय, सुभद्रा, उदयनराज

भरतराज, अर्जुनराज, मेघेश्वर

रांजरुद्रदेव . उषर्गेदियं नाटिका, ययातिचरित नाटक।

]4 वीं शताब्दीं के नाटक विद्यानाथ - प्रतापरुद्रीयकल्याण ' विश्वनाथ सौगन्धिकाँहरंण विरुपाक्ष 4 शी नारायण विलास मणिक हे भरतानन्द उदण्ड न्‍ मल्लिकामारुत

5 वीं शताब्दी के नाटक... 24 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

वामन भट्ट बाण

ब्रह्मसूरि - गंगा धर ब-> हरिहर गा रूपगोस्वामी न्‍-

श्री रामदेव -

जीवरामयाज्ञिक -

6 वीं शताब्दी के नाटक

शेषकृष्ण कि

रलखेट श्री निवास दीक्षित-

यज्ञनारायण दीक्षित .+- लक्ष्मण माणिक्य देव. - विलिनाथ - गोकुलनाथ सठकोप - कुमारवाताचार्य रामानुज

7र्वी शताब्दी के नाटक

नेपाल नरेश जगज्योतिर्मल्‍ल-- गुरुराम रलचूड़ामणिदीक्षित . - नीलकण्ठ दीक्षित वेंकटाध्वरि रुद्रदास - महादेव रामभद्र दीक्षित - नल्लिका कवि साम-राज दीक्षित गा

8वीं शताब्दी के नाटक

विश्वेश्वर कवि

“पार्वती परिणय', 'कनकलेखा कल्याण! “श्रृंगारभूषण'

ज्योति-प्रभा कल्याण

गंगादासप्रताप विलास

भर्तृहरि-निर्वेद “दानकेलिकौमुदी',“विदग्धमाधव',* “ललित-माधव' “सुभद्रापरिणय','रामाभ्युदय', 'पाण्डवाभ्युदय!

'मुरारि-विजय!

कंसवध

“भौमिपरिणय!

“रघुनाथ विलास” हू “कुवलयाश्चरित”, “विख्यात-विजयः' “मदनमंजरी महोत्सव” “मुदितमालसा”, “अमृतोदयः! “वसन्तिकापरिणय!

'परिजात नाटक!

“वसुलक्ष्मी कल्याण!

“हर गौरी विवाह”

“सुभद्रा धनजय”, “रतनेश्वर प्रसादन' “आनन्द राघव', “कमलिनी-कलहंसः

“नल चरित” (अपूर्ण)

'प्रद्युम्नानन्द'

“चन्द्रलेखासटूटक'

“अदूभुतदर्पण!

“जानकी परिणय!

“सुभद्रा परिणय!

“श्री दाम चरित', 'चितवृति कल्याण', जीवन मुक्ति-कल्याण', तथा “श्रुगांर सर्वस्व भाण'

“रुक्मणि-परिणय', 'नवनाटिका',

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 25

“श्रृगांरमंजरी'

देवराज - “बालमार्तण्डविजय' राजवर्मन्‌ 5 “रुक्मणि-परिणय', श्रृंगार सुधाकर! विश्वनाथ - 'मृगांक लेखन! देवकवि गा “विद्या-परिणय', “जीवानन्दनम्‌”। भूदेवशुक्ल के “धर्म-विजय' 9वीं शताब्दी के नाटक «.. पद्मनाभ 5 “त्रिपुर विजय” व्यायोग बल्लिशाय - “ययातितरुण नन्दन! शिवेन्द्र के राजकवि._ - *रामराज्यभिषेक', “बालि परिणय”, “कुण्डिनगोत्रीय” रामचन्द्र का “श्रृंगार सुर्धाणव' ईश्वरसेन के राजकवि --चैत्रयज्ञ' पंचानन -अमरमज्नल! श्री अम्बिकाक्ष्त व्यास -सामवतम्‌' 20वीं शताब्दी

महामहोपाध्यायशंकरलाल-'सावित्री चरित्‌', 'ध्रुवाभ्युदय', “भद्रयुवराज', “वामनविजय', 'पार्वती-परिणय” मूलशंकर मणिकलाल - "क्षत्रपति साम्राज्य', 'प्रतापविजय', “संयोगिता-स्वयंवर' इस प्रकार संस्कृत में नाटक-रचना की स्थिति को देखकर निश्चय ही यह विश्वास होता है कि पूर्णसंतोषजनक सही, पर इस दिशा में कुछ कार्य अवश्य हो रहा है। संस्कृत साहित्य की अन्य विचार-वीथियों की तरह यह दिशा नितान्त सूनी नहीं है। फिर भी संस्कृत के समर्थक एवं उन्‍नायक विद्वानों के लिये यह आवश्यक है कि वे द्वुतगति से संस्कृत की परम्परा को आधुनिक प्रतिमानों में ढालकर उसे सम सामयिक रूप देने तथा उसकी अवरुद्ध समृद्धि को आगे बढ़ाने के लिये अपनी मौलिक कृतियों को लेकर इस क्षेत्र में अवतरित हों। रूपक के भेद भाण ; भाण रचना एकांकी होती है। उसमें भाव, भाषा और सरणि की श्रेष्ठता रहती है। हाल ही में कुछ भाण रचनाएँ प्राप्त हुई हैं जो इस प्रकार हैं-वररुचि ने “उभयाभिसाएस्का', शुद्रक ने 'पद्मप्राभृतक', श्यामलिक ने “पादताड़ित” और ईश्वरदत्त ने 'धूर्तविट-संवाद' भाण लिखे। प्रहसन संस्कृत के प्रहसनों में एक मार्मिक व्यंग्य होने की वजह से उनकी बड़ी 26 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुरवंद

ख्याति और लोक-प्रियता भी रही है। इनमें यद्यपि अश्लीलता भी कहीं-कहीं दिखाई देती है, किन्तु चार्वाक्‌ू, जैन, बौद्ध, कापालिक आदि वेद-विरोधी धर्मानुयायियों के प्रति उनमें जो आक्षेप किये गये हैं वे बड़े ही मार्मिक हैं।

बोधायन-क्ृत “भगवदज्जुक” ईसा की प्रथम दो शताब्दियों के आस-पास लिखा गया सबसे प्राचीन प्रहसन है। 'एकांकी

एक अंक में समाप्त होने वाले रूपक-उपरूपकों को संस्कृत के काव्यशास्त्रियों ने अनेक श्रेणियों में विभाजित किया है। डॉ. कीथ ने एक अंक में परिसमाप्य इन नाटकों को एकांकी (0॥6-४०-?॥७५) कहा है। 4वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में विजय-नगर के हरिहर द्वितीय के पुत्र विरुपाक्ष ने एक एकांकी “उन्मत्त-राघव/ लिखा। इस प्रकार “विक्रमोर्वशीय” के चौथे अंक का प्रभाव है। व्यायोग

व्यायोग रचनाओं में भासकृत “मध्यम व्यायोग”, 'दूतवाक्य”, “दूतघटोत्कच”, “कर्ण-भार', “उरुभंग' प्रमुख हैं। रूपक के कुछ अप्रचलित भेद

रूपक के भेदों में नाटक, प्रकरण, भाण, प्रहसन और व्यायोग पर पर्याप्त कृतियाँ रची गयीं और वे लोक-प्रिय भी सिद्ध हुईं। इनके अतिरिक्त डिम, समवकार, वीथी, अंक और ईहामृग इन पांच भेदों का प्रचलन प्रायः बहुत कम रहा है। रूपक के प्रायः इन सभी अप्रचलित भेदों पर वत्सराज ने एक-एक कृति का निर्माण कर अपने पाण्डित्य का परिचय दिया और संस्कृत साहित्य की एक अपूरणीय क्षति को भी पूर्ण किया। प्रतीकात्मक शैली के नाटक

अश्वघोष-“शापिपूत्र-प्रकरण', कृष्ण-मिश्र-प्रबोध चन्द्रोदय ( छाया नाटक

इस परम्परा में सुभटकवि (2वीं शताब्दी) का दूतागंद प्रतिनिधि रचना है। तत्पश्चात्‌ 5वीं शताब्दी में व्यास श्री रामदेव ने “सुभद्रापरिणय”, “रामाभ्युदय', “पाण्डवाभ्युदय” नाटक लिखे, जिनमें 'सुभद्रा परिणय”, सुभट की शैली पर लिखा गया छाया नाटक है। महाकाव्य

“रामायण', “महाभारत”, 'डलियड” और “ओडेसी” आदि ग्रन्थ आज प्रथम महाकाव्य कहे जाते हैं। महाकाव्यों की परम्परा को सामान्यतः तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहली श्रेणी में वे महाकाव्य आते हैं जो विशुद्ध संस्कृत में लिखे गये, जैसे कि कालिदास, माघ, श्री हर्ष आदि के ग्रन्थ तथा दूसरी श्रेणी में पालि तथा प्राकृत भाषा के महाकाव्य आते हैं और तीसरी श्रेणी के महाकाव्य अपभ्र॑श में हैं, जिनसे हिन्दी साहित्य में काव्य-परम्परा का प्रवर्तन हुआ।

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 27

ऐतिहासिक दृष्टि से संस्कृत महाकाव्यों की लम्बी परम्परा को हमने तीन विभिन्‍न युगों में विभाजित किया है।;पहला उद्भव युग-कालिदास से पहले, दूसरी अभ्युत्थान युग-कालिदास से श्री हर्ष तक तीसरा हास युग-तेरहवीं शत्ती से अब तक। उद्भव युगीन महाकाव्य-रामायण, महाभारत हैं। अभ्युदय युग में-सर्व-प्रथम कालिदास का नाम आता है। कालिदास

इनकी कृतियां इस प्रकार हैं-“ऋतुसंहार', “कुमार-सम्भव”, “मालविकाम्निमित्र', “विक्रमोर्वशीय', “'मेघदूत”, 'रघुवंश” और “अभिज्ञान शाकुन्तलम्‌"। अश्वघोष

महाकवि कालिदास के बाद अश्वघोष का स्थान है। अश्वघोष की जिन कृतियों के सम्बन्ध में सभी विद्वान्‌ एक मत हैं उनके नाम हैं : “बुद्ध चरित', “सौन्दरनन्द', “शारिपुत्र प्रकरण” इनमें आदि की दोनों कृतियां महाकाव्य हैं। बुद्धघोष

बौद्धाचार्य बुद्धोष ने दस सर्गों की एक कृति “पदूम-चूड़ामणि! नाम से लिखी इनका पहला ग्रन्थ 'विसुद्धिमग्ग” है। भीम या भीमक

बुद्धघोष के बाद महाकवि भीम या भीमक ने 27 सर्गों की एक कृति “रावणार्जुनीय' या “अर्जुन रावणीय” लिखी। भर्तुमिंठ

इन्होंने 'हयग्रीववध” लिखा जो सम्प्रति उपलब्ध नहीं है। भारवि

भारवि की कवित्व कीर्ति को अक्षुण्ण बनाये रखने वाला उनका एक मात्र ग्रन्थ 'किरातार्जुनीयम्‌” है। इसकी गणना बृहत्तयी (किरात, माघ, नैषध) में की जाती है। भट्रिट

महाकाव्यों के क्षेत्र में भारवि के बाद भट्रिट का क्रम आता है। महाकवि भट्ट ने अपने महाकाव्य “भट्रिटकाव्यः या 'रावणवध” की रचना की। कुमारदास

कुमारदास भट्ट के अनुवर्ती महाकवि हैं। इन्होंने 25 सर्गों के "जानकी हरण” नामक महाकाव्य की रचना की थी, जिसके अब 5 सर्ग ही उपलब्ध हैं। _इस काव्य में रामकथा का बड़ा ही हृदय-प्राही चित्रण है। माघ

कुमारदास के अनन्तर महाकाव्यों की परम्परा को समृद्धिशाली रूप देने वालों में महाकविं माघ का नाम आता है। महाकवि माघ की कवित्वकीर्ति का अमर

28 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

स्मारक उनका 'शिशुपाल वध” या “माघकाव्य' है। माघ शब्दार्थवादी कवि थे। रत्नाकर

इन्होंने 'हरविजय” नामक महाकाव्य की रचना की है। शिव स्वामी

काश्मीर के ही दूसरे महाकवि शिव-स्वामी ने 'कफ्फिणाभ्युदय” नामक महाकाव्य का निर्माण किया। अभिनन्द

इन्होंने 36 सर्गों में एक 'रामचरित” महाकाव्य लिखा। शंकुक

इन्होंने 'भुवनाभ्युदय” नामक महाकाव्य की रचना की। क्षेमेन्द्र

इन्होंने 'दशावतारचरित” की रचना की है। मंखक

क्षेमेन्द्र के ही समकालीन एवं एक देशीय महाकवि मंखक हुए हैं, इनके महाकाव्य का नाम “श्री कंठचरित” है। हरिश्चन्द्र

इन्होंने 'धर्मशर्माभ्युदय” महाकाव्य लिखा। हेमचन्द्र

इन्होंने “दयाश्रय काव्य' और “त्रिषष्टिशलाकापुरुष-चरित्र” नामक दो महाकाव्यों की रचना की। माधव भटूट

इन्होंने 'ररामायण” और “महाभारत” के आधार पर 3 सर्गों का एक महाकांव्य *राघव पाण्डवीय” लिखा। चण्डकवि विल्वमंगल

चण्डकवि ने “पृथ्वीराज विजय” महाकाव्य लिखा, जो केवल आठ-सर्गों में ही अपूर्ण प्राप्त होता है। वाग्भट

जैन कवि ने '"नेमिनिर्वाण” महाकाव्य लिखा। वाग्भट नामक चार ग्रन्थकारों का उल्लेख श्रद्धेय श्री नाथूराम जी प्रेमी ने अपने इतिहास ग्रन्थ में किया है। श्री हर्ष ;

बारहवीं शताब्दी में लिखे गये महाकाव्यों की परम्परा का अवसान श्री हर्ष के “नैषधचरित” में जाकर होता है। इसी के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि उन्होंने निम्न आठ अन्य ग्रन्थ भी लिखे-स्वैर्यविचार प्रकरण, विजय प्रशस्ति, खंडनखंडकाव्य, गौडोवीराकुल-प्रशस्ति, अर्णववर्णन, छिन्द प्रशस्ति, शिवभक्ति सिद्धि। नवसाहसांक चरित-चम्पू।

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 29

ऐतिहासिक महाकाव्य

संस्कृत साहित्य में इतिहास विषयक सामग्री प्रायः चार रूपों में उपलब्ध होती है। कुछ ग्रन्थकारों ने अपने पूर्ववर्ती ऐतिहासिक ग्रन्थों का उल्लेख किया है, किन्तु वे सम्प्रति उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी प्रकार की ऐतिहासिक सामग्री हमें दान-पात्रों, अन्तर्लेखों, प्रशस्तियों आदि में मिलती है। तीसरी प्रकार की सामग्री 'रामायण', “महाभारत” एवं “पुराण” आदि महाग्रन्धों में प्राप्त होती है और चौथी प्रकार की यथेष्ट सामग्री काव्य-परक इतिहास ग्रन्थों में संकलित है।

ऐतिहासिक महाकाव्यों के क्षेत्र में लिखी गयी सर्वाधिक प्रौढ़ कृति कल्हण की राजतरंगिणी है। अपनी इस महानतम कृति का निर्माण कल्हण ने अपने पूर्ववर्ती ] इतिहास-प्रन्थों के परिशीलन के फलस्वरूप किया था। काश्मीर के राजा जयसिंह के राज्य काल में “राज-तरंगिणी” का निर्माण हुआ।

महाकवि कल्हण के ये आँखों देखे वर्णन पूर्णतया सत्य हैं, और इस दृष्टि से यह मानने में तनिक भी संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती कि संस्कृत-साहित्य में इतिहास विषय पर ग्रन्थ-निर्माण की परम्परा का अभाव था।

'पालि” भाषा का विकास प्राकृत बोलियों के रूप में हुआ है। इन प्राकृत बोलियों की प्रमुख शाखाएँ हैं, मागधी, अर्धमागधी, शौरसेनी, पैशाची और महाराष्ट्री

विषय की दृष्टि से पालि में दो प्रकार के काव्यों का निर्माण हुआ-वर्णनात्मक और आख्यात्मक। पहली श्रेणी के काव्यों में कस्सप का “अनागत वंश” और बरमी भिक्षु मेघंकर कृत 'लोकप्पदीपसार” या “'लोकदीपसार' आदि का नाम उल्लेखनीय है।

संस्कृत साहित्य का ऐतिहासिक विषय अत्यन्त ही विवाद और अनेक मुखी सिद्धान्तों का विषय रहा है। संस्कृत के ग्रन्थों और ग्रन्थकारों की ऐतिहासिकता के सम्बन्ध में आज भी विद्वानों में मतैक्य नहीं है। बहुत सारी सामग्री मन गढ़न्त और अज्ञानता वश इतिहास-प्रन्थों में ऐसी भी देखने को मिलती है, जिसके वास्तविक-ज्ञान मूल्य कुछ और ही थे। काव्य-साहित्य की समृद्धि (काव्य-साहित्य)

संस्कृत का सम्पूर्ण काव्य-साहित्य विषय और रचना-शैली के विकास की दृष्टि से तीन श्रेणियों या तीन युगों में अलग-अलग किया जा सकता है। पहली श्रेणी के काव्य रामायण” और “महाभारत” हैं। ये लौकिक एवं वैदिक संधिकाल के काव्य हैं। दूसरे युग का प्रतिनिधित्व अकेले महाकवि कालिदास की कृतियाँ करती हैं और तीसरी श्रेणी में कालिदास के बाद की कृतियों को रखा जा सकता है।

काव्य का विषय बहुत व्यापक है। संस्कृत साहित्य का लगभग अर्धाश एक ही काव्य-विषय के भीतर समा जाता है। खंड काव्य, महाकाव्य, गीति काव्य,

30 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

चम्पूकाव्य, ऐतिहासिक काव्य, कथा काव्य, सुभाषित काव्य, गद्य काव्य और नाटक आदि अनेक विषयों का एक ही काव्य विषय के भीतर समावेश हो जाता है। नाटक और महाकाव्यों के प्रपूरक अंग होने पर भी उनको स्वतंत्र प्रकरणों में रखा गया है। उसका कारण काव्य के अन्य अंगों की अपेक्षा उनके रचना विधान का वैशिष्ट्य और उनका व्यापक प्रभाव है। जिनकी कीर्तिकथा प्रस्तरखण्डों पर उत्कीर्णित है

संस्कृत साहित्य के कुछ सिद्ध हस्त कवियों की उज्ज्वल कथा पाषाण खण्डों पर उत्कीर्णित प्रशस्तियों एवं अन्तर्लेखों के रूप में जीवित है। ऐसे काव्यकारों में हरिशेण, वीरसेन, वत्सभट्ट, रविशांति, वासुल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। गीति काव्य

“गीत” या “गीति' का अर्थ सामान्यतया गाना समझ लिया जाता है, जिसमें साज श्रृगांर, गायन, वादन की प्रधानता हो, कन्ति यहाँ गीति या गीत से तात्पर्य हृदय की रागात्मक भावना को छन्दबद्ध रूप से प्रकट करना अभिप्रेत है। गीतिकाव्य में रागात्मकता या ध्वन्यात्मकता होना धूम्र में अग्नि की भाँति अनिवार्य है। गीति काव्य की भावना की उद्भूति

गीति काब्यों के प्रणयन में संस्कृत के कवियों में विशेष उत्सुकता दिखाई देती है। इस प्रकार की स्फुट संदेश रचनाओं का अनुवर्तन लगभंग वैदिक युग में ही हो चुका था, और उदाहरण स्वरूप ऋग्वेद में सरमा नामक एक कुत्ते को पणियों के निकट संदेश वाहक रूप में भेजने का प्रसंग यहां स्मरण किये जाने योग्य है। “रामायण, “महाभारत” और उनके परवर्ती काव्यों में भी इस प्रकार के स्फुट प्रसंग प्रचुर रूप से मिले हैं। गीति काव्य के भेद

संस्कृत के यह गीति काव्य कई प्रकार से लिखे गये हैं यथा--

4. स्त्रोत काव्य या भक्ति काव्य।

2. श्रृंगार काव्य या संदेश काव्य। संदेश काव्य

संदेश काव्य या दूत काव्य की परम्परा में 'मेघदूत" और “घटकर्पर” काव्य आरम्भिक कृतियां हैं। इन दोनों के रचयिता क्रमशः महाकवि कालिदास और घटकर्पर कवि हुए। कथा काव्य

संस्कृत के कथा साहित्य का विकास बैदिक संस्कृत लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत और अपशभ्रंश आदि कई स्थितियों एवं युगों में से होकर गुजरता रहा है। इन सभी युगों में कथा-साहित्य का अपना एक ही जैसा दृष्टिकोण या एक ही जैसा शिल्प सौन्दर्य एवं मान्यताएँ नहीं रही हैं।

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 3।

पौराणिक युग ने कथा साहित्य को अधिक लोकव्यापी बनाया। पुराणों की कथाओं का अस्तित्व बहुत समय तक समाज में मौखिक रूप में बना रहा और इसलिये एक ओर तो उनमें अनेक प्रक्षेप जुड़े और दूसरी ओर उनके स्वत्व पर स्वतंत्र दन्‍्त कथाओं का निर्माण हुआ। सुभाषित काव्य

सुभाषित काव्य संस्कृत साहित्य के श्रृगांर हैं। संस्कृत के छोटे-बड़े सभी तरह के सुभाषित काव्यों की सूक्तियों को अपने-अपने ग्रन्थों में उद्धृत कर, उनके प्रति अपना अनुराग प्रकट किया। विभिन्‍न ग्रन्थों में विकीर्णित इन सुभाषित ग्रन्थों की सूक्तियों से एक बड़ा भारी लाभ संस्कृत के ग्रन्थकारों का इतिहास जानने में हुआ है।

ग्रन्थ रूप में प्रमाणिकता से उपलब्ध होने वाला पहला सुभाषित काव्य “गाथा सप्तशती' है, जो महाराष्ट्री प्राकृत के सात सौ श्लोकों में लिखित है। नीति विषयक उपदेशात्मक काव्य

ग्रन्थ रूप में चाणक्य शतक” पहला नीति ग्रन्थ है जिसमें 340 श्लोक संगृहीत हैं और सम्भवतया उसके लेखक सुप्रसिद्ध “अर्थशास्त्र” के निर्माता एवं चन्द्रगुप्त मौर्य (400 ईस्वी पूर्व) के प्रधान सचिव कौटिल्य, चाणक्य या विष्णुगुप्त ही हैं। इसी चाणक्य ने “राजनीति समुच्चय” एवं “वृद्ध चाणक्य” नामक दो ग्रन्थ लिखे। बौद्धों का 'धम्मपद” भी इसी कोटि का ग्रन्थ है। गद्य काव्य

आचार्य दण्डी संस्कृत के प्रथम ग्रन्थकार हैं “दण्डी” सम्भवतः एक उपाधिनाम था। दण्डी को तीन ग्रन्थों का प्रणेता बताया गया है। “काव्यादर्श' “दशकुमारचरितम्‌ तथा “अवन्ति सुंदरी कथा” उनकी श्रेष्ठ रचनाएँ हैं।

आचार्य दण्डी के बाद कथा-काव्य के क्षेत्र में सुबन्धु का नाम प्रमुख रूप से उपलब्ध होता है। इनकी कृतियों में (800 पेज) “वासवंदता” ही गद्य काव्य की एक मात्र कृति है।

दण्डी और सुबन्धु के बाद बाण का क्रम आता है। बाण ने “कादम्बरी', “हर्षचरित” दो महत्वपूर्ण ग्रन्थ दिये।

तत्पश्चात्‌ धनपाल (000 ईस्वी ) की 'तिलक मंजरी”, वादीभ सिंह (00 ईस्बी) की “गद्यचिन्तामणि” साढल्‍ल (00 ईस्वी) की “उदयसुन्दंरीकथा” अगस्त्य (7400 ईस्वी) का “कृष्ण चरितः और वामन भट्ट बाण (600 ईस्वी) का “बेमभूपाल चरित” आदि का नाम उल्लेखनीय है। काव्य शास्त्र

संस्कृत साहित्य के काव्य या कविता अंग की विधि-व्यवस्थाओं का विवेचन, समीक्षण करने वाला शास्त्र ही काव्य-शास्त्र है। उससे हमें काव्य का स्वरूप,

32 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

लक्षण, स्वभाव, प्रवृति और उसकी विभिन्‍न समस्याओं एवं विचार-विभेदों का वैज्ञानिक निरूपण देखने को मिलता है। मेधाविन काव्य-शास्त्र के क्षेत्र में मेधावी या मेधाविन्‌ अथवा मेधाविरुद्र नाम के एक . प्राचीन आचार्य हुए हैं, जिनका कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है, किन्तु जिन्हें इतिहास में भामह और दण्डी के समकक्ष रखा गया है। भामह आचार्य भामह से काव्य-शास्त्र की उन्‍नत परम्परा का आरम्भ माना जाता है। इनके ग्रन्थ 'काव्यालंकार' से, नाट्यशास्त्र की चाहरदीवारी से आबद्ध 'काव्य-शास्त्र” की बंदी आत्मा को सर्वथा स्वतंत्र-दिशा में विकसित होने का सुयोग मिला। दण्डी दण्डी काव्य-शास्त्र के प्रमुख आचारों में से हैं। “दण्डी” के तीन ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं-“काव्यादर्श', 'दशकुमारचरितम्‌! और “अवन्ति सुंदरी कथा” अंतिम दोनों ग्रन्थ काव्य के हैं। 'काव्यादर्श' इनका आचार्य श्रेणी का ग्रन्थ है। उद्भट भट्ट आचार्य उद्भट प्रथम कोटि के काव्य-शास्त्री हुए। उद्भट का प्रधान ग्रन्थ “काव्यालंकार सार संग्रह” है। जिसको बूलर साहब ने 'जैसलमेर' से प्राप्त किया था। वामन आचार्य वामन रीति सम्प्रदाय के जन्मदाता थे। वामन का एक काव्य-पग्रन्थ “काव्यालंकारसूत्र” है, जिस पर गोपेन्द्र त्रिपुरहल भूपाल की टीका “कामधेनु' है। इसकी एक महेश्वर प्रणीत “साहित्य-सर्वस्व” नामक टीका का भी पता लगा.है। रुद्रट “अलंकार सम्प्रदाय” के अनुयायी आचार्यों में रुद्रट का स्थान प्रमुख है। रुद्रट * का एक ही उपलब्ध ग्रन्थ है 'काव्यालंकार', यह पहला ग्रन्थ है, जिसमें अलंकारों का वैज्ञानिक ढंग से वर्गीकरण हुआ है। आननन्‍्द-वर्धन भारतीय काव्य-शास्त्र के इतिहास में आनन्द वर्धन का बड़ा नाम है। उन्हें ध्वनि सम्प्रदाय का जन्मदाता कहा जाता है। आनन्द-वर्धन का प्रमुख ग्रन्थ “ध्वन्यालोक' वृति है। राजशेखर इनका आचार्य श्रेणी का ग्रन्थ “काव्यमीमांसा' है। धनंज्जय धनज्जय महामुनि भरत की परम्परा के आचार्य हुए। उनका ग्रन्थ नाट्य-शास्त्र की श्रेणी का ग्रन्थ है। है विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 33

धनिक

धनंज्जय के अनुज धनिक ने “दशरूपक” की तरिकाओं पर “अवलोक' नामक टीका लिखी। अभिनव गुप्त

यह ध्वनि समर्थक आचार्य आनन्द वर्धन की परम्परा में हुए वे कवि, काव्य-शास्त्री और उद्भट दार्शनिक भी थे। काव्य-शास्त्र पर उन्होंने “अभिनव भारती*, 'ध्वन्यालोक लोचन' और “काव्यकौस्तुभ-विवरण' नामकटीका ग्रन्थ क्रमशः भरत के “नाट्य-शास्त्र', आनन्दवर्धन के 'ध्वन्यालोक' और अपने गुरु भदृतौत के “काव्यकौस्तुभ! पर लिखे। कुंतक या कुंतल

कुंतक एक नये “वक्रोक्ति सम्प्रदाय” के पिता हुए, इनका “वक्रोक्ति-काव्यजीवित' ग्रन्थ अपूर्ण ही उपलब्ध है। महिम भटूट

महिम भटूट अद्भुत तार्किक और प्रखर आलोचक थे। इनका एक मात्र ग्रन्थ “व्यक्ति विवेक” उपलब्ध है। काव्य-शास्त्र पर इन्होंने एक दूसरा ग्रन्थ “तत्वोक्ति कोश' भी लिखा था, जो उपलब्ध नहीं है। क्षेमेन्द्र

क्षेमेन्द्र ने अपना दूसरा नाम व्यासदास लिखा है। इनके दो ग्रन्थ “औचित्य विचार चर्या”' और “कविकंठाभरण” प्रकाशित हैं। भोजराज

भोजराज उन-विरले भाग्यशाली लोगों में से थे जिन पर लक्ष्मी और सरस्वती दोनों की कृपा रहती है। भोज के ज्योतिष ग्रन्थ 'राज-मृगांक' का रचनाकाल 964 शक (042 ईस्वी) है। इनके काव्य-शास्त्र विषयक दो ग्रन्थ उपलब्ध हैं। “सरस्वती-कंठाभरण” और “श्रृंगार प्रकाश” मम्मट

“काव्य-शास्त्र” के इतिहास में राजानक मम्मट बड़े सम्मान से याद किये जाते हैं। “मम्मट' के ग्रन्थ का नाम “काव्यप्रकाश' है। यह ग्रन्थ सम्पूर्ण काव्य-शास्त्र का प्राण है। रुय्यक

राजानक रुय्यक भी काश्मीरी थे। इनके काव्यशास्त्र-विषयक ग्रन्थों के नाम हैं-“अलंकार सर्वस्व”, “व्यक्ति विवेक विचार', “काव्यप्रकाश संकेत”, “सहृदय लीला', “अलंकार मंजरी”, “अलंकारानुसारणी'”, “साहित्य मीमांसा” “नाटक मीमांसाः और “अलंकार वार्तिक' मखंक

इन्होंने “अलंकार सर्वस्व” के वृति भाग की रचना की।

34 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

वाग्भट प्रथम

इन्होंने “वाग्भटालंकार” की रचना की है। इस ग्रन्थ पर लगभग आठ टीकाएँ लिखी गयी हैं। हेमचन्द्र

काव्य-शास्त्र” पर इन्होंने 'काव्यानुशासन' ग्रन्थ लिखा और उस पर “अलंकार-चूड़ामणि! नामक वृति तथा “विवेक” नामक टीका लिखी। जयदेव

इनके ग्रन्थ का नाम *चन्द्रालोक' है। इसके पंचम्मयूख को परिवर्धित करके अप्पयदीक्षित ने 'कुवलयानन्द” लिखा। विश्वनाथ

राजानक मम्मट के बाद कविराज विश्वनाथ को ही स्मरण किया जाता है। “साहित्य-दर्पण” विश्वनाथ का आचार्य श्रेणी का ग्रन्थ है। 'साहित्य-दर्पण' काव्य-शास्त्र का विश्वकोश है। भानुदत

“रसमंजरी” और “रसतरंगिणी” दोनों इनके आचार्य श्रेणी कें ग्रन्थ हैं। अप्पयदीक्षित

काव्य-शास्त्र विषयक उनके तीन ग्रन्थ हैं-'कुवलयानंद', 'चित्रमीमांसा! और “वृति-वार्तिक' जगन्नाथ

काव्य-शास्त्र के इतिहास में पण्डित राज का स्थान बहुत ऊँचा है। काव्य के क्षेत्र में इन्होंने 'भामिनी-विलास”', “आसफ-विलास” “गंगा-लहरी', 'करुणा-लहरी', “अमृत-लहरी”, “लक्ष्मी-लहरी” आदि तथा काव्य-शास्त्र के क्षेत्र में 'चित्रमीमांसा खण्डन” तथा “रसगंगाधर” लिखे। काव्य-शास्त्र में सम्प्रदाय चिंतन

आचार्य नन्दिकेश्वर और भरत (ईस्वी पूर्व प्रथण शतक) से लेकर पण्डित राज जगन्नाथ (700 ईस्वी) तक काव्य-शास्त्र की परम्परा निरन्तर आगे बढ़ती रही। सम्प्रदायों और इनके प्रवर्तकों का विवरण इस प्रकार है-

. रस सम्प्रदाय - नन्दिकेश्वर, भरत

2. अलंकार सम्प्रदाय - भामह, उद्भट, रूद्रट। 3. रीति सम्प्रदाय - दण्डी, वामन।

4. वक्रोक्ति सम्प्रदाय - कुन्तक।

5. ध्वनि सम्प्रदाय - आनन्द वर्धन।

इस प्रकार संस्कृत साहित्य की विशालता को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया। उपजीव्य काव्य वाल्मीकि रामायण प्रत्येक साहित्य में प्रतिभाशाली कवियों की लेखनी से प्रसूत कतिपय ऐसे विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 35

मर्मस्पर्शी काव्य हुआ करते. हैं जिनसे स्फूर्ति तथा प्रेरणा लेकर अवान्तर कालीन कविगण अपने काव्यों को सजाया करते हैं। ऐसे काव्यों को हम व्यापक प्रभाव सम्पन्न होने के हेतु “उपजीव्य काव्य” के नाम से पुकार सकते हैं। संस्कृत साहित्य में भी ऐसे उपजीव्य काव्य विद्यमान हैं जिनसे संस्कृत भाषा तथा अर्वाचीन प्रान्तीय भाषाओं के कवियों ने अपने विषय के निर्देश के लिये तथा काव्य शैली के विमल विधान के निमित्त संतत्‌ उत्साह तथा अअश्रान्त स्फूर्ति ग्रहण की और आज भी वे कर रहे हैं। ऐसे उपजीव्य काव्य संख्या में तीन हैं-

. रामायण. 2. महाभारत 3. श्रीमद्भागवत्‌

इन तीनों का अवान्तर काव्य साहित्य के ऊपर बड़ा ही विशाल मार्मिक तथा आभ्यन्तर प्रभाव पड़ा है।

वाल्मीकि समग्र कविसमाज के उपजीव्य हैं--विशेषतः कालिदास तथा भवभूति के। इन दोनों महाकवियों ने रामायण का गाढ़ें अनुशीलन किया था और इनकी कविता में हमें जो रस मिलता है, उसमें रामायण की भक्ति कम सहायक नहीं रही है। कालिदास का श्रृंगार रस सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, परन्तु इनका करुण रस कम प्रभावशाली नहीं है। “कालिदास” ने उभयविध “करुण” को उपस्थित कर उसे साज्ञोपाज् रूप से दिखलाया है। पत्नी के लिये पति की करुणा का रूप रघुवंश के “अज-विलाप' में पाते हैं और पति के निमित्त पतल्ली की करुण परिवेदना 'रति-विलाप! के रूप में हमें रुलाती है। ताप से लोहा भी पिघल उठता है, तब कोमल हृदय मानव-चित्त संताप से मूदु बन जाये क्या इस विषय में संदेह के लिए स्थान है? “अभितप्त मयोऊपि मार्दव॑ भजते कैव कथा शरीरिषु'।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि रामायण एक उपजीव्य काव्य है। अर्थात्‌ परवर्ती काव्यकारों को इससे प्रेरणा मिलती है। आदि काव्य रामायण

संस्कृत साहित्य में महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण “आदि काव्य” समझा जाता है तथा “वाल्मीकि” “आदि कवि? माने जाते हैं।

तामस-हारिणी तमसा कल-कल करती हुई बह रही थी, उसका पावनतट वृक्षों की स्निग्ध छाया से शीतल था। तीर में तो पड्ढू कलड्डू की तरह व्याप्त था और शैवाल दुष्ट-जनों की चित्त-वृति के समान उसे कलझ्लित कर रहा था। मनोभिराम जल सज्जनों के चित्त की भाँति नितान्त प्रसन्‍न था। महर्षि वाल्मीकि के हृदय को इस दृश्य ने लुभा दिया, उन्होंने स्नानकर, वल्कल पहनकर इस प्रकार के शांत वन में भ्रमण करना शुरू किया। इसी समय क्रोज्ची के करुण क्रन्दन ने उनकी दया दृष्टि को अपनी ओर खींचा। उनके सामने क्रौज्वी का मृत कलेवर खून में लथपथ हो रहा था। इस दृश्य को देखकर ऋषि के कोमल चित में नैसर्गिकी करुणा का स्रोत प्रवाहित होने लगा, सुप्त करुणा इस दृश्य से बलातू जाग पड़ी। अकस्मात्‌ उनके मुँह से यह श्लोकात्मक वागू वैखरी प्रस्खलित हुई-

36 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

मा निषाद! प्रतिष्ठाम्‌ त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्‌ क्रौज्वीमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्‌ ।। सम अक्षर युक्त चार पदों से मण्डित 'श्लोक' का जन्म हो गया। संस्कृत काव्य-कुमार का यही उदय है। महाकाव्य की भाविनी परम्परा का यही मूल स्रोत है। महाकाव्य का प्रथम तथा भव्य निदर्शन है-यही वाल्मीकि रामायण। रामायण का ही विश्लेषण कर आलड्कारिकों ने “महाकाव्य” का लक्षण प्रस्तुत किया है “सर्गबन्धोमहाकाव्यं' लक्षणं का प्रथम तथा सबसे सुन्दर लक्ष्य है-रामायण। दण्डी का यह प्रसिद्ध लक्षण 'रामायण” को ही आदर्श मानकर लिखा गया है- “अलडूकृतमसंक्षिप्त रसभाव निरन्तरम्‌ सर्वैरनतिविस्तीर्णैं: श्राव्यवृत्तैः सुसन्धिभिः ।। सर्वत्रभिन्‍नवृतान्तैरूपेतं लोकरञ्जनम्‌। काव्यं कल्पान्तरस्थायि जायेत सदलड्कृति।।”? उपरोक्त सम्पूर्ण विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण आदि काव्य एवं काव्य-परम्परा का प्रेरणा स्रोत है। रामायण का आकार वाल्मीकि कृत “रामायण' में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचन्द्र के जीवन का काव्यमय वर्णन है। उसकी वर्तमान प्रति में सात काण्ड हैं, जिनमें कुल 24000 श्लोक हैं। यद्यपि “वाल्मीकि रामायण' का प्रचार सम्पूर्ण भारत में है तथापि सब प्रान्तों में रामायण का पाठ एक सा नहीं है। पाठ-भेद के अतिरिक्त रामायण की कुछ प्रतियों में कई ऐसे श्लोक, वृत्तान्त और सर्ग पाये जाते हैं जिनका अन्य-प्रतियों में अस्तित्व ही नहीं है। रामायण में प्राप्त सात काण्ड इस प्रकार हैं-

. बालकाण्ड प्र7 सर्ग। 2. अयोध्याकाण्ड 9 सर्ग। 3. अरण्यकाण्ड प्र5 सर्ग। 4. किष्किन्धाकाण्ड. - 67 सर्ग। 5. सुन्दरकाण्ड 68 सर्ग। 6. युद्धकाण्ड - 28 सर्ग। 7. उत्तरकाण्ड - ]] सर्ग। 645

24000 श्लोकों से युक्त होने के कारण ही रामायण को “चतुर्विशति संहिता” कहा जाता है। विषय वस्तु वाल्मीकि रामायण आदि कवि की आदि रचना है, विषय वस्तु की दृष्टि से इंसे सीमा: में बांधना असम्भव है। रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 37

के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। इसमें श्री राम के जन्म, रावण-राम युद्ध एवं भगवान का राज्याभिषेक तथा उनका स्वर्ग-गमन ये मुख्य बिन्दु हैं जिनके आधार पर सम्पूर्ण रामायण का रचना कार्य सम्पन्न हुआ है। इनके अतिरिक्त और भी ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जिनका वर्णन रामायण में प्राप्त होता है किन्तु रामायण का मूल उद्देश्य पाप पर पुण्य की विजय ही है। रामायण में प्राप्त होने वाले अन्य विषय कुछ इस प्रकार हैं-आदि कवि के विषय में कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा है कि रामायण के लक्षणों के आधार पर ही दण्डी आदि ने काव्यों की परिभाषा बतलाई। त्रयम्बकराज मखानी ने सुन्दर काण्ड की व्याख्या में प्रायः सभी श्लोकों को अलंकार, रसादियुक्त मानकर काण्ड नाम की सार्थकता दिखलाई है। वास्तव में बात भी ऐसी ही है। सुन्दर काण्ड का पाँचवाँ सर्ग तो नितान्त सुन्दर है ही। श्री मखानी ने सभी के उदाहरण भी दिये हैं। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि किसी प्राचीन काव्य को बिना देखे ही उन्होंने सर्वोत्तम ग्रन्थ का निर्माण कर दिया। इनका प्राकृतिक चित्रण भी बहुत सुन्दर, है। इन्होंने ज्योतिष शास्त्र को भी परम प्रमाण माना है। त्रिजटा के स्वप्न, श्री राम की यात्रा-कालिक मुहूर्त विचार, विभीषण द्वारा लंका के अपशकुनों का प्रतिपादन आदि ज्योतिर्विज्ञान के ज्ञापक तथा समर्थक हैं। इसके अतिरिक्त तन्त्रशास्त्र, राजनीति, आयुर्वेद, विज्ञान आदि सभी से सम्बन्धित सामग्री रामायण में प्राप्त होती है। महर्षि की दृष्टि में ज्योतिष तनत्र, आयुर्वेद, शकुन आदि शास्त्रों की प्राचीनता एवं समीचीनता ज्ञात होती है। वस्तुतः यही परम आस्तिक की दृष्टि होती है। धर्म-शास्त्र के लिये तो यह ग्रन्थ परम प्रमाण है ही, अन्य ऐतिहासिक कथाएँ भी बहुत हैं, अर्थ-शास्त्र की भी पर्याप्त सामग्री है। व्यवहार तथा आचार की भी बातें हैं, कुशल मार्ग का भी प्रदर्शन है। रामायण की उत्पत्ति एवं रचनाकाल

यह माना जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना राम के राज्य काल में ही पूर्ण कर ली थी। पर्टिजर महोदय का कथन है कि राम 660 पूर्व हुए थे दूसरी ओर कुछ आधुनिक अनुसंधान कर्ताओं ने “महाभारत' में द्रोणपर्व एवं शान्ति पर्व तथा अन्य निर्देशों से अनुमान लगाया है कि वाल्मीकि जी ने अपनी रामायण की रचना पहले से प्रचलित राम-कथा सम्बन्धी आख्यानों के आधार पर ही की और वाल्मीकि राम के समकालीन नहीं थे। इन्हीं अनुसंधान कर्ताओं के अनुसार प्रारम्भ में 'रामायण” का आकार बहुत छोटा था, किन्तु वह समय के प्रवाह के साथ-साथ बढ़ता गया।

समुचित प्रमाणों के आधार पर “रामायण” का रचना काल निर्धारित करने का प्रयास करना चाहिये। यदि ध्यान से देखा जाये तो हमारे समक्ष “रामायण” के दो रूप पूर्ण रूपेण स्पष्ट हो जाते हैं। पहला तो मौलिक रामायण का प्रक्षेप रहित रूप जो महर्षि वाल्मीकि जी की प्रामाणिक रचना है तथा दूत्तरा वर्तमान प्रचलित

38 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

“रामायण” का रूप जिसमें अनेक प्रक्षिप्तांश हैं। इन दोनों रूपों का रचनाकाल अलग-अलग माना जाता है। याकोबी ने मूल रामायण का रचना काल 800-600 ईस्वी पूर्व निर्धारित किया है तथा प्रक्षेप युक्त रूप 'रामायण' का रचना काल अधिकांश यूरोपीय विद्वान द्विशताब्दी ई० पू० के बाद का नहीं मानते हैं। “रामायण में केवल एक ही स्थान पर बुद्ध का नाम आया है किन्तु वह भी प्रक्षिप्त ही है क्योंकि यह सब प्रतियों में नहीं पाया जाता है इसके अतिरिक्त मूल रामायण के रचनाकाल से परवर्ती ग्रन्थकार पाणिनी, भास, कौटिल्य और पतन्जलि रामायण के मुख्य कथानक से पूर्णतया परिचित जान पड़ते हैं। यद्यपि पाणिनी ने रामायण में आये हुए अनेक शब्दों की व्युत्पत्ति दिखलाई है, तथापि “रामायण” में अनेक ऐसे आर्ष प्रयोग भी पाये जाते हैं जिनका पाणिनीय व्याकरण से कोई समन्वय नहीं दीखता। “रामायण” को अलंकृत एवं परिष्कृत शैली तथा महाभारत” की ऊबड़-खाबड़ शैली के अध्ययन से विद्वान्‌ इस निष्कर्ष पर भी पहुंचे हैं कि “रामायण! में एक पूर्ववर्ती कधानक को “महाभारत” की अपेक्षा अधिक परवर्ती भाषा और शैली में चित्रित किया गया है। बौद्ध ग्रन्थों में 'दशरथ-जातक' इत्यादि की उपलब्धि भी बुद्ध के आविर्भाव से पूर्व राम कथा की प्रसिद्धि में प्रमाण स्वरूप उपस्थित होती है। दूसरी ओर रामायण में बौद्ध प्रभाव खोजने पर भी नहीं मिलता। इन सबके अतिरिक्त रामायण” के कुछ अन्तर्वर्ती साक्ष्यों के आधार पर भी “रामायण” का 600 ईस्वी पूर्व ही रचा जाना सिद्ध होता है। 500 ईस्वी पूर्व में पाटलिपुत्र की स्थापना मगध-नरेश अजात शत्रु के द्वारा गंगा और शोण नदियों के संगम पर की गयी थी। “रामायण में राम वन जाते समय गंगा और शोण के संगम पर से तो जाते हैं किन्तु वहां पाटलिपुत्र नाम का उल्लेख नहीं है। इस आधार पर भी रामायण का कम से कम अजातशलत्रु के प्रादुर्भाव से पूर्व बनना अवश्य सिद्ध होता है। बौद्धग्रन्धों में श्रावस्ती का नाम प्रसेनजित की राजधानी के रूप में मिलता है किन्तु अयोध्या का नाम साकेत मिलता है जो निश्चय ही “रामायण” की बौद्धग्रन्थों की अपेक्षा प्राचीनता सिद्ध करता है। तीसरे, 'रामायण' से विशाला तथा मिथिला इन दो स्वतन्त्र राज्यों का उल्लेख प्राप्त होता है। विशाला इक्ष्वाकुपुत्र विशाल द्वारा स्थापित की गयी थी तथा मिथिला राजा जनक की राजधानी थी। बौद्ध ग्रन्थों में इन दोनों राज्यों का वैशाली के रूप में सम्मिलित वर्णन किया गया है तथा यहाँ गणतंत्र शासन प्रणाली का प्रचलित होना दिखलाया गया है। इस कारण से भी “रामायण” का बौद्धों से पहले बना होना सिद्ध होता है। चौथे, रामायण में उत्तरी भारत में कौशल अंग, कान्य-कुंब्ज, मगध, मिथिला आदि अनेक छोटे-छोटे आर्य राज्यों का उल्लेख किया गया है। ऐसी राजनीतिक स्थिति भगवान बुद्ध के पूर्व ही थी। अतः रामायण की रचना भगवान बुद्ध से पूर्व हो चुकी थी। इसके अतिरिक्त प्रो० सिलवां लेवी ने “सद्धर्ममृत्युत्थान' नामक बौद्ध विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन » 39

ग्रन्थ का अध्ययन कर सिद्ध किया है कि यह ग्रन्थ महर्षि वाल्मीकि का ऋणी है तथा जम्बू द्वीप वर्णन 'रामायण' के दिग्वर्णन से पूर्णतः मिलता है। इसी प्रकार इस ग्रन्थ में नदियों, समुद्रों, देशों और द्वीपों का वर्णन बिल्कुल उसी शैली में किया गया है जैसा कि “रामायण” के अन्तर्गत मिलता है।

इन सबके आधार पर रामायण बौद्धों से पूर्व किसी समय पूर्ण हो चुकी थी। रामायण के प्रक्षिप्ताश

लोकप्रिय होने के कारण रामायण में निरन्तर कुछ कुछ प्रक्षेप होते हैं। उनके प्रायः सभी आलोचकों का मत है कि बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड मूल ग्रन्थ में नहीं थे, वे बाद में जोड़ दिये गये। प्रो. याकोबी के मतानुसार “रामायण” के मूलपाठ में अयोध्या काण्ड से युद्ध काण्ड तक पाँच ही काण्ड थे। युद्ध काण्ड के अन्त में दी गयी फलश्रुति से रामायण की समाप्ति यहीं पर स्पष्ट जान पड़ती है। उत्तरकाण्ड की रचना-शैली अन्य प्रामाणिक काण्डों की शैली से भिन्‍न है, इसकी आधी से-अधिक सामग्री रामचरित से सम्बन्ध नहीं रखती और जो सम्बन्ध रखती है, उसमें भी एकता नहीं है। उत्तरकाण्ड में अन्य काण्डों को देखते हुए पुनरुक्ति दोष तथा अन्य विरोधी बातें भी मिलती हैं। उदाहरणार्थ-युद्ध काण्ड के अन्तिम सर्ग में सुग्रीव, विभीषण आदि के चले जाने का स्पष्ट उल्लेख हुआ है, फिर भी उत्तरकाण्ड में पुनः उनके प्रस्थान का वर्णन किया गया है। उत्तरकाण्ड के 7वें सर्ग में वेदवती की कथा आती है, जिसके अनुसार सीता अपने पूर्वजन्म में वेदवती ही थीं। यदि यह वृत्तान्त प्रक्षिपत होता तो उसका उल्लेख “रामायण” के अन्य काण्डों में जहाँ सीता जन्म का प्रसंग आया है, अवश्य किया जाता। साथ ही, यह भी उल्लिखित है कि महाभारत के 'रामोपाख्यान” में तथा संस्कृत के अनेक रामकाब्यों में उत्तरकाण्ड की कथा वर्णित नहीं है।

बाल-काण्ड की शैली भी बहुत कुछ उत्तर-काण्ड की शैली जैसी है। उसका भी प्रायः आधा भाग रामचरित से सम्बन्ध नहीं रखता। उसकी भी अनेक दक्तियाँ बाद में पाँच काण्डों से मेल नहीं खातीं। उदाहरणार्थ-बाल-काण्ड में लक्ष्मण और उर्मिला का विवाह वर्णित है, किन्तु अरण्यकाण्ड में शूर्पणखा के प्रसंग में लक्ष्मण को अविवाहित बताया गया है। केवल बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में राम हमारे सामने विष्णु के अवतार के रूप में आते हैं। अन्य काण्डों में, कुछ प्रक्षिप्त स्थानों को छोड़कर वे एक आदर्श मानवीय महापुरुष की भाँति ही चित्रित किये गये हैं। इन प्रक्षिप्त दो काण्डों में महाभारत की भाँति कथानक का स्वाभाविक प्रवाह भी आनुषंगिक आख्यानों से बहुधा अवरुद्ध हो गया है। अन्य काण्डों में ऐसे आख्यानों की संख्या बहुत थोड़ी है। हि . इसका तात्पर्य यह है कि अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड तक प्रक्षिप्त अंश है ही नहीं। इन पाँचों काण्डों में भी कई प्रक्षेप हैं पर वे भिन्न प्रकार के हैं। इन प्रक्षेपों की सृष्टि सूतों और कुशीलवों द्वारा हुई, जिन्होंने इन काण्डों के हृदय-ग्राही-अंशों

40 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

का विस्तार कर दिया। जब सहृदय श्रोतागण दशरथ, कौशल्या या सीता के करण विलापों का वर्णन सुन नेत्रों से अश्रु-विमोचन करने लगते, या रांम-रावण के प्रचंण्ड पराक्रम पूर्ण युद्ध-वर्णन से प्रभावित होने लगते, अथवा नीतियुक्त या शील-सौन्दर्य परिचालक शक्तियों पर मन्त्र-मुग्ध होने लगते, तब इन कुशीलवों को वाग्विस्तार और अपनी कल्पना के प्रसार का अच्छा अवसर मिल जाता। इस प्रकार “रामायण! के प्रक्षेपों की सृष्टि हुई।

महाभारत की भाँति “रामायण” का नियतरूप लेखबद्ध होने पर ही निर्धारित हो सका। परन्तु यह तभी हुआ होगां जब “रामायण” इतनी प्रसिद्ध हो गयीं होगी कि उसका श्रवण और परायण पुण्य-कर्म माना जाने लगा और उसे लिपिबद्ध करने वाला स्वर्ग का अधिकारी समझा जाने लगा। इसलिये 'रामायण' के प्रथम संग्रह कर्ताओं तथा संपादकों के समक्ष जो कुछ भी रामायण के नाम से निर्दिष्ट सामग्री प्रस्तुत की गयी उसका उन्होंने स्वागत किया और उसे आलोचक की दृष्टि से नहीं अपितु भक्ति-भावना पूर्वक लिखित रूप दिया। यदि सम्पूर्ण भारतवर्ष के प्रचलित पाठ-भेदों को छोड़ दिया जाये तो “रामायण” के मूल रूप का अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसां करने से “रामायण” के 24,000 श्लोकों में से केवल एक चौथाई बचे रहते हैं। रामायण का महाकाव्यत्व

“रामायण! संस्कृत कां प्रथम महाकाव्य माना जाता है, किन्तु महाकाव्य के आधुनिक स्वरूप के आधार पर उसे महाकाव्य नहीं कहा जा सकता है और ही उसके रचयिता को यह आशा रही होगी कि उसकी रचना कभी महाकाव्य की कोटि में गिनी जायेगी। यदि हम “रामायण” को प्रथम काव्य कहकर युग विशेष का प्रतिनिधि महाकाव्य कहें तो असंगत होगा। इसमें अन्य अदूभुत वर्णनों के साथ ही वीर-भावना का प्राधान्य है। जो इस बात का परिचायक है कि यह महाकाव्य भारत के प्राचीनतम इतिहास के किसी वीर-युग का प्रतिनिधित्व करने वाला है।

“रामायण” महाकाव्य के विषय में विद्वानों का मत है कि वह अनेक आख्यानों का संग्रह है। वैदिक काल से ही प्रचलित कुछ गाथाओं तथा देवी-देवताओं, दैत्यों, राक्षसों, नागों और ऋषि-मुनियों की कथाओं के आधार पर इस वृहत्काय काव्य-प्रन्थ की रचना की गयी। यही नहीं समयानुसार इसमें वीरों की स्तुतियों को भी सम्बद्ध कर दिया गया। यहं भी अनुमान लगाया जाता है कि रामायण-काल से भी पूर्व सूत, चारणादि लोग रामचरित सम्बन्धी वीर-स्तुतियों का प्रचार करते रहे होंगे उनके द्वारा राजसभाओं में इन स्तुतियों का गायन तथा कुशीलवों द्वारा विविध-स्थानों में जाकर सर्व-साधारण को स्तुतियाँ गाकर प्रसन्‍न करने से भी इनका अत्यधिक प्रचार हुआ होगा।

वाल्मीकि ने प्राचीन काल से मौखिक रूप में चले रहे अनेक आख्यानों

विषयावतरणं-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन/ 4।

और उपाख्यानों का सार समेटकर उसको इस रूप में प्रस्तुत किया। विशेष रूप से उसकी प्रधान विषय वस्तु उसके निर्माण काल से बहुत पूर्व की है। पूर्वागत कथाएँ ही इस महाकाव्य में अपनी सिद्धावस्था को प्राप्त हो गयी हैं। पूर्वागत आख्यान और उपाख्यान ही संस्कृत महाकाव्यों के उद्भव रूप हैं और इन्हीं का संकलन, संशोधन एवं परिवर्तन करके “रामायण” का विशाल कलेवर निर्मित किया गया उसके द्वारा महाकाव्यों की एक प्रौढ़ परम्परा का अनुवर्तन हुआ। रामायण के विषय में विद्वानों का यह विचार यथार्थ ही है कि वाल्मीकि ने इस महाकाव्य की उस रूप में रचना नहीं की जिसमें कि आज यह प्राप्त होता है, प्रत्युत यह कई शताब्दियों की रचना है। अनेक कवियों द्वारा समय-समय पर उसमें परिवर्तन, परिवर्धन तथा संशोधन किये गये। स्थान-स्थान पर क्षेपकों का समावेश तथा भाषा शैली के आधार पर सम्पूर्ण महाकाव्य से उनकी भिन्‍नता इस कथन का पुष्ट प्रमाण है। वर्तमान रामायण के अनेक संस्करणों की भिन्‍न रूपता का भी इसके किसी एक समय में किसी एक कवि द्वारा रचे जाने की ओर स्पष्ट संकेत करती है। अतः स्पष्ट है कि रामायण का जो स्वरूप आज हम देखते हैं--उसका निर्माण अंनेक शताब्दियों के अनन्तर हुआ है। इस महाकाव्य में हमारी जातीय संस्कृति और सभ्यता का यथार्थ दिग्दर्शन हुआ। विकास क्रम में रचित यह ग्रन्थ निःसन्देह विकसित महाकाव्यों की कोटि में आता है और अपनी आलंकारिक शैली के कारण यह अपने उत्तरवर्ती महाकाव्यों का जनक भी है। रामायण! में महाकाव्य के लक्षणों का उच्चतम रूप मिलता है, सच तो यह है कि “रामायण” को देखकर ही परवर्ती आचार्यों ने महाकाव्य के लक्षण निर्धारित किये हैं। भारतीय साहित्य इस महाकाव्य से अत्यधिक अनुप्राणित हुआ है। महाकाव्य के लक्षण आचार्य विश्वनाथ के अनुसार इस प्रकार हैं- . यह सगों में विभक्त होता है। . इसका नायक, देवता, कुलीन, क्षत्रिय या एक वंशज कुलीन अनेक राजा होते हैं। है हि खरृंगार, वीर और शान्त रस में से एक प्रधान रस होता है और अन्य उसके म्हायक। इसमें सभी नाटकीय संधियाँ होती हैं। इसका कथानक ऐतिहासिक होता है या किसी सज्जन व्यक्ति से सम्बद्ध। इसमें चतुर्वर्ग-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन होता है। प्रारम्भ में देवादि को नमस्कार, आशीर्वाद या वस्तु-निर्देश होता है। कहीं दुर्जन निन्‍्दा और सज्जन-प्रशंसा भी रहती है।..- प्रत्येक सर्ग में एक छन्द वाले प् रहते हैं, किन्तु अन्त में छन्द परिवर्तन हो जाता है। .. इसमें आठ से अधिक सर्ग होते हैं, जो बहुत छोटे और बड़े होते हैं। 42 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

कफ़फ्डी छ७

हट

छ्

0. कहीं विभिन्‍न छन्‍्दों वाले सर्ग भी होते हैं।

।. सर्ग में भावी-कथा का संकेत होता है।

2. इसमें इन प्रधानताः के वर्णन रहते हैं-सन्ध्या, सूर्य, चन्द्रमा, रात्रि, प्रदोष, अंधकार, दिन, प्रातः, मध्यान्ह, मृगया, शैल, ऋतु, वन, सागर, युद्ध, प्रस्थान, विवाह, मन्त्र, पुत्र, उदय आदि।

3. ग्रन्थ का नाम कवि, कथानक, नायक या प्रतिनायक के नाम पर रखना चाहिये।

4. आर्ष महाकाव्यों (रामायण, महाभारत) में सग्गों का नाम आख्यान पर निर्भर होता है। रामायण में उपर्युक्त सभी तत्वों का समावेश है। रामायण में अनेक नायक हैं।

कथानक ऐतिहासिक है। सूर्योदय, चन्द्रोदय, प्रातःकाल, सायंकाल, मृगया, विवाहादि

का वर्णन है। रामायण नायक के नाम पर है। इस प्रकार स्पष्ट है कि रामायण में विद्वानों द्वारा वर्णित महाकाव्य के सभी लक्षण विद्यमान हैं।

रामायण कालीन समाज और संस्कृति वाल्मीकि रामायण भारत का राष्ट्रीय आदि काव्य है। धार्मिक एवं नैतिक

आदशों का भंडार होने के साथ-साथ यह एक महत्त्व पूर्ण मानवीय समाजशास्त्र

भी है, जो सहस्नों शताब्दियों पूर्व के भारतीयों के जीवन यापन का रोचक वृतान्त उपस्थित करता है। एक पुरातन युग की जीवित परम्पराओं, धारणाओं, चिन्ताओं, आकॉक्षाओं और भावनाओं का चित्रण करने के कारण यह प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति की एक बहुमूल्य निधि है। उसकी उपमा एक ऐसे पर्वत से दी जा सकती है जिसकी चोटी से हम प्राचीन आयों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं कला सम्बन्धी क्रिया कलाप का सम्यक्‌ दर्शन कर सकते हैं।

सामाजिक जीवन के प्रायः सभी पहलुओं पर वाल्मीकि ने रोचक और स्थायी महत्त्व की सामग्री प्रस्तुत की है।

वाल्मीकि रांमायण काल में समाज में दो ही जातियाँ मूल रूप से निवास करती थीं-एक आर्य और दूसरी अनार्य। आयों और अनारयों की सामाजिक व्यवस्था में अन्तर था। जहाँ आयों का समाज वर्णाश्रम के ढाँचे में ढला हुआ था, वहाँ अनायों का समाज जातिरहित था। आर्यों ने अपनी श्रेष्ठ सभ्यता एवं संस्कृति के बल पर धीरे-धीरे प्रायः सारें देश पर अधिकार कर लिया। अनार्य जातियों में से कुछ ने आयों को सहयोग दिया और कुछ ने डटकर उनका विरोध किया। इनको भी अन्त में पूर्ण परास्त होकर आयों की प्रभुता स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा। अनायों के मध्य में एक राक्षस जातिः निवास करती थी, इसी के विरुद्ध राम ने संघर्ष किया।

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 43

राक्षसों के बाद रामायण में वानरों* का उल्लेख है। राक्षसों एवं वानरों के अतिरिक्त तत्कालीन भारत में निषाद", गृध* किन्नर” तथा यक्ष'" और नाग" जैसी अन्य अनार्य जातियाँ भी निवास करती थीं।

प्राचीन भारत की कुछ घुमंतू जातियाँ अपने पर्यटन शील स्वभाव के कारण पक्षियों-गृधों'” या सुप्णों-के नाम से सम्बोधित की जाती थीं। रामायण काल में गृध जाति भारत के पश्चिमी समुद्रतट और उसके आस-पास की पर्वत श्रेणियों पर रहा करती थीं। इस जाति के मुखिया सम्पाति और जटायु नाम के दो भाई थे, जिनकी मृत्यु के बाद गधों का राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया। इन दोनों के विभिन्‍न कर्मों द्वारा यह ज्ञात होता है कि इन्होंने आयों की धार्मिक रीतियों को अपना लिया, था।

राम और लक्ष्मण शबरी के आश्रम में पहुँचे, यह शबर जाति अधिकांशतः आखेट-प्रिय होती थी। यक्ष जाति राक्षसों की ही समकालीन थी। यक्षों की एक और समकालीन जाति सर्प-चिन्ह वाले नागों की थी। यह भी दक्षिण भारत में पनपी थी। यह एक समुद्री जाति थी।

जहाँ तक असुरों का प्रश्न है, रामायण में उनको और राक्षसों को अलग-अलग माना गया है।

इनके अतिरिक्त रामायण में देवों, गन्धवों, चारणों, गिद्धों, किन्नरों और अप्सराओं की भी चर्चा आती है। जब कभी कवि किसी आश्चर्य जनक घटना को देखने के लिये इकटूठे हुए जन समूह का आभास कराना चांहता है तब वह इन जातियों का सामूहिक रूप से उल्लेख करता है। देवों को स्वर्ग का देवता माना गया है।

गन्धर्व लोग अलौकिक संगीतज्ञों के रूप में समादृत थे। किन्नर एक स्त्रैण जाति थी जो सदा श्रृंगारिक गीतों और क्रीड़ाओं में मग्न रहती थी। सिद्धों और चारणों को वाल्मीकि ने अन्तरिक्ष का निवासी बताया है जो वीरता पूर्ण कृत्यों के संपादन पर प्रशंसा की बौछार किया करते थे।

रामायण में अप्सराओं का उल्लेख बार-बार आता है। पौराणिक दृष्टि से अप्सराओं की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई पर देवों और दानवों दोनों ने ही उन्हें पत्नी मानने से इन्कार कर दिया। अतः वह साधारणाः (सबके लिये) स्त्रियाँ बन गयीं ।'*

अप्सराएँ नृत्य-ज्ञान में विशेष दक्ष होती थीं, जिनके बल पर वे संसारी प्राणियों के चित्त को लुभाया करती थीं।

वाल्मीकि ने. मूलतः उत्तरी भारत की आर्य-सभ्यता का चित्रण किया है। प्रसंगवंश उन्होंने ऐसी अन्य जातियों की संस्कृति पर भी प्रकाश डाला है। इन जातियों में मुख्य रूप से उल्लेखनीय राक्षस और वानर हैं। रामायण में राक्षसों की तीन शाखाओं का स्पष्ट रूप से पता चलता है, जिनमें प्रत्येक का अपना अलग-अलग वंश था यद्यपि वह सभी राक्षस के नाम से जानी जाती थीं:। इनमें

44 »/ वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

से पहली विराध शाखा थी, जो दण्डकारण्य के उत्तरी भाग में रहती थी, दूसरी शाखा दनु की संतति होने के कारण दानवों के नाम से प्रसिद्ध हुई। तीसरी शाखा, जो राक्षस” अथवा 'रक्ष! के नाम से विख्यात थी, सबसे अधिक क्रूर और शक्तिशाली थी।

कुछ विद्वानों की यह धारणा है कि वानर जाति एक पौराणिक अथवा काल्पनिक जाति थी और वाल्मीकि ने उसके कार्य-कलाप का जो वर्णन किया है, वह निरर्थक विचित्रताओं का एक व्यौरा मात्र है। कुछ विद्वान वानरों को निरा बन्दर मानकर उन्हें महत्त्व नहीं देते और यह इसलिये कि कवि ने उन्हें बन्दरों की विशेषताओं से युक्त बताया है किन्तु वानरों की सभ्यता का जो चित्रण रामायण में प्रस्तुत है, उनसे ये दोनों मान्यताएँ गलत सिद्ध हो जाती हैं, और यह प्रामाणिक होता है कि वानरों की जाति एक वास्तविक मनुष्य जाति थी जिसकी अपनी विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था और संस्कृति थी। रामायण ही भारतीय साहित्य का सबसे प्राचीन और सम्भवतः एक मात्र ऐसा ग्रन्थ है, जिससे हम वानर सभ्यता की निकट से झाँकी पा सकते हैं।

वानरों को कवि ने माया जानने वाले, शूरवीर, वायु के समान वेगवान, नीतिज्ञ, बुद्धि के समान पराक्रमी, किसी से परास्त होने वाले, तरह-तरह के उपायों को जानने वाले आदि गुणयुक्त बताया है। वर्ण

रामायण युग में आयों का समाज निश्चित रूप से जाति-पांति में विभक्त हो चुका था। वाल्मीकि ने चारों वर्णों का स्पष्ट उल्लेख किया है। महाराज दशरथ के अश्वमेध यज्ञ में सहस्नों की संख्या में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आमंत्रित किये गये थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि विभिन्‍न जातियों के बीच स्पष्ट मर्यादाएँ तथा सम्मान और गौरव की पृथक्‌-पृथक्‌ धारणाएँ स्थापित हो गयी थीं।

प्रथम तीन वर्ण “द्विजअ' कहलाते थे। उपनयन संस्कार उनके दूसरे जन्म का सूचक था। अयोध्या में रहने वाले चारों वर्ण ब्राह्मणों के अनुयायी, देवताओं और अतिथियों के -पूजक, कृतज्ञ, उदार, शूर, पराक्रमी तथा धर्म और सत्य का पालन करने वाले थे।

ब्राह्मण का व्यक्तित्व गौओं तथा राजाओं की तरह पवित्र माना जाता था। जहाँ ब्राह्मणों का कार्य प्रजा के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान में योग देना था वहाँ क्षत्रियों का कर्त्तव्य देश को वाह्य और आन्तरिक संघर्षों से बचाना था। क्षत्रियों को विशेष रूप से ब्राह्मणों और गौओं की सेवा करनी पड़ती थी। शरण में आये किसी भी प्राणी को अभयदान देना उनका धर्म था, जैसे माता अपने गर्भ की रक्षा करती है, वैसे ही राजा को तपस्वियों की रक्षा करनी चाहिए। दण्ड अर्थात्‌ न्याय का यथोचित विधान करना राजा का कर्त्तव्यः था। यदि ब्राह्मण रामायण कालीन समाज के मस्तिष्क थे, और क्षत्रिय उसकी भुजायें तो वैश्य लोग वर्णाश्रम

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 45

व्यवस्था को आर्थिक सम्बल प्रदान करते थे, उनका मुख्य कार्य अर्थोपार्जन करना था। व्यापार, कृषि, गौपालन उनके मुख्य धन्धे थे। वे ही करों का भार वहन करते थे। द्विज होने के नाते वैश्यों के धार्मिक संस्कार और कृत्य ब्राह्मणों और क्षत्रियों के समान ही होते थे। शूद्रों को सबसे निम्न स्थान प्राप्त था। उनका कार्य तीनों वर्णों की सेवा करना था। वे प्रायः घरेलू नौकरी और दास वृत्ति किया करते थे। शूद्रों का यज्ञ में उपस्थित होना वर्जित था। वे मंदिरों, राज-प्रासादों, ब्राह्मणों के घरों तथा पूज्य स्थानों में प्रवेश नहीं कर सकते थे किन्तु राजा की विशेष आज्ञा पाकर वे सभा या संसद में प्रवेश कर सकते थे। प्राचीन भारत की वर्ण-व्यवस्था को इस प्रकार राजकीय स्वीकृति प्राप्त थी, अतः उनका पालन करना लोगों के लिए अनिवार्य था। आश्रम

प्राचीन आर्य-ऋषियों के अनुसार मानव-जीवन अनवरत आत्म-शिक्षण एवं आत्म-अनुशासन का समय था। इस शिक्षण-काल को उन्होंने आश्रम के नाम से कई भागों में बाँट दिया था। इन्हीं पर मनुष्यों के सांसारिक जीवन का ढाँचा अवस्थित रहता था। रामायण के समय में आश्चमों की संख्या निश्चित रूप से चार बन चुकी थी। यथा-

]. विद्यार्थी के लिये ब्रह्मचर्याश्रम

2. विवाहितों के लिये गृहस्थाश्रम

3. अर्थोपार्जन से विरत वनवासी तपस्वी के लिये वान-प्रस्थाश्रम।

4. संसार त्यागी वैरागी के लिये सन्यासाश्रम।

उपनयन संस्कार के बाद ब्रह्मचर्यश्रम आरम्भ होता था। इसमें विद्यार्थी ब्रह्मचारी रहकर कठोर एवं अनुशासनमय जीवन व्यतीत करता था। गुरु की सेवा और शास्त्रों का अध्ययन उसके दो प्रमुख कर्त्तव्य थे। शिक्षा प्राप्ति के बाद वह स्नातक कहलाता था। रामायण में तीन-प्रकार के स्नातकों का उल्लेख है-“विद्या स्नातक', 'ब्रत-स्नातक' और “विद्याव्रत स्नातक!

ब्रह्मचर्याश्रम की समाप्ति पर युवक स्नातक विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। इस आश्रम में पितृ-ण देव-ऋण और मनुष्य-ऋण को चुकाने के लिये गृहस्थ को श्राद्ध, यज्ञ और अतिथि-सत्कार करने पड़ते थे। सभी धार्मिक क्रिया-कलाप और यज्ञ-यागादिक उसे अपनी पत्नी के साथ सम्पन्न करने पड़ते थे, जो इसलिये, धर्म-पत्नी कहलाती थी। चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम ही सर्वश्रेष्ठ था ।' और स्वयं रामायण गृहस्थाश्रम का ही महाकाव्य है।

इसके पश्चात्‌ वानप्रस्थ का वर्णन किया गया है। इसमें पत्नी या तो पुत्रों के संरक्षण में घर पर रहती अथवा पति के साथ वन गमन करती थी। रामायण में उल्लिखित अधिकाँश तपस्वीगण अपनी पत्नियों के साहचर्य में वैखानस व्रतों का पालन करते थे। अन्तिम आश्रम सन्‍्यास का “रामायण में विशेष उल्लेख नहीं है।

46 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

उसमें “सन्यासी” शब्द का प्रयोग होकर “भिक्ष' और “परिव्राजक' नाम आये हैं। परिवार

“कुटुम्ब' अथवा “परिवार” समस्त मानवीय संगठनों की मूल इकाई है और सामाजिक विकास की पहली सीढ़ी वास्तव में रामायण एक कौटुम्बिक महाकाव्य है। राग-द्वेष, हर्ष-शोक, ममता, मोह, लोभ, त्याग आदि की सामान्य कौटुम्बिक घटनाओं का चित्रण उसे सर्व-सामान्य के लिये एक हृदय-ग्राही रचना बना देता है। वाल्मीकि ने पारिवारिक जीवन के प्राचीन आदर्शों को भावी-पीढ़ियों के लिये अपनी रामायण में सुरक्षित कर दिया है।

परिवार का रूप निःसन्देह पैतृक था। उसमें पिता कूटुम्ब का मुखिया था, जिसका आदेश सर्वोपरि होता था। पंत्नी गृहस्वामिनी होती थी, किन्तु गृह-स्वामी पर आश्रित और उसकी आज्ञाकारिणी। पुत्र और पुत्रियों पर पिता का पूर्ण नियन्त्रण था, पिता की अनुमति के बिना वे अपना जीवन साथी नहीं चुन सकते थे उदाहरण-धनुभंग करके सीता को पाने के अधिकारी होने पर भी राम ने पिता की इच्छा जाने बिना विवाह करने से इन्कार कर दिया ।” व्यवहारिक मामलों में पिता की आज्ञा कानून के तुल्य होती थी। परिवार में पुत्र स्नेह का केन्द्र बिन्दु था। पुत्रों में भी ज्येष्ठ पुत्र का अधिकारपूर्ण स्थान था। मनुष्य के चरित्र-निर्माण में कूठुम्ब के महान योग को रामायण ने स्वीकार किया है। विवाह

रामायण काल में विवाह की रस्म पारम्परिक एवं शास्त्रीय आधारों पर पूर्णतया प्रतिष्ठित हो चुकी थी। सामान्यतः प्रत्येक प्राणी के लिये विवाह-पारिवारिक स्थिरता, सांसारिक सुख एवं पारलौकिक कल्याण की दृष्टि से आवश्यक और वांछनीय माना जा चुका था। विशेष कर स्त्रियों के लिये तो विवाह एक प्रकार से उनका नूतन जन्म-संस्कार था। उन दिनों विवाह से पूर्व वर-वधू में कोई परिचय या सम्पर्क नहीं होता था। अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन था। पुत्र-पुत्रियों के विवाह प्रायः माता-पिता ही रचा करते थे। कन्या की याचना उसके पिता से ही करनी पड़ती थी। प्राचीन भारत में स्वयंवर की दो प्रणालियां प्रचलित थीं-एक तो वह-जिसमें वधू एक नियत स्थान पर इकटूठे हुए वरों में से अपनी रुचि के पति को चुन लेती थीं, दूसरी वह जिसमें पूर्व निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाला ही कन्या के पाणि-ग्रहण का अधिकारी होता है। पहली प्रथा रामायण के समय में प्रचलित नहीं थी, दूसरी अवश्य प्रचलित थी।

तत्कालीन विवाह-प्रणाली का पूर्ण परिचय राम-सीता के विवाह-वर्णन में मिलता है जिसमें कुल मिलाकर पाँच दिन लगे थे। इस समारोह के तीन-मुख्य भाग स्पष्ट पहचाने जा सकते हैं।

. प्रारम्भिक औपचारिक कृत्य

2. मूल संस्कार अथवा विवाह।

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन 47

8. समुद्धाह अर्थात्‌ पतिगृह जाने पर किये जाने वाले माँगलिक कार्य

प्रेमीजनों के आकर्षण एवं अनुराग के अनेक मंजुल चित्र रामायण में उपलब्ध हैं। स्वयं राम ने मानवों पर काम के प्रबल प्रभाव को स्वीकार किया है। कामासक्त होने पर मनुष्य क्रोध के पात्र को भी अपना प्रेमास्पद बना लेता है।

वाल्मीकि ने इस तथ्य को छिपाने की कोई चेष्टा नहीं की है कि पति और पत्नी के प्रेम में शारीरिक आकर्षण एवं काम-चेतना का भी प्रमुख योग होता है। रामायण की अनेकानेक काव्य-कल्पनाएँ प्रणय-भावनाओं से उदूभूत हुई हैं। वाल्मीकि की दृष्टि में हाथी-हथिनी का सम्पर्क स्त्री-पुरुष के पारस्परिक आकर्षण का प्रतीक है। प्रणय का उदात्त एवं शालीन रूप कवि द्वारा चित्रित प्रेम की प्रगाढ़ता होती है। वाल्मीकि ने सर्वत्र विवाहित प्रणय को ही श्रेष्ठ पद प्रदान किया है। “नारी? का स्थान घर में

रामायण कालीन समाज में कन्याओं से किसी प्रकार का द्वेष, द्रोह या घृणा नहीं की जाती थी। रामायण से स्पष्ट है कि प्रमुख स्त्री पात्रों को विवाह से पूर्व अपने घरों में समुचित शिक्षा मिल चुकी थी। कर्मकाण्ड की शिक्षा पाने के अतिरिक्त कन्याएँ शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों का भी पर्याप्त ज्ञान प्राप्त करती थीं। कन्‍्याओं को व्यवहारिक एवं नैतिक शिक्षा भी दी जाती थी। उन्हें पत्नी विषयक कर्तव्यों का सुचारु रूप से बोध कराया जाता था। देवासुर संग्राम में कैकेई का अपने पति के साथ युद्ध में जाना यह सिद्ध करता है कि लड़कियाँ सैनिक-शिक्षा से भी वंचित नहीं रखी जाती थीं। अपने कौमार्य काल में कन्याएँ पर्दे जैसे नियंत्रण अथवा अतिशय औपचारिकता के बन्धनों से मुक्त रहती थीं। विवाह के बाद पितृ-गृह से पतिगृह आने वाली कन्या “वधू का पद प्राप्त करती थी।

वाल्मीकि ने गृह-कार्य में रतं गृहणी का कहीं वर्णन नहीं किया है वह केवल इतना कहते हैं कि नव-वधू को अपने सास-ससुर के अधीन रहना चाहिये।

विवाहित स्त्रियाँ पति की कल्याण कामना से ब्रत-इत्यादि रखती थीं। नारी का स्वरूप समाज में

सिद्धान्ततः नारी को अपने आपकी रक्षा करने में असमर्थ माना जाता था, अतः वह पति, पुत्र या बन्धु-बान्धवों के ही अधीन रहने के योग्य थी किन्तु व्यवहार में इसका अर्थ यह नहीं था कि वह सदा घर की चार दीवारी में कैद रहती थी। राम के वनवास से लौटने पर उनका जो अभूत-पूर्व स्वागत किया गया, उसमें स्त्रियों का योग और भी अधिक दर्शनीय था। इनके अतिरिक्त राजागण-बड़े-बड़े यज्ञ-समारोह आयोजित किया करते थे, जिनमें सभी तरह के अभ्यागत आते और आनन्द मनाते थे। महिलाएँ भी इन समारोहों में बड़ी संख्या में भाग लेतीं और पुरुषों की तरह विभिन्‍न भोज्य पदार्थों का आस्वादन करती थीं। अन्य दृष्टियों से

48 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

भी नारी वर्ग संसार और इसके विविध अनुभवों से अलग-थलग नहीं रहता था। पुरुष वर्ग के साथ ही वह भी सभी प्रवृतियों में भाग लेता था। पुरुषणण यात्रा और विहार में या मित्रों-सम्बन्धियों के यहाँ जाते समय अपनी स्त्रियों को अवश्य साथ रखते थे। स्त्रियों को अकेले या अपनी सखियों के साहचर्य में आमोद-प्रमोद करने के साधन और अवसर प्राप्त थे।

इस प्रकार स्पष्ट है कि रामायण कालीन समाज में नारी के प्रति दृष्टिकोण विभिन्‍न पहलुओं से निर्धारित होता था, और इसी कारण उसमें परस्पर विरोधी बातें देखने को मिल जाती हैं। कुल मिलाकर उस युग में स्त्रियों की स्थिति सामान्यतः सुखद थी। कम से कम तत्कालीन परिस्थितियों में नारी को एक कन्या; पत्नी, माता और विधवा के रूप में समस्त संभव सुविधाएँ और अधिकार प्राप्त थे, और इनके सहारे वह परिवार, समाज और राष्ट्र के सांस्कृतिक उत्थान में अमूल्य योगदान कर रही थी। आर्थिक जीवन

रामायण-कालीन आर्य उन पूर्व-कालिक सैनिक कृषकों की भाँति नहीं थे, जिन्होंने क्ृष्ण-वर्ण, दस्युओं को परास्त करके सिंधु का मैदान हस्तगत किया था। अब तक तो सभ्यता प्रगति कर चुकी थी। समाज अधिक सभ्य और सुसंस्कृत बन चुका था तथा विद्या और कला का प्रसार हो चुका था। वित्त शास्त्र को प्राचीन भारत में “वार्ता” की संज्ञा दी जाती थी। वार्ता-विद्या के शास्त्रीय स्तर पर पहुँचने के बाद कृषि, गो-पालन और व्यापार के विकास पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा-इनकी प्रगति की एक सुनिश्चित दिशा निर्धारित हो गयी। राज्य में वार्ता के नियमों और सिद्धान्तों को लागू करना राजा का प्रधान कर्तव्य था।

राष्ट्र या व्यक्ति के-जीवन में अर्थ का महत्व भली-भाँति प्रकट था। राजा की आमदनी का प्रमुख स्रोत “बलि-षड़भाग” था। भारत का शाश्वत एवं चिर-अभ्यस्त उद्योग-क्ृषि रामायण युग में भी आजीविका का सर्व-सामान्य साधन था। कृषि- उद्योग को राज्य की ओर से पर्याप्त संरक्षण प्राप्त होता था। राज्य की ओर से अन्न के सरकारी गोदाम बने रहते थे, जिन्हें शान्यकोश कहा जाता था।

वाणिज्य-व्यापार वैश्यों के हाथ में था। देश में प्रचुर आंतरिक व्यापार होता था। विदेशों से भी व्यापारिक संबंध थे। वस्तुओं का विनिमय-व्यापार “निष्क्रिय' कहलाता था। नौकाओं, हवाई-यातायात की भी सूचना मिलती है।

संक्षेप में, वाल्मीकि के समय में भारत आर्थिक दृष्टि से एक सुखी, समृद्ध और वैभव-शाली देश था। दशरथ के राज्यकाल में अयोध्या तथा उसके जनपदों की आर्थिक स्थिति अत्यन्त उन्‍नत हो चुकी थी-वे धन, धान्य, पशु आदि जीवन की सुख-सुविधाओं से सम्पन्न थे। प्रशासन

रामायण कालीन भारत में कोई एक छत्र साम्राज्य नहीं था। हिमालय और

विषयावतरण-संस्करृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 49

विन्ध्य-पर्वत मालाओं का मध्यवर्ती आर्यावर्त देश अंग, काशी, कोसल, केकय, मगध, मत्स्य, मिथिला, वंग, विशाला, सिंधु, सौवीर, सौराष्ट्र, सांकाश्या आदि स्वतन्त्र राज्यों में विभक्त था।

रामायण में किसी गणतन्त्र का उल्लेख नहीं है। तत्कालीन शासन का स्वरूप मर्यादित राजतन्त्र था। एक वैधानिक शासक द्वारा स्थापित सुदृढ़ शासन व्यवस्था में जनता का परम्‌ विश्वास था। स्थायी सरकार के अभाव में होने वाली अव्यवस्था से प्रजा सुपरिचित थी। राजा का पद कुल परम्परागत था। प्रायः ज्येष्ठ पुत्र ही युवराज-पद का अधिकारी होता था। राजा की मृत्यु पर युवराज पद पर अभिषिक्त किया गया राजकुमार ही राज्यारूढ़ होता था, वाल्मीकि के अनुसार आदर्श राजा गुणवान, पराक्रमी, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्यवक्ता, दृढ़-प्रतिज्ञ, सदाचारी, समस्त प्राणियों का हित-साधक, विद्वान, सामर्थ्यशाली, प्रिय-दर्शन, मन पर अधिकार रखने वाला, कांतिमान, अनिंदक और संग्राम में अजेय योद्धा होता था।

तत्कालीन शासनतन्त्र के तीन मुख्य अंग सभा, मन्त्रिपरिषद्‌ तथा शासनाधिकारी थे। राम और दशरथ के युग की राज्य सभा, लोक-सभा या धारा-सभा, “परिषद्‌ समिति”, 'संसद” या केवल 'सभा” कहलाती थी। सभा के सदस्य सरकारी और गैर-सरकारी दोनों होते थे।

युद्ध सैन्य विभाग का निर्देशन स्वयं राजा अपने अमात्यों की सहायता से करता था। लंका में सैन्य विभाग एक मंत्री-विशेष के हाथ में रहा होगा तत्कालीन नगर दुर्गों के रूप में बनाये जाते थे, सेना के चार भाग होते थे-पैदल (पदाति), घुड़सवार, (सादी), रथी और गजा रोह। इसलिये वह चतुरंग बल कहलाती थी। सेनाध्यक्ष को सेनानी, सेनापति या सेना नायक कहते थे। अयोध्या में सैनिकों का अलग वर्ग था। वे “भट” या “योध' कहलाते थे। सैनिक अनुशासन बड़ा कठोर था। समुचित कारण के बिना लड़ाई ठान लेना राजाओं के लिये अनुचित था। रामायण के अनुसार युद्ध के आठ कारण होते थे- . अपहत नारी को छुड़ाने अत्याचारी के विनाश हेतु॥ प्रतिशोध के लिये। मित्रों की सहायतार्थ। नारी के लिये। भूमि, सोने और चांदी के लिये। सार्व-भौम सता स्थापित करने के लिये। राज्य-विस्तार के लिये। प्राचीन भारत में युद्ध का आश्रय अंतिम उपाय के रूप में ही लिया जाता था, सेना की विभिन्‍न व्यूहों में रचना की जाती थी। मल्ल युद्ध या कुश्ती इस समय की सर्वाधिक प्रचलित युद्ध प्रणाली थी। रात के समय प्रायः युद्ध बन्द कर दिये 50 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

छा छपी छण-

दर

जाते थे। अस्त्रों में बाण ही सर्वाधिक प्रयोग होते थे। बचाव के आयुध या जिरह . वख्तर भी कई प्रकार के थे यथा, कवच, अभेद्य-कवच, आर्षभ-चर्म, गोधा, तनुत्राण, मर्मत्राण आदि। रामायण कालीन संस्कृति रामायण की संस्कृति का प्रचार हिन्दू-धर्म के व्याख्याताओं एवं उन्‍नायकों का सदा से प्रिय विषय रहा है। वाल्मीकि ने आर्य-संस्कृति के एक अतिशय-प्राचीन एवं उत्कृष्ट युग को मानो साकार रूप में रंग-मंच पर उपस्थित कर दिया है। तत्कालीन संस्कृति को जानने के लिये निम्नलिखित बिंन्दुओं पर दृष्टि-पात करना आवश्यक है- आचार-विचार जन-साधारण में प्रचलित आचार-विचार ही किसी समाज की संस्कृति का परिचायक होता है। सामाजिक शिष्टाचार में अतिथि-सत्कार को सर्वोपरि स्थान दिया जाता था।* आतिथ्य करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता था कि अतिथियों को उनके पद और गौरव के अनुसार ही सम्मान प्राप्त हो। हर संभव अवसर पर अभिवादन करना रामायण कालीन शिष्टाचार का एक अभिन्‍न अंग था। उस युग में आलिंगन करने की प्रथा उतनी ही व्यापक और सर्व-प्रचलित थी,” जितनी आज हाथ जोड़ने की प्रथा है। पुरुषों में परस्पर सौहार्द प्रकट करने का एक और ढंग था, हस्त संपीडन या हाथ मिलाना। तत्कालीन संशोधन प्रणाली शिष्ट और गौरव-पूर्ण होने के साथ-साथ स्नेह और आत्मीयता की भी सूचक थी। समव्यस्तक मित्र एक-दूसरे को 'तात'* कहते या व्यक्तिगत नाम से पुकारते थे। उपकारों के लिये आभार-प्रदर्शन किया जाता था। दैनिक जीवन में सत्य और निष्कपट आचरंण को सर्वाधिक महत्व दिया जाता था। दीर्घ-प्रवास पर जाने से पहले सुसंस्कृत व्यक्ति गुरुजनों से अपने अपराधों के लिये क्षमा-याचना कर लेते थे। सामाजिक प्रथाएँ सामाजिक रीति-रिवाज. 'लौकिक समय”, “लोक वृत्त', अथवा “'लोकाचार” कहलाते थे। आजकल की भाँति उन दिनों भी उपयुक्त अवसर पर अभिनन्दन करने की प्रथा थी। मित्रता की मर्यादा अग्नि की साक्षिता में स्थापित की जाती थी। पैरों की शपथ खाने का विचित्र रिवाज था। भाग्य, दैव या कृतांत के सर्वातिशायी प्रभाव में तत्कालीन समाज की अटल आस्था थी। दैव या भाग्य समय पाकर फलीभूत होता है। अतः दैव ही काल है, मान्यता थी। रामायण में शुभ-शकूुनों की अपेक्षा दुर्तिमित्तो अथवा उत्पातों का उल्लेख अधिक विस्तारं से हुआ है * लोक-मान्यता के अनुसार पुण्यवान व्यक्ति मरने के बाद आकाश का एक तारा बन जाता था।

विषयावतंरण-संस्क्ृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 5

वेष-भूषा

वस्त्रोौद्योग की उन्‍्नतावस्था के कारण वस्त्रों की विविधता और बहुलता दोंनों प्रचुर परिमाण में दीख पड़ती हैं। वाल्मीकि ने सजी-धजी स्त्रियों का बार-बार वर्णन किया है। कौशेय वस्त्रों का बहुत प्रचलन था। क्षौम वस्त्र अधिक कीमती, मुलायम और बारीक होते थे तथा विशेषकर पूजन-अर्चन में प्रयुक्त होते थे। “अजिन! (मृग) वल्कल औरं “कुश-धीर-मुनि-वस्त्र” कहलाते थे। कढ़े हुए या किनारीदार वस्त्र तैयार करने की कला बड़ी उन्‍नत थी। आविक और कंवल ऊनी कपड़े थे। महीन कपड़े 'सूक्ष्म-वस्त्र', कीमती कपड़े, “महार्ह वस्त्र” या “वराह-वस्त्र' तथा नये कपड़े “आहत वस्त्र” कहलाते थे। ब्रह्मचारी या विद्यार्थी केवल एक वस्त्र पहनते थे जो कमर में लपेटा या बाँधा जाता था। स्त्रियों का अधोवस्त्र कटि-प्रदेश में गाँठ लगाकर बाँधा जाता था। रैँगे हुए वस्त्रों का काफ़ा व्यवहार था। सिले वस्त्रों का प्रचलन कम होने पर भी सीने की कला अज्ञात नहीं थी। राजागण मणियों से अलंकृत स्वर्ण-मुकुट पहनते थे।

अयोध्या के नागरिकों में श्रृंगार-प्रसाधनों का सर्व-व्यापी प्रचलन था। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक श्रृंगार-भावना थी। खान-पान

रामायण कालीन आर्य अपने खान-पान में बड़े सुरुचि पूर्ण थे। आमिष और निरामिष” दोनों प्रकार का खाद्य-पदार्थ बनाने में प्रवीण थे। आर्य लोग मूलतः शाकाहारी और राक्षस मूलतः मांसाहारी थे। खाद्य पदार्थों की ये चार श्रेणियाँ थीं-. भक्ष्य, अपूप (रोटी की तरह का पदार्थ) 2. भोज्य (भात-सदृश) 3. चोष्य (गन्ने की तरह) 4. लेह्य (शहद या चटनी की तरह खाये जाने वाला) क्रीड़ा विनोद”

राम और वाल्मीकि के युग में लोगों को ऐहिक सुख-सुविधाएँ पर्याप्त उपलब्ध थीं। नगरों में मनोरंजन स्थलों को समाज” की संज्ञा दी जाती थी। जहाँ धार्मिक, सामाजिक, और आर्थिक विषयों पर विचार-विमर्श होता था तथा नृत्य, संगीत, दूत॑ आदि क्रीड़ा विनोद के साधन उपलब्ध थे। परम्परा से चली रही कथाएँ सुनना, सुनाना भी विश्राम या मनोरंजन का एक सुलभ प्रकार था।

राम के अनुसार मृगया राजाओं की क्रीड़ा थी। वन्य पशुओं का बाणों से संहार किया जाता था। शिक्षा

रामायण में गुरु” आचार्य, कुलपति, श्रोत्रिय, तापसगण, ब्रह्मवादी, उपाध्याय, शिक्षक, परिव्राजक आदि का उल्लेख हुआ है। जीवन का प्रथम चरण ब्रह्मचर्याश्रम-विद्याध्ययन के लिये नियत रहता था।

रामायण में राजनीति, अर्थ-शास्त्र, नैतिक-शिक्षा आदि का तत्कालीन समाज में प्रचार भी बताया गया है।

52 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

साहित्य

साहित्य तत्कालीन समाज का दर्पण होता है। रामायण मुख्यतः एक आख्यान है।

रामायण के युग में संस्कृत बोल-चाल की भाषा होने के कई संकेत मिलते हैं। निश्चित ही वाल्मीकि अपना लोक-प्रिय काव्य किसी मृत-भाषा में रचकर ऐसी भाषा में रचने को प्रेरित हुए होंगे, जो लोक में प्रचलित रही हो। व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध एवं परिष्कृत संस्कृत विशेष रूप से समाज के शिष्ट वर्ग एवं शिक्षित वर्गों में प्रचलित थी। रामायण काल में कविता साहित्यिक कला की अभिव्यक्ति का एक सम्मत माध्यम बन चुकी थी।४ विज्ञान

साहित्य की भाँति विज्ञान का भी रामायण कालीन वैदिक-्रवृत्तियों में प्रमुख स्थान था। फल ज्योतिष और सामुद्रिक शास्त्र का पर्याप्त प्रचार था। रामायण में आयुर्वेद, आयुर्वेद के जनक-धन्वन्तरि तथा त्रिदोष का उल्लेख हुआ है |“ तत्कालीन वैद्य शल्य-चिकित्सा से भी अनभिज्ञ नहीं थे। रामायण में रोगी पशुओं और उनके उपचार का भी वर्णन हुआ है। शरीर स्थान का चिकित्सकों को सम्यक्‌ ज्ञान था। कला कौशल

रामायण कालीन आर्य-कलात्मक अभिरुचि सम्पन्न लोग थे। सौन्दर्य प्रसाधनों के रूप में पुष्पों, केशों का श्रृंगार, अंगराग, प्रलेपन तथा चित्र-विचित्र वस्त्रों का व्यवहार, पैरों में अलंकृत-रस तथा मस्तक पर तिलक का प्रयोग, स्त्रियों के कपोलों पर पत्रावली का अंकन आदि कला प्रियता के नमूने हैं।”

रावण के सुविख्यात पुष्पक विमान को तत्कालीन कला-कौशल का सर्वोत्कृष्ट नमूना माना जा सकता है। नगर

जहाँ वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थों की संस्कृति मूलतः जनपदीय थी, वहाँ रामायण कालीन संस्कृति मुख्यतः नागरिक थी। प्राचीन काल में जीवन और निवास संकटापन्न रहने के कारण नगरों को चार दीवारी और खाइयों से सुरक्षित रखा जा सकता था। प्राचीन काल में आर्य नगरों का उद्भव और विकास सामरिक आवश्यकताओं के कारण हुआ। रामायण काल के प्रमुख नगर भी मजबूत चार दीवारी तथा आक्रमणों का प्रतिरोध करने की साज-सज्जा से युक्त पाये जाते हैं। नगर के बाहर खायी रहती थी। शत्रु-प्रदेश में विजित स्थानों पर अधिकार कायम रखने के लिये महत्वपूर्ण व्यूह-स्थलों पर किले बंदी की जाती थी, जो कालांतर में नागरिक सभ्यता का केन्द्र हो जाती थी। आश्रम

रामायण में नगरों की संस्कृति के बाद आश्रमों की संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थान है, ये आश्रम अरण्यों के अंचल में स्थित होते थे। आश्रमों का निर्माण

विषयावतरण-संस्कृृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 53

सुविधा- जनक, रम्य, वनस्थलियों में किया जाता था। आश्रम निर्माण में वृक्ष की शाखा, बाँस, बेंत, रस्सी, घास-फूस इत्यादि का उपयोग किया जाता था। एक आश्रम में प्रायः दो हिस्से होते थे, बाहरी भाग “पर्णकुटी” और भीतरी 'उटज' कहलाता था। कई कूटियों वाली तपस्वियों की बस्ती को “आश्रम-मंडल” या “तपोवन” कहते थे और बस्ती के पृथक्‌-पृथक्‌ निवास “'तापसालय” कहलाते थे। इस प्रकार के आश्रम-मंडल का अधिपति एक वयोवृद्ध मुनि होता था, जिसे कुलपति कहते थे। धर्म

भारत में धर्म को सदैव ऊँचा स्थान दिया गया है। वेदों को सर्वोच्च धार्मिक महत्व प्राप्त था। प्रातः:काल का समय आहनिक-कृत्यों के अनुष्ठान के लिये नियत रहता था। देवताओं की प्रार्थना करना लोगों के जीवन का अभिन्‍न अंग था। मौलिक रामायण में यद्यपि देवताओं की प्रतिमाएँ स्पष्टतया उल्लिखित नहीं हैं तथापि गन्ध, पुष्प, नैवेद्य, धूप आदि पूजन सामग्री का वर्णन किसी आस्पद या आधान का होना प्रमाणित करता है। उस समय तीर्थ-यात्रा का भी प्रचलन था। गौ को सम्मान दिया जाता था। यज्ञों का बाहुल्‍य था। अश्वमेध-यज्ञ की बड़ी प्रतिष्ठा थी। सत्य ही सर्वत्र धर्म के रूप में 'समादृत” हुआ था। दर्शन

कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धान्त जो भारतीय दर्शन की आधार शिला है, रामायण में सर्वत्र स्वीकृत एवं समर्थित है। कर्म का सिद्धान्त मनुष्यों के सुख दुःख का, उनके भाग्य वैषम्य का एक तर्क-संगत स्पष्टीकरण उपस्थित करता है। रामायण के अनुसार मनुष्य का कोई भी कर्म भले ही वह अज्ञानवश ही क्‍यों किया गया हो, निष्फल नहीं जा सकता। कर्म-फल की प्राप्ति के लिये जन्म-मरण की श्रृंखला अनिवार्य है, अतः जीव के लिये पुनर्जन्म का सिद्धान्त स्वीकार कर लिया गया। आत्मा की आयु शरीर की आयु से नियंत्रित नहीं होती, यह विश्वास सर्वमान्य था। रामायण के अनुसार आदर्श जीवन वह है, जो एकांगी होकर बहंगी हो, जो मानव-अस्तित्व के आध्यात्मिक, व्यावहारिक एवं भौतिक सभी पक्षों का यथोचित सेवन करे।

रामायण कालीन संस्कृति की प्रमुख विशेषताओं का सिंहावलोकन करते हुए यह कहा जा सकता है कि वह ऐसी सामाजिक व्यवस्था पर आंधारित॑ थी जिसमें जन-सामान्य, वर्णों और आश्रमों में विभक्त होते हुए भी, सहयोग एवं सौहार्द के तंतुओं से परस्पर अनुरक्त था। संयुक्त पारिवारिक व्यवस्थां में कुछ कठिनाइयाँ अवश्य थीं, पर॑ उन्हें स्नेह और सहयोग के सहारे तथा अतीत की परम्पराओं का पालन करके, बहुत कुछ दूर कर लिया जाता था। गृहस्थाश्रम में अनुदारता एवं उदारता, आदर्शवादिता एवं व्यावहारिकता दोनों के कांत दर्शन होते हैं। नारी का व्यक्तित्व नितान्त आकर्षक एवं प्रभावोत्पादक था किन्तु वर्णनातीत, दुर्दयनीय एवं

54 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

असंगतियों से भरपूर। यद्यपि रामायण कालीन आंयों के जीवन में नैतिकता और सदाचार का स्वरप्रधान था, तथापि भौतिक पक्ष उनकी पुष्टि में उपेक्षित या अनादूत नहीं :था। (रामायणकालीन समाज एवं संस्कृति)

नगरों और गृहों का यथा-विधि निर्माण तथा इंनकी कला-पूर्ण साज-सज्जा जन-साधारण का स्थापत्य-प्रेम और उनकी कलात्मक अभिरुचि प्रकट करते हैं।

संक्षेप में, रामायण कालीन संस्कृति में चिरकालीन महत्व एवं सार्व-कालिक आदर्श के तत्व विद्यमान हैं। वाल्मीकि रामायण के प्रकाशित संस्करण

वर्तमान समय में “वाल्मीकि रामायण” के मुख्यतया तीन संस्करण हैं जिनका प्रचार भारत के भिन्‍न-भिन्‍न भागों में है- संस्करण-] ;

दक्षिणात्यसंस्करण जिसमें बम्बई और मद्रास से प्रकाशित रामायणें गिनी जाती हैं। संस्करण-2

कलकता से प्रकाशित बंगीय या गौड़ीय संस्करण संस्करण-3

होशियार पुर से प्रकाशित पश्चिमीत्तरीय संस्करण।

प्रत्येक संस्करण में ऐसे अनेक श्लोक हैं जो अन्य संस्करणों में नहीं पाये जातें। जो श्लोक तीनों में पाये जाते हैं उन्हें दक्षिणात्य पाठ ही अपेक्षाकृत प्राचीन और मौलिक माना जाता है। इन संस्करणों में पाठ भेद का प्रथम कारण यह प्रतीत होता है कि “रामायण” आरम्भ में लिखित रूप में नहीं थी। स्तुति पाठकगण “रामायण” की कथा कंठाग्र ही सुनाते थे और संभव है इस प्रकार कई शताब्दियों बाद श्लोकों के क्रम में परिवर्तन हो गया हो। अतएव ग्रन्थ लिखने के समय रामायण के परस्पर भिन्‍न पाठ भी उसी रूप में लिख लिये-गये हों जिस रूप में भिन्न-भिन्न प्रान्तों के स्तुति पाठकगण उन्हें सुनाया करते थे। फिर भी मुख्य कथानक की दृष्टि से इन संस्करणों में मौलिक भेद नहीं है। व्याख्याएँ

वाल्मीकि रामायण का महत्व केवल काव्य दृष्टि से: ही नहीं है, प्रत्युत वह नाना वैष्णव सम्प्रदायों में एक उपास्य धार्मिक ग्रन्थ भी.है। इसलिये रामायण को आश्रय मानकर अनेक व्याख्या ग्रन्थों की रचना भिन्न-भिन्न युगों में कीं गयी है। डा० ओफ्रेक्ट के अनुसार टीकाओं की संख्या 80 है।

मध्य युग में रामायण की लोकप्रियता इतनी, अधिक थी कि .पन्द्रहवे।, सोलहवीं और सत्रहवीं शतार्ियों में कम से कम दस टीकाएँ लिखी गयीं, ज़ो व्याख्या की दृष्टि से बहुत ही असामान्य गुणों से, सम्पन्न हैं। इनका परिचय

विषयावतरण-संस्कृत, साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 55

निम्नवत्‌ है- . रामानुजीय यह रामानुज की नितान्त प्रसिद्ध व्याख्या है इसका समय 400 ईस्वी के आस-पास है। 2. सर्वार्थसार इससे पश्चादूवर्ती है। हारीत गोत्रीय वेंकट कृष्णाध्वरी रचित टीका, जिसे वैद्यनाथ दीक्षित ने निर्दिष्ट किया है। 3. रामायण दीपिका वैद्यनाथ दीक्षित की यह विख्यात व्याख्या है। समय है लगभग 500 ईस्वी। 4. “वृहद््‌ विवरण” “लघुविवरण! ईश्वर दीक्षित ने रामायण के ऊपर इन टीकाओं का प्रणयन किया है। इनमें से प्रथम व्याख्या का काल 58 ईस्वी है। फलतः इसका समय 6वीं शताब्दी का प्रथमार्ध है। (525 ईस्वी के लगभग)। 5. तीर्थीय अथवा “रामायण तत्व दीपिका? यह टीका अपने प्रणेता 'महेश्वर तीर्थ' के नाम पर तीर्थीय अभिहित की जाती है। 6. रामायण-भूषण अपने रचयिता गोविन्दराज के नाम पर यह “गोविन्द राजीय' के नाम से भी प्रसिद्ध है। 7. वाल्मीकि हृदय हे यह अत्रिगोत्री अहोबल द्वारा रचित टीका है। 8. अमृत कतक अथवा कतक इस प्रख्यात टीका के रचयिता का नाम है-माधव योगी। 9. रामायण तिलक यह सर्वाधिक लोकप्रिय टीका है। श्रृंगवेरपुर (आधुनिक सिंगरौर, जिला इलाहाबाद) के विसेन वंशी राजा राम वर्मा ही इसके वास्तविक प्रणेता हैं। 0. रामायण शिरोमणि रामायण की यह व्याख्या वंशीधर तथा शिव सहाय की सम्मिलित रचना है। रचना काल 92 सं. (865 ईस्वी) का उल्लेख टीका में किया गया है। . मनोहरा इसके रचयिता बंग देशीय लोक नाथ चक्रवर्ती हैं। उनका समय 6वीं शती है। 5 2. धर्माकूतम्‌ यह रामायण की आलोचनात्मक व्याख्या है। इसके रचयिता हैं-त्रयम्बक मखी। इनका समय है-(674 ईस्वी से 687 ईस्वी) अर्थात्‌ 7वीं शती का 56 / वाल्मीकि रामायण.तथा आयुर्वेद

उत्तरार्ध। इस प्रकार वाल्मीकि रामायण की विविध व्याख्याएँ की गयीं।

शोध कार्य में प्रयुक्त संस्करण शोध कार्य में रामायण के निम्नलिखित संस्करणों का प्रयोग किया गया-- . वाल्मीकि रामायण सातवलेकर कृत _ चौखम्भा ओरियन्टालिया, वाराणसी 2. वाल्मीकि रामायण. डा० पी० एल० वैद्य. चौखम्भा ओरियन्टालिया, वाराणसी 5. वाल्मीकि रामायण, सं० टी० आर० चौखम्भा ओरियन्टालिया, कृष्णाचार्य वाराणसी 4. वाल्मीकि रामायण. ज्वालाप्रसाद चौखम्भा ओरियन्टालिया, मिश्र कृत वाराणसी 5. वाल्मीकि रामायण द्वारिका प्रसाद शर्मा चौखम्भा ओरियन्टालिया, वाराणसी .. 6. वाल्मीकि रामायण स्वामी जगदीश्वरानन्द 'चौखम्भा ओरियन्टालिया, वाराणसी 7. वाल्मीकि रामायण. अखिलानंद कृत ठीका चौखम्भा ओरियन्टालिया, सहित. हिन्दी टीका सहित वाराणसी 8. वाल्मीकि रामायण तिलक व्याख्या सहित चौखम्भा ओरियन्टालिया, वाराणसी 9. वाल्मीकि रामायण. राम कृत तिलक, चौखम्भा ओरियन्टालिया, वाराणसी शिव सहाय कृत रामायण शिरोमणि गोविन्दः राम कृत

* भूषण त्रय व्याख्या सहित 0. वाल्मीकि रामायण . गोविन्द राजीय (भूषण). चौखम्भा ओरियन्टालिया, रामानुजीत निश्लोकी वाराणसी महेश्वरतीर्थीय सटिप्पण चार संस्कृत व्याख्या सहित 7. वाल्मीकि रामायण माधव योगी कृत चौखम्भा ओरियन्टालिया, वाराणसी 2. वाल्मीकि रामायण: पं० रामनारायण शास्त्री गीता प्रेस, गोरखपुर भाग -2 “राम! इस प्रकार रामायण” से सम्बन्धित कुछ तत्वों को प्रस्तुत करने का सूक्ष्म विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एंवं आयुर्वेद विवेचन ./ 57

प्रयास किया गया है। “रामायण” स्वयं एक विशाल .सागर है, जिसकी सम्पूर्ण रत्न राशि को प्रस्तुत करना एक दुष्कर कार्य है, उसमें से इन रत्नों को ढूंढ़ने का मैंने प्रयास किया है। तथापि बहुत से तत्व मैं यहां स्थानाभाव के कारण प्रस्तुत नहीं कर पा रही हूँ। इसके लिये मैं क्षमा-प्रार्थिनी हूँ। द्वितीय परिच्छेद साहित्यिक ग्रन्थों का आयुर्वेदिक दृष्टि से शोध-कार्य एवं शोध-दृष्टि से महत्त्व साहित्यिक ग्रन्थों का सर्वेक्षण कर उसमें से आयुर्वेदीय सामग्री संकलित करने का कार्य भी हुआ है, जो इतिहास के निर्माण में सहायक सिद्ध होता है। आयुर्वेद को जीवन के निकटतम लाने के लिये पूज्य-गुरुजनों के द्वारा किये जा रहे अथक्‌ प्रयासों की श्रृंखला में नवीनतम उपलब्धि है-काव्यों, नाटकों आदि में.

निहित-आयुर्वेदिक तत्वों का अवलोकन।

इस क्षेत्र में निम्नलिखित रचनाएँ उल्लेखनीय हैं-

१. वेदों में आयुर्वेद राम गोपाल शास्त्री दिल्‍्ली-956

2. वह क्षक्ष्व हबाभाएलीद्वा करब९फ्णाप96] जएलत8 06 89ण ५८१०

3. व्याकरण वाडूमय में. प्रियव्रत शर्मा आयुर्वेद विकास, आयुर्वेदीय सामग्री... मार्च-सितम्बर-967

4. वाताशा (९७००० ए.ए५. इक्षाा4 टणएाफ्राक्ा08- 972 ॥! पा6 095ञं०थ 48० है

5. संस्कृत काव्य में वनस्पतियाँ अभिमन्यु अ. कुरुक्षेत्र वि.वि.--968

6. संस्कृत साहित्य में सुशीला शुक्ला. _गोरखपुर-965 पेड़-पौधे और पशु-पक्षी

पर. संस्कृत महाकाव्य में... डॉ. मंजुला सिंहल,. आगरा विश्वविद्यालय 970 प्रकृति-चित्रण

8. चरक-संहिता डॉ. सन्‍्तनारायण प्रीयूष प्रकाशन,

की दार्शनिक, पृष्ठभूमि. श्रीवास्तव त्वय इलाहाबाद-988 9. महांयान॒ ग्रन्थों में डॉ. रवीन्द्र नाथ ज्योतिरालोक प्रकाशन

निहित आयु सामग्री. त्रिपाठी वाराणसी 988 0. संस्कृत काव्य में. डॉ. राम सुशील सिंह वाराणसी 984 , : विशिष्ट वनस्पतियाँ ॥, -गरुड़ पुराण की डॉ. जयन्ती भट्टाचार्य वाराणसी .986 दार्शनिक एवं आयु० ; सामग्री का अध्ययन ]2. अग्नि पुराण का यूथिका राय

'.. 58 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद्‌

सांस्कृतिक अनुशीलन

3. अग्नि पुराण की दार्शनिक डा० सरिता हांडा वाराणसी 982 एवं आयु० सामग्री [ का अध्ययन

4. बाण भट्ट की कृतियों.. डा0 हितेश सिंह में वनस्पति

इसी प्रकार ज्योतिमिंत्र ने महाभारत, रामायण तथा बौद्ध वाइमय से आयुर्वेदीय सामग्री का संकलन किया है। सतीश चन्द्र साँख्यधर ने (जम्मू) 'हिन्दी साहित्य में आयुर्वेद” शीर्षक पर पी- एच० डी० किया है। कुछ शोध-कर्त्ता 'जैन साहित्य में आयुर्वेद” पर कार्य कर रहे हैं। 'पुराणों में आयुर्वेद” पर पहले कुछ कार्य हुआ है और सम्प्रति कुछ शोध-छात्र कार्य कर रहे हैं।

इसी प्रकार के कुछ संकलन ग्रन्थ 'सुभाषित” नाम से प्रकाशित हुए हैं जिनमें प्राण जीवन मेहता कृत 'वैद्यकीय सुभाषितावली” (चौखम्भा 955) और घाणेकर कृत 'वैद्यकीय सुभाषित साहित्यम्‌” (चौखम्भा 968) के प्रमुख हैं।

वाल्मीकि रामायण के विविध स्वरूपों का विविध दृष्टि कोणों से अनेकानेक विद्वानों के द्वारा अध्ययन एवं विश्लेषण किया गया है, किन्तु उसमें निहित आयुर्वेदिक सामग्री की ओर आज तक किसी भी विद्वान का ध्यान आकर्षित ही नहीं हुआ है। यदि उसमें निहित महत्वपूर्ण तत्वों के ज्ञान से यह जगत अछूता रह जाता है तो आयुर्वेद का इतिहास क्रमबद्ध हो ही नहीं सकता इसी तथ्य को ध्यान में रखकर इस विषय पर कार्य करने का प्रयास किया जा रहा है।

विविध साहित्यिक ग्रन्थों का आयुर्वेदिक दृष्टि से विश्लेषण करने पर सर्वाधिक प्रत्यक्ष लाभ यह होगा कि इन शोध कार्यों के अध्ययन से आयुर्वेद का प्रचार एवं प्रसार जन-जन तक हो सकेगा।

यही इसका प्रत्यक्ष एवं परोक्ष महत्व है।

तृतीय परिच्छेद आयुर्वेद का संक्षिप्त साहित्यिक परिचय

आयुर्वेदिक अष्टाड़

“चरक' ने आयुर्वेद को शाश्वत कहा है क्योंकि जब से आयु (जीवन) का प्रारम्भ हुआ और जब से जीव को ज्ञान हुआ तभी से आयुर्वेद की सत्ता प्रारम्भ होती है। सुश्रुत ने यहाँ तक कहा कि ब्रह्मा ने सृष्टि के पूर्व ही आयुर्वेद की रचना की जिससे प्रजा उत्पन्न होने पर इसका उपयोग कर सके। इससे भी आयुर्वेद का शाश्वतत्व सिद्ध होता है। सभी संहिताकारों ने ब्रह्मा से आयुर्वेद का प्रादुर्भाव बताया है तथा यह भी कहा गया है कि ब्रह्मा ने आयुर्वेद की लक्ष श्लोकमयी

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 59

संहिता का निर्माण किया। यह सब भी सृष्टि काल से ही आयुर्वेद के अस्तित्व की सूचना देते हैं। कोई वस्तु जब अनादि काल से परम्परा के द्वारा प्रवाहित होती रहती है तब उसे शाश्वत कहते हैं। इसका आदि अंत कहीं हो भी तो उसका पता नहीं चलता, नित्य में आदि-अंत होता ही नहीं। शाश्वत और नित्य में यही अंतर है। आयुर्वेद को शाश्वत कहा है; नित्य नहीं.।

चरक के कथनानुसार ब्रह्मा से आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति ने प्राप्त किया, प्रजापति से अश्विनी कुमारों ने और उनसे इन्द्र ने उस.ज्ञान को ग्रहण किया। ब्रह्मा से आयुर्वेद के प्रादुर्भाव का आख्यान यह संकेत करता है कि आयुर्वेद सृष्टि के आदिकाल से ही. विद्यमान है। दक्ष-प्रजापति, अश्विनी कुमार तथा इन्द्र ऐतिहासिक व्यक्ति थे या केवल मिथकीय, इस सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने विभिन्‍न विचार व्यक्त किये हैं किन्तु जो भी हो इतना अवश्य प्रतीत होता है कि सम्भवतः इन्द्र की परम्परा तंक वह देव-लोक तक ही सीमित था। उसका रूप प्रागैतिहासिक था। प्रायः भारतीय परम्परा में विद्वानों का स्रोत ब्रह्मा से प्रारम्भ होकर इन्द्र तक क्रमशः माना जाता है। इन्द्र के द्वारा जब इस ज्ञान का प्रसार भूमण्डल में हुआ तब से इतिहास की श्रृंखला का प्रारम्भ मानां जा सकता है। आयुर्वेद का स्वरूप

आयुर्वेद संज्ञक वेद वेदविद्‌ विद्वानों द्वारा सम्मानित पुण्यतम वेद है। अन्य चेद केवल परलोक हितकर हैं, जबकि आयुर्वेद दोनों लोकों के लिये हितकर है, इसलिये आयुर्वेद पुण्यतम वेद कहा गया है

सुश्रुत, चरक, काश्यप और वाग्भट तथा अन्य आचार्यों ने आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद माना है।” काश्यप ने युक्तियुक्त ढंग से आयुर्वेद को पञ्चम वेद माना है ।* ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी आयुर्वेद को पञ्चम वेद कहा है।”

आयुर्वेदीय संहिताओं में आयुर्वेद शब्द के प्रयोग के बदले केवल “वेद” शब्द का प्रयोग आयुर्वेद अर्थ में किया गया है। इस प्रकार विभिन्‍न मतों के पर्यालोचन से निम्नांकित निष्कर्ष निकलता है - आयुर्वेद पञ्मूचम वेद है। . आयुर्वेद पुण्यतम वेद है और अन्य वेद पुण्य हैं। - आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है। आयुर्वेद अथर्ववेद का उपाड़ है। आयुर्वेद स्वतंत्र वेदाज्ञ है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि आयुर्वेद का अधर्ववेद के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है।

यह ऐहलौकिक एवं पारलौकिक उभय-विध कल्याण कारक होने से और आरोग्य प्रदान करने के कारण पवित्रतम होने से “पुण्यतम” वेद कहलाने लगा।

कप की 9०

60 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

अष्टांग 'सुश्रुत संहिता” में यह उल्लेख मिलता है कि ब्रह्मा ने मनुष्य की सृष्टि के पहले ही आयुर्वेद का एक ग्रन्थ बनाया, जिसमें एक लाख श्लोक और एक हजार अध्याय थे।" ब्रह्मा ने मनुष्यों की आयु तथा बुद्धि की अल्पता का विचार कर आयुर्वेद को आठ आंगों में विभक्त कर दिया। जैसे . शल्य, 2. शालाक्य, 3. काय-चिकित्सा, 4. भूत-विद्या, 5. कौमार भृत्य, 6. अगदतन्त्र, 7. रसायन-तन्त्र और 8. वाजीकरण ।” काय-चिकित्सा आयुर्वेद के सभी अंगों में 'काय-चिकित्सा” का प्रमुख स्थान है। अति प्राचीन काल से वर्तमान काल तक आयुर्वेद के सम्मान और प्रतिष्ठा का कारण आयुर्वेदीय “काय-चिकित्सा” है। शरीर के सर्वश्ञ में होने वाले ज्वर, रक्त-पित्त, शोष, उन्माद, अपस्मार, कुष्ठ एवं अतिसार आदि रोगों की चिकित्सा का विधान जिसमें किया जाता है, आयुर्वेद के उस अंग को “काय-चिकित्सा' कहते हैं।* काय-चिकित्सा की शाब्दिक व्युत्पत्ति “कायः सकल शरीरं तस्य चिकित्सा काय चिकित्सा।/ “काय” का अर्थ है-सम्पूर्ण शरीर, अतः सम्पूर्णशरीरगत रोगों की चिकित्सा को 'काय-चिकित्सा! * कहते हैं। “काय-चिकित्सा” शब्द दो शब्दों के योग से बना हुआ है-काय+चिकित्सा। इसलिये इन दोनों शब्दों का अलग-अलग अर्थ जानने पर ही सम्पूर्ण 'काय-चिकित्सा! शब्द के यथार्थ-अर्थ का बोध हो सकता है। अतः काय चिकित्सा शब्द का -निर्ववन किया जा रहा है। काय जो शब्द करे, उसे काय कहते हैं-“कायति शब्दायते इति कायः | कान को अंगुली से बन्द करने पर एक ध्वनि सुनाई देती है। यह ध्वनि जीवित शरीर का चिन्ह है और इस जीवित शरीर की चिकित्सा करना ही आयुर्वेद का मुख्य प्रयोजन है। इसका तात्पर्य यह है कि हृदय की गति का नियमन करना ही काय-चिकित्सा है, क्योंकि “कायति शब्द करोति” इस व्युत्पति से काय का अर्थ हृदय है और उसकी चिकित्सा करना ही सर्वाधिक मूल्यवान पक्ष है, अतः किसी भी रोग के होने पर हृदय की गति का यथावत्‌ संचालन वाउ्छनीय कर्तव्य होता है। “काय” का दूसरा अर्थ है-शरीर या देह। जिसका अन्नादि आहार से पोषण होता है, उसे काय कहते हैं-“चीयतेउन्नादिभि:” इति कायः। इस प्रकार के शरीर की चिकित्सा काय-चिकित्सा है। “काय” का तीसरा अर्थ है-जाठराग्नि। इस अग्नि के विक्रृत हो जाने पर उसको प्राकृतिक स्थिति में लाने के लिये जो उपचार किया जाता है, उस उपचार विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन 6

को “काय चिकित्सा” कहते हैं, और उपचार करने वाले वैद्य को 'काय-चिकित्सक' कहते हैं। चिकित्सा

“कित्‌ रोगापनयने” धातु से चिकित्सा शब्द बना है। रोग के अपनयन को चिकित्सा कहते हैं। रोग के प्रतिकार, निग्रह या नाश को चिकित्सा कहते हैं।

इस 'प्रकार उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि सर्वाज्ञ (शरीर) में _ होने वाले (रोग) ज्वर, रक्त-पित्त, शोष, उन्‍्माद, अपस्मार, कुष्ठ एवं अतिसार आदि रोगों की चिकित्सा का विधान जिसमें किया जाता है, आयुर्वेद के उस अंग को “काय-चिकित्सा” कहते हैं। क्राय-चिकित्सा के संहिता ग्रन्थ

. कुछ 'संहिता ग्रन्थ निम्नलिखित हैं- अग्निवेश संहिता भेल संहिता। जतूकर्ण संहिता। पराशर संहिता। क्षार-पाणि संहिता। हारीत संहिता। खरनाद संहिता। विश्वामित्र संहिता अगस्त्य संहिता। और

0. अत्रि संहिता।

कौमार-भृत्य

इस आयुर्वेदाज् में कुमार (बालक) के भरण-पोषण की व्यवस्था, धात्री परीक्षा, दुष्ट-दुग्ध-विशोधन, ग्रह-जन्य रोगों का प्रतीकार तथा बालकों के रोगों की चिकित्सा का विधान किया गया है।

काश्यप संहिता में शिष्योपक्रमणीय अध्याय में कौमार-भृत्य को आठों अंगों में प्रथम कहा गया है।-“कौमारभृत्यमष्टानां तन्त्राणामाघमुच्यते।

बालक ही भविष्य में किसी देश का नागरिक बनता है और उसकी बाल्यावस्था के स्वास्थ्य का जीवन-भर प्रभाव रहता है। अतः बालक की देख-रेख सर्वाधिक महत्वपूर्ण कर्तव्य है।

आयु के अनुसार बालक तीन प्रकार के होते हैं-

. क्षीरप (दूध पीने वाले)।

2. क्षीरान्‍्नाद (दूध और अन्न खाने वाले)

3. अन्नाद (केवल अन्न पर निर्भर रहने वाले)।

बालक के जन्म होने के साथ ही उसका उपचार शुरू हो जाता है। उसके कुछ

62 वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

छ्ज्काज़ए ली ग0

संस्कार किये जाते हैं। उसके पेय-लेह्य की व्यवस्था की जाती है। उसकी रक्षा के लिये विशेष-ध्यान दिया जाता है।

बालकों की.विभिन्‍न आयु में भिन्‍न-भिन्‍न ग्रहों के प्रकोप से होने वाले रोगों का वर्णन है और उनके उपचार का विधान किया गया है।

प्रसवागार के साथ ही कुमारागार की व्यवस्था के सम्बन्ध में 'चरक संहिता' के शरीर स्थान आठ में विस्तृत वर्णन है। बच्चे के जन्म के समय और बाद में क्या-क्या करना चाहिये, यह सब बतलाया गया है। बालक को संभावित रोगों से बचाने के लिये रक्षा-विधान का वर्णन है। 'काश्यप संहिता” में बालक की उत्पत्ति, उसके रोगों के निदान और चिकित्सा का विशद्‌ वर्णन है।

कौमार-भृत्य के ग्रन्थ एवं सन्दर्भ

चरक संहिता शारीर स्थान 8।

सुश्रुत संहिता उतर, 27 से 97।

अष्टांग हृदय - उतर, से 7।

जीवक तन्‍्त्र अनुपलब्ध।

पार्वतकतन्त्र जा] अनुपलब्धा

हिरण्याक्षतन्त्र अनुपलब्ध।

बन्धक तन्‍त्र अनुपलब्ध।

बालचिकित्सामृत (नेपाल राजकीय पुस्तकालय)।

बाल-तन्‍्त्र कल्याण वर्मा कृत

योग सुधानिधि।

कुमार तन्‍्त्र रावणकृत |

कुमार-तन्‍्त्र समुच्चच - रमानाथ द्विवेदी

कौमार-भृत्य रघुवीर प्रसाद त्रिवेदी।

अभिनव कौमारभूृत्य. - राधा कृष्ण नाथ। काश्यप-संहिता है

यह कौमार-भृत्य-तन्त्र का सर्व-प्रमुख ग्रन्थ है। इसमें बहुत से ऐसे विषय हैं, जिनका उल्लेख अन्य संहिताओं में नहीं है।

“दन्तजन्माध्याय' में दातों के भेद, उनकी प्रशस्तता, बालक-बालिकाओं के दांतों में भेद आदि विषय विशिष्ट हैं। 'स्वेदाध्याय” में बालकों के स्वेदन के विषय में बहुत सुन्दर निरूपण किया गया है। “लक्षणाध्याय” में सामुद्रिक लक्षणों का विशेष वर्णन किया गया है। अत्यन्त छोटे बालकों में अश्मरी के उद्धरण तथा तीक्ष्ण औषधियों के प्रयोग का विशेष रूप से निषेध किया गया है।

बालकों के वस्तिकर्म में विशेष सावधानी बरतने का निर्देश दिया गया/है। “फक्क-रोग” का विशेष वर्णन है, इस रोग में तीन पहिये की गाड़ी का उल्लेखः है। “अन्नप्राशन” विधान में छठे मास में फंलों का रस और बारहवें ग्रास के बाद अन्न

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 63

देने का विधान बताया गया है। वेदाध्ययन में वाणी. द्वारा वेदना बतलाने में असमर्थ बालकों की भिन्न-भिन्न चेष्टाओं द्वारा उनके अंगों की वेदना को अनुमान के द्वारा जानने का निर्देश है।

'रेवती कल्पाध्याय” में जातहारिणी ग्रह का वर्णन सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। उसमें आचार एवं अपने-अपने कर्तव्य पालन का तिरैस्कार करने वाले को जातहारिणी ग्रह के ग्रहण की बात कही गयी है। इस माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग को अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान एवं ईमानदार बनने का संकेत किया गया है। $. भूत विद्या (गृह चिकित्सा)

आयुर्वेद का यह अड्ढ सर्वाधिक उपेक्षित अ् है। इस विषय का स्वतन्त्र कोई प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है।

देवता, पितृ, पिशाच तथा ग्रह आदि के आक्रमण से पीड़ित व्यक्तियों के कष्ट को दूर करने के लिये, उन देव आदि के लिये बलि, उपहार, पूजा आदि के विधान के द्वारा रोग शान्ति का उपचार जिस अक्ञ द्वारा किया जाता है, उसे “भूत-विद्या! कहते हैं।

आयुर्वेद में भूतोन्‍्माद, अमानुषोपसर्ग तथा बालग्रहों का विस्तार-पूर्वक वर्णन किया गया. है, वे सब रोग तथा मानसरोग अपस्मार आदि भूत-विद्या के अन्तर्गत आते हैं।

भूत-विद्या के विषय अथर्ववेद में भरे पड़े हैं। गुरु, सिद्ध, ऋषि, देवता, भूत-प्रेत, राक्षस, पिशाच एवं स्कन्‍्द, रेवती आदि ग्रहों के तिरस्कार करने पर

* उन्माद, अपस्मार आदि मानसरोग तथा अनेक प्रकार के शारीरिक रोग होते हैं। ऐसे रोगों के उपचार के लिये आक्रामक देवता, राक्षस या ग्रह आदि के अनुरूप बलि, पूजा, होम एवं जप आदि किये जाने पर रोग से मुक्ति मिलती है।

संहिता ग्रन्थों में बीजरूप में भूत-विद्या के विषय हैं, जैसे-सुश्रुत संहिता में उतर-तन्त्र अमानुषप्रतिषेधाध्याय चरक संहिता में उन्‍्माद चिकित्सा एवं वाग्भट में भूत-विज्ञानीय एवं भूत-प्रतिषेधाध्याय

भूत-विद्या एक रहस्यमय विद्या है, जिंसकी सत्यता के उदाहरण सारे विश्व में किसी किसी रूप में विद्यमान हैं। आयुर्वेद सर्ववेद परिषद्य (सभी प्रकार के ज्ञान का आगार) है और इसका प्रमुख लक्ष्य है-आर्तजन की पीड़ा का प्रतिकार करना। यों तो सभी रोगों के मूल कारण वात-पित्त-कफ होतें हैं, किन्तु भूत-विद्या सम्बन्धी रोगों के उद्भव में,प्रमुख कारण अदृष्ट होता है अथवा अलक्षित कारण होता है, इसलिये इन रोगों का उपचार. करना भी अतिशय साहस का कार्य है।

इस प्रकार भूत-विद्या को आयुर्वेदाचायों ने मानस-विकार माना है और उसके उपचार में तीनीं ही प्रकार की चिकित्साएँ (दैंव-व्यापाश्रय, युक्ति व्यापाश्रय और सत्वावजय) आवश्यकतानुसार सफल होती है, बशर्ते कि उनका सम्यक्‌ संयोजन

64 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

किया जाये।

भूत-विद्या सम्बन्धी ग्रन्थ-सर्दर्भ

चरक संहिता - निदान-स्थान अ. 7 तथा 8, चि. 9, 0, सूत्र 24।

सुश्रुत-संहिता - उतरतन्त्र 27 से 37 तक तथा 60, 6 एवं 62 अ.। , अष्टांग हृदय - निदान 6 तथा उतर से 7 अ.।

“मानस रोग विज्ञान -_ डा० बाल क्रृष्ण पाठक आदि हैं।

शालाक्य तन्‍त्र

कर्ण, नेत्र, मुख, नासिका आदि जत्रु के ऊपर के आंगों में उत्पन्न हुए रोगों की शान्ति के लिये तथा शलाका यन्त्र के उपयोग के लिये जो आयुर्वेदाज़ होता है, उसे 'शालाक्य तन्त्र” कहते हैं।*

शालाक्य में समाविष्ट किये गये अंगों में से आधुनिक चिकित्सा में कर्ण, नासिका और कण्ठ (ई.एन.टी.) का एक विभाग माना गया है। आँख का एक स्वतन्त्र विभाग होता है। दाँत का भी स्वतन्त्र विभाग होता है।

ऋग्वेद में शालाक्य विषयक चमत्कारों के लिये अश्विनी कुमारों का उल्लेख है। उन्होंने अन्धे ऋजाश्व को दृष्टिन्दान दिया अन्धे कण्व को दृष्टि दी। बहरे नार्षद को श्रवण शक्ति दी। इन्द्र ने अन्धे परावृज को दृष्टि दान दिया।

शालाक्य तन्‍त्र का प्रमुख ग्रन्थ 'सुश्रुत संहिता” है, जिसके उतर तन्‍्त्र के अध्याय ] से 9 तक नेत्र रोग का, 20 तथा 2 में कर्ण रोग का, 22 से 24 तक नासिका रोग का और 25-26 में शिरो-रोग का वर्णन है।

सुश्रुत के समय में नेत्र शरीर का अध्ययन तथा नेत्र में विभिन्‍न अवयवों में होने वाले रोगों का विशेष अध्ययन प्रचलित था। व्यावहारिक प्रयोग के लिये सेंक, विडालंक लेप, नेत्र-पूरण, अञजन, वर्ति आदि का प्रयोग किया जाता था। कान, नाक, कण्ठ, मुख आदि के रोगों के निदान और उनकी चिकित्सा का भी स्वतन्त्र रूप से अध्ययन किया जाता था। शस्त्र-साध्य रोगों में शस्त्र-कर्म भी किया जाता था। शालाक्य के ग्रन्थ

. विहेदतन्त्र। 2. निमितन्त्र। 3. काइूकायन तल्त्र। 4. गार्ग्य तन्‍्त्र। 5. सात्यकितन्त्र 6. शौनकतन्त्र। 7. कराल तन्‍त्र। 8. चक्षुष्यतन्त्र। 9. कृष्णात्रेयतन्त्रमू-इन ग्रन्थों की प्राप्ति वर्तमान में नहीं है। वर्तमान में उपलब्ध ग्रन्थ

. शालाक्य तन्‍्त्र _- ले. पं. रमानाथ द्विवेदी, चौखम्भा औ., वाराणसी 2. शालाक्य विज्ञान - ले. डॉ. रवीन्द्र चन्द्र चौधरी।

5. नेत्र-रोग-विज्ञान - डॉ. हंसराज कालेड़ा, अजमेर प्रकाशन।

4. नेत्र-रोग-विज्ञान - डॉ. विश्व-नाथ द्विवेदी।

5. नेत्र-विज्ञान - डॉ. बाल-कृष्ण शिवराम मुंजे कृत आदि विविध

विविध ग्रन्थ वर्तमान समय में उपलब्ध हैं। विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 65

शल्य चिकित्सा

अनेक प्रकार के घास, लकड़ी, पत्थर, धूलिकण, धातु (लोहा आदि), मिट्टी, हड्डी, केश, नख, पूय, आश्राव, मूढ़गर्भ आदि शारीरिक तथा आगन्तुक शल्यों के निकालने के लिये यंत्र, शस्त्र, क्षार-कर्म, अग्नि-कर्म के प्रयोग के लिये विविध प्रकार के व्रणों का विनिश्रय करने के लिये यह शल्य नामक आयुर्वेदाज् प्रवृत्त होता है। इसे ही शल्य तन्त्र कहते हैं। शल्यतन्त्र को पाश्चात्य चिकित्सा-विज्ञान में सर्जरी (5ण्ाष्ट9) कहते हैं।

आयुर्वेद के आठों अंगों में यह प्रथम और प्रधान है, क्योंकि शारीरिक रोग उत्पन्न होने के पूर्व देव-दानवों के युद्ध में प्रह्मर जन्य व्रणों के रोपण करने और यज्ञ के कटे हुए शिर को धड़ के साथ जोड़ देने के कारण शल्य ही प्रथम अंग है।

सभी आयुर्वेदाज्ञों में समान रूप से आवश्यक होने से यंत्र, शस्त्र, क्षार और अग्नि के व्यवहार के कारण तथा शल्य-क्रिया करने से शीघ्र आराम पहुँचने के कारण शल्य सभी अंगों से अधिक वाज्छनीय है।

सबसे प्राचीन वाइूमय ऋग्वेद में भी शल्य के अनेक उदाहरण मिलते हैं। अश्विनी कुमारों ने 'सन्धान कर्म” (?4४0० $णष्टणआ५) तथा “अंग प्रत्यारोपण! (एथ्ाऋ्राधा०ाणा) का कार्य किया था। दास” द्वारा 'दीर्घतमस” ऋषि के सिर और छाती को काट दिये जाने पर अश्विनी कुमारों ने उसके अंगों का सन्धान किया था।

वाल्मीकि रामायण में इन्द्र के अण्डकोष के गिर जाने पर भेड़ के अण्डकोष के प्रत्यारोपण का उल्लेख है।? ग्रन्थ

संहिता ग्रन्धों में 'सुश्रुत संहिता” सर्व-प्रधान ग्रन्थ है। इस संहिता में व्रणागार व्यवस्था, व्रणों के प्रकार, उनकी चिकित्सा के साठ उपक्रम, आठ प्रकार के शस्त्र-कर्म, यंत्र-शास्त्रों के प्रकार, जोंक लगाने, क्षार-प्रयोग, अग्नि-कर्म एवं सिरावेध आदि का विशद्‌ वर्णन किया गया है।

सुश्रुत की विधियों के आधार पर ही आधुनिक सर्जरी का विकास हुआ है। शल्य! में 'सुश्रुत संहिता” का प्राचीन ग्रन्थों में अद्वितीय स्थान है। विष-चिकित्सा (अगद तन्‍्त्र) $

अगदतन्त्र सुश्रुत की दी हुई संज्ञा है। चरक ने इसे 'विषगरवैरोधिक-प्रशमन' कहा है। “अष्टाड़ संग्रह” और “अष्टाज् हृदय” में इसका नाम <दंष्ट्राचिकित्सा” है। सर्प, कीट, लूता आदि से डंसे हुए, अनेक प्रकार के स्वाभाविक कृत्रिम एवं संयोग विष से ग्रस्त मनुष्यों के निदान तथा चिकित्सा के लिये जो अंग होता है, उसे “अगद-तन्त्र” या. विष-चिकित्सा” कहते हैं--“अगदतंत्र नाम-सर्पकीटलूता- मूषिकादि दष्ट विषव्यज्जनार्थ विविध विषसंयोगोपशमनार्थ च'- सुश्रुत।

प्राचीन काल से ही राजाओं और सम्पतिशाली व्यक्तियों का जीवन बहुमूल्य “माना जाता है और शत्रु और दुष्ट जनों से उनके जीवन का संकट सदैव आशंकित

66 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

रहा है। जरा-चिकित्सा:- इससे सम्बन्धित सामग्री आगे उद्दृत है। . पोषक स्तर पर-शतावरी, खर्जूर, दुग्ध एवं घृत।

2. अग्नि -वर्धक रसायन-पिप्पली। 3. स्रोतो --शोधक रसायन-गुग्गुल, रसौत, कस्तूरी .आंदि। रसायन औषधियों की कार्य-विधि

. रसादि धातुगत परिवर्तन-धातुवृद्धि जनक।

2. व्याधि क्षमत्वगत परिवर्तन-व्याधि प्रतिषेधक या निवारक | 3. अन्तः स्राव (हार्मोन) गत परिवर्तन-शक्तिदायक।

सभी संहिताओं में रसायन का प्रकरण मिलता है। चरक, सुश्रुत. आदि में दिव्य औषधियों का इस कार्य में प्रयोग है। ऋग्वेद में जो सोम का वर्णन है वही आगे चलकर पूरे रसायन का प्रतीक बना। वाजीकरण चिकित्सा

क्षीण पौरुष, अल्पवीर्य एवं सन्‍्तानोत्पत्ति में असमर्थ पुरुषों को वीर्यवानू, पौरुष-सम्पन्न एवं सन्‍्तान के उत्पन्न करने में समर्थ बनाने वाला यह अंग है।

“बाज: शुक्र सोञ्स्यास्तीति वाजी”

अर्थात्‌ वाज का अर्थ शुक्र या वीर्य है, अतः जिसके पास शुक्र है वह वाजी

है तंदनुसार जिसके पास शुक्र नहीं है, वह अवाजी है। “अवाजी वाजी क्रियते अनेन इति वाजीकरणम्‌”।

अर्थात्‌ जिस क्रिया से अवाजी को वाजी किया जाता है, उसे वाजीकंरण कहते हैं। वाजि शब्द का एक अर्थ घोड़ा होता है, तदनुसार वाजीकरण उस युक्ति या क्रिया कां नाम है, जिसके द्वारा पुरुष घोड़े के समान अप्रतिहत सामर्थ्य युक्त होकर स्त्रीगमन में समर्थ होता है।

अल्पवीर्य, दुष्ट-वीर्य, क्षीण-वीर्य एवं शुष्क वीर्य जनों में आप्यायन (वीर्य-पुष्टि), प्रसादन (वीर्य-शोधन), उपचय (वीर्य वृद्धि) और शुक्रजनन (वीर्योत्पादन) करने के लिये जो आयुर्वेदाह् है उसे 'वाजीकरण” कहते हैं।*

सुश्रुतानुसार वाजीकरण के तीन लक्ष्य हैं-

]. स्त्री में प्रीति उत्पन्न करना।

2. सन्तानोत्पत्ति।

3.. सद्यः कामतृप्ति -

कुचमार तन्‍्त्र, अनज्गरज्ञ, वात्सायन, कामसूत्र एवं पंचसायक इस विषय के प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। लोलिम्बराज ने सरस भाषा में कुछ योगों का वर्णन किया है:

चतुर्य परिच्छेद आयुर्वेद का साहित्य-विभाजन . संहिता काल- 5 से 6 शती

विषयावतरणं-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन

प्राचीन संहिताओं के मध्य आत्रेय-सम्प्रदाय में अग्निविश आदि ने तथा धान्वन्तर सम्प्रदाय में सुश्रुत आदि ने अपनी-अपनी संहिताओं का निर्माण किया। यहीं से वस्तुतः संहिता ग्रन्थों की रचना प्रारम्भ होती है। इसके पूर्व ब्रह्म-संहिता, धान्वन्तर संहिता तथा भास्कर संहिता के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है किन्तु यह विवेचन परवर्ती सन्तति को प्राप्त हुआ, उसे ही संहिता की संज्ञा दी गयी। विषय के समस्त अंग जिसमें समाहित हो उसे संहिता कहते हैं। ऐसी एक संहिता के ही पढ़ने से समस्त विषय का बोध हो जाता है, इसके लिये फिर किसी अन्य ग्रंथ की आवश्यकता नहीं पड़ती-। यद्यपि सम्प्रदाय विशेष की संहिताओं में विशिष्ट अंग का प्राधान्य होता है यथा आत्रेय-सम्प्रदाय विशेष की संहिता में काय-चिकित्सा और धान्वन्तर संप्रदाय की संहिताओं में शल्य तंत्र की प्रधानता देखी जाती है। विशिष्ट प्रतिपाद्य विषय के अतिरिक्त अन्य विषयों का. वर्णन उतर. तंत्र में किया जाता है।

प्रारम्भिक काल में आयुर्वेद की अनेक संहिताओं की रचना विभिन्‍न महर्षियों द्वारा हुई जिनके अस्तित्व का ज्ञान परवर्ती ग्रंथों में उपलब्ध उद्धरणों द्वारा होता है। इस समय यह संहिताएँ “तंत्र” के नाम से प्रसिद्ध थीं। तंत्र शब्द विस्तारशीलता एवं रक्षा का द्योतक है। जिसमें विषयों का वर्णन संक्षिप्त हो किन्तु भविष्य में इनके विस्तार की सम्भावना हो तथा जिसमें समस्त विषय अपने रूप में सुरक्षित रहे वह “तन्त्र” है। संहिता की अपेक्षा “तंत्र” का रूप संक्षिप्त होता है। अग्निवेश की रचना मूलतः अग्निवेश तंत्र थी जो चरक द्वारा उपबूंहित एवं प्रति संस्कृत होकर चरक संहिता के रूप में प्रसिद्ध हुई।

संहिता ग्रन्थों की रचना वर्तमान काल तक चली आयी है, यद्यपि उसके समानान्‍्तर विशिष्ट विषयों पर भी ग्रंथ निबद्ध होते आये हैं। समास एवं व्यास की शैली पर ग्रंथों का निर्माण प्राचीन काल से होता रहा है। वेदों में समाहित सूत्र रूप ज्ञान को व्यास ने विस्तृत रूप दिया। ज्योतिष आदि शास्त्रों में भी “वृहत्संहिता? आदि संहिताओं की रचना हुई। इन संहिताओं का काल क्रम से विवेचन इस प्रकार है- प्राचीन काल

प्राचीन संहिताओं में चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, भेल संहिता तथा काश्यप संहिता सम्प्रति उपलब्ध हैं। प्रथम दो संहिताएँ पूर्णरूप में तथा अन्य दो संहिताएँ खण्डित रूप में मिलती हैं। हारीत संहिता का भी एक ग्रंथ प्रकाशित है जिसकी मौलिकता संदिग्ध है। इनके अतिरिक्त वाग्भट की रचनाएँ अष्टांग-संग्रह तथा अष्टांग-हदय भी संहिताओं में मानी जाती हैं। इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है- चरक-संहिता

68 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

“*चरक संहिता” आत्रेय संप्रदाय का प्रमुख आकर ग्रंथ माना जाता है जिसमें काय-चिकित्सा का मुख्य रूप से प्रतिपादन हुआ है। जिस समय आधुनिक चिकित्सा विज्ञान शैशवावस्था में था उस समय “चरक संहिता” में प्रतिपादित आयुर्वेदीय सिद्धान्तों की गरिमा एवं गंभीरता से सारा विषय विस्मित एवं प्रभावित था। आधुनिक काल में चिकित्सा विज्ञान के विख्यात आचार्य प्रोफेसर ऑसलर इस ग्रंथ से इतना प्रभावित थे कि चरक के नाम पर उन्होंने न्यूयार्क (अमेरिका) में 'चरक क्लब” की स्थापना 898 ईस्वी में की ।" जहाँ चरक का एक चित्र रखा गया।

आयुर्वेद की वृहत्त्यी में 'चरक संहिता' मूर्धन्य मानी जाती है। मध्य-काल में श्री हर्ष ने 'नैषधीय चरित” में चरक का निर्देश किया है। वाग्भट ने भी चरक को प्रथम स्थान दिया है तथा भेल आदि संहिताओं की तुलना में अधिक उपादेय ठहराया है। 8वीं 9वीं शती में पहले फारसी फिर अरबी में इसका अनुवाद हुआ जिसका उपयोग भारतीयेतर विद्वानों ने किया।

“चरक संहिता” में काल के विषय में यह कहा जा सकता है कि-

. 'चरक संहिता” के निर्माण के तीन स्तर हैं-अग्निवेश, चरक और दृढ़बल। 2. मूल तंत्रकार अग्निविश का काल 000 ईस्वी पूर्व है।

3. प्रति संस्कर्तता चरक शुझ् काल या मौर्य-शुज्ञकाल की सन्धिरेखा पर रखे जा सकते हैं। इनका काल दूसरी या तीसरी शती ईस्सी पूर्व है।

4. दृढ़बल गुप्तकालीन है। इसका काल चौथी शती है। इसके द्वारा 'चरक संहिता! का अंतिम प्रतिसंस्कार हुआ।

चरक संहिता का विषय आठ स्थानों तथा कुल 20 अध्यायों में व्यवस्थित है--

4. सूत्र स्थान है 30 अध्याय। 2. निदान स्थान - अध्याय। 3. विमान स्थान - 8 अध्याय। 4. शारीर स्थान - 8 अध्यायं। 5. इन्द्रिय स्थान - 2 अध्याय। 6. चिकित्सा स्थान - 30 अध्याय। 7. कल्प स्थान - 2 अध्याय। 8. सिद्धि स्थान - 2 अध्याय।

320 अध्याय सुश्रुत संहिता

"सुश्रुत संहिता” के उपदेष्टा धन्वन्तरि हैं जिन्होंने 'सुश्रुतः प्रभृति शिष्यों को शल्य ज्ञान मूलक उपदेश दिया। .'सुश्रुत संहिता” में “धन्वन्तरि” के साथ

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन्‌ ८-69

“काशिराज-दिवोदास' शब्द प्रयुक्त होने से यह संदेह किया जाता है कि धन्वन्तरि उपंदेष्टा हैं या दिवोदास। कुंछ विद्वान धन्वन्तरि को उपदेष्टा मानते हैं और कुछ काश्रिज दिवोदास को।

दिवोदास धन्वन्तरि के उपदेशों को सुश्रुत ने अपनी संहिता में निबद्ध किया जो शल्य तंत्र का उपंजीव्य ग्रंथ बनी सुश्रुत दो कहे जाते हैं एक वृद्ध-सुश्रुत और दूसरों सुश्रुत। कहीं-कहीं सुश्रुत और वृद्ध सुश्रुत दोनों के उद्धरण एकत्र दृष्टि-गोचर होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि दिवोदास का शिष्य आध्य या वृद्ध-सुश्नुत था जिसने मूल सौश्रुत-तंत्र क़ी रचना की। यह संभवतः अग्निवेश तंत्र से पूर्व की रचना थी। उसके बाद सुश्रुत द्वितीय या सुश्रुत ने उसे प्रति संस्कृत कर नवीन रूप दिया। ;

सुश्रुत संहिता का विषय-विभाग . सूत्र स्थान . + 46 अध्याय। 2. निदान-स्थान - 6 अध्याय। $. शारीर स्थान: +- 0 अध्याय। 4. चिकित्सा स्थान- 40 अध्याय। 5. कल्प स्थान. +5.. 8 अध्याय। 420 अध्याय समय

, 'सुश्ुत-संहिता! में निर्माण के चार स्तर हैं-वृद्ध सुश्रुत, सुश्रुत, नागार्जुन एवं चन्द्रट-जिनके काले. भिन्न-भिन्न हैं। ऐसी स्थिति में यह सरलता से संमझा जा सकता है कि 'सुश्रुत संहिता” का समष्टि रूप से एक काल निश्चित करना संभव नहीं है। इस सम्बन्ध में विभिन्‍न रचना-स्तरों का काल पृथक-पृथक बतलाया जा सकता है। इसके विषय में कोई एक मत भी स्पष्ट रूप से नहीं दिया जा सकता है।

सारांश रूप में यह कहा जा सकता है कि-

. काशीराज दिवोदास ध्रन्वन्तरि तथा आद्य या वृद्ध-सुश्रुत उपनिषद्कालीन हैं। इंतका काल 000-500 ईस्वी पूर्व है।

2. सुश्रुत का काल 2 शती है। इसने मूल संहिता का प्रति संस्कार किया और उसने उत्तरतन्त्र जोड़ा। यहस्मरणीय है कि गुप्तकाल में 4-6 ई. के बीच “चरक संहिता” और "सुश्रुत संहिता” दोनों का प्रति संस्कार हुआ तथा वाग्भट की रचनाएँ भी इसी काल की हैं।

$. सुश्रुत संहिता की पुनः पाठ शुद्धि चन्द्रट (0वीं शतती) द्वारा हुई, जो एक प्रकार का प्रतिसंस्कार है। इस प्रकार वर्तमान सुंश्रुत संहिंता का काल 0वीं शी है--इसमें निम्नॉँकित चार स्तर हैं--

.वृद्ध-सुश्रुत . + - 7000-500 ईस्वी. पूर्व 2:समुँश्रुत ... ८-८ 2 शती।

70 /.वाल्मीकि रामायण -तथा आयुर्वेद

3. नागार्जुन 5वीं शती। 4. चन्द्रट कि 0वीं शती। भेल संहिता भेल (या भेड़) अग्निवेश के सहाध्यायी एवं पुनर्वसु आत्रेय के प्रमुख छः शिष्यों में थे। प्रथम ऋषि परिषद्‌ में जिन लोगों ने अपनी रचनाएँ उपस्थित कीं, उनमें भेल का नाम सर्व-प्रथम आता है।” “भेल संहिता' के उद्धरण भी अन्य तंत्रों और प्रायः सभी टठीकाओं में उपलब्ध होते हैं। 'काश्यप संहिता” में भेल का मत्त उद्धृत हुआ है।“ वाग्भट ने भी भेल आदि आर्ष-संहिताओं का संकेत किया है।* किन्तु तब तक संभवतः इनका प्रचार कम हो गया था, 'चरक' और 'सुश्रुत' इन्हीं दोनों की संहिताएँ प्रमुख हो गयी थीं। इसका कारण यह है कि चरक और सुश्रुत अपने-अपने संप्रदायों के प्रमुख एवं आबद्य ग्रन्थ थे। अन्य ग्रन्थों में प्रायः विषय का पिष्ट-पेषण होने के कारण मौलिकता का अभाव रहा जिसके कारण वे उपेक्षित होते गये। समय “भेल संहिता” के समय के विषय में निम्न तर्क प्रस्तुत हैं- . “बुद्ध” का लक्षण निर्दिष्ट होने के कारण यह ग्रंथ बुद्ध के पूर्व का नहीं हो सकता। 2. गुप्त-कालीन तथा तंत्र सम्बन्धी तथ्य अधिक प्रबल है अतः उत्तर-गुप्त-काल के पूर्व इसका समय नहीं रख सकते हैं। इस प्रकार वर्तमान ग्रन्थ लगभग 7रवीं शती का लिखा प्रतीत होता है। यदि यह मूलतः भेल का रचित हो तब भी इसका प्रति इसका संस्कार उपर्युक्त काल में अवश्य हुआ। भेल अग्निवेश के सहाध्यायी थे अतः उनका काल अग्निवेश का काल अर्थात्‌ 000 ईस्वी पूर्व होगा। हारीत संहिता हारीत पुनर्वसु आत्रेय के शिष्यों में से थे। इनके नाम से 'हारीत संहिता! प्रसिद्ध है। इसमें चरक, सुश्रुत एवं वाग्भट का उल्लेख किया गया है, अतः यह ग्रन्थ छठी शती के बाद का होना चाहिये। जतूकर्ण संहिता जतूकर्ण अग्निवेश के सहाध्यायी तथा पुनर्वसु आत्रेय के शिष्य थे, इन्होंने 'जतूकर्ण संहिता” लिखी। जतूकर्ण अग्निवेश के सहाध्यायी थे, अतः इनका काल अग्निवेश का ही काल 000 ईस्वी पूर्व है। क्षारपाणि संहिता क्षारपाणि पुनर्वसु आत्रेयं के छः प्रमुख शिष्यों में थे। इनका ग्रन्थ 'क्षारपाणि ' संहिता” था। इसके उद्धरण जेज्जट, चक्रपाणि, डल्हण आदि की व्याख्याओं में मिलते हैं। विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन 7] ढ़

पराशर संहिता

इस नाम के अनेक आचार्य विभिन्‍न शास्त्रों के रचयिता हुए हैं किन्तु पुनर्वसु आत्रेय के छः प्रमुख शिष्यों में परिगणित पराशर आयुर्वेद के आचार्य थे जिनकी रचना “'पराशर संहिता” थी। काश्यप संहिता

'वुद्ध-जीवक-तन्त्र” सम्प्रति 'काश्यप-संहिता” के नाम से प्रसिद्ध है इसमें महर्षि काश्यप उपदेष्टा हैं तथा बृद्ध जीवन ने उनके उपदेशों को ग्रन्थ रूप में निवद्धं किया। समय छठी शती ईस्वी पूर्व है। जीवक

जीवक का लिखी कोई संहिता प्राप्त नहीं होती किन्तु इनके गुणों से यह पता चलता है कि तक्षशिला विश्वविद्यालय का एक योग्यतम स्नातक होकर उन्होंने देश-विदेश में ख्याति अर्जित की। _खरनाद संहिता “वरनाड संहिता' भट्टारहरिश्चन्द्र कृत सुनी जाती है। गोडे ने इस संहिता का <ल ७४5७ “म्वों तथा व्याख्या का काल 850 ईस्वी निश्चित किया है। किन्तु दृद़वल उसके पर्व का माना है। विश्वामित्र संहिता

शिवदास ने चक्रदत्त की टीका (अर्शोधिकार) में विश्वामित्र संहिता की द्रव्य गुण सम्बन्धी उपयोगी सामग्री का उल्लेख किया है। दारूक संहिता ;

जेज्जट, चक्रपाणि आदि ने इसे उद्धृत किया है। भारद्वाज संहिता

इसके अस्तित्व का भी पता चलता है। अश्विनी कुमार संहिता इसके उद्धरण भी प्राप्त होते हैं।

पूर्वोक्त संहिताओं में 'सुश्रुत' को छोड़कर अन्य सभी संहिताएँ काय-चिकित्सा प्रधान हैं। इनके अतिरिक्त, अंग क्रम से निम्नांकित संहिताओं का अस्तित्व यत्र-तत्र उपलब्ध उनके उद्धरणों से प्रमाणित होता है :-

. शल्य . औषधेनवतन्त्र 7. भोजतन्त्र 2. औरभ्रतन्त्र 8. करवीर्य तन्त्र 3. पोष्कलावत तन्‍्त्र 9. गोपुररक्षित तन्त्र 4. वैतरजतन्त्र 0. भालुकि तन्‍्त्र

72 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

38५ 6.

वृद्धभोजतन्त्र कृतवीर्य तन्‍्त्र

2. शालाक्य

4.

छ़फ़ फ्री

विदेह तन्‍्त्र निमि तन्‍त्र

» कांकायन तन्‍त्र « गार््यतन्त्र

. गालव तन्‍त्र

« सात्यकि तन्‍त्र

3. कौमार भृत्य

[६ 2. 3.

वृद्धकश्यप संहिता कश्यप संहिता (वृद्धजीवक तन्त्र) पर्वतक तन्‍त्र

4. अगद तन्‍त्र

2 ड़. मु] 4.

वृद्धकाश्यप संहिता काश्यप संहिता सनक संहिता लाट्यायन संहिता

वाजीकरण कुचुमार तन्‍्त्र

वाग्भट

. कपिल तन्‍्त्र 2. गौतम तन्‍्त्र

7. भद्रशौनक तन्‍्त्र 8. शौनक तन्‍त्र 9. कराल तन्‍्त्र 0. चक्षुष्यतन्त्र 4. कृष्णात्रेय तन्त्र 2. कात्यायन तन्‍्त्र

4. बन्धक तलन्‍्त्र 5. हिरण्याक्ष तन्त्र 6. कुमार तन्त्र

» आलम्ब्यायन संहिता » उशनः संहिता

- बृहस्पति संहिता

.. गरुड़ संहिता

9० जा 9 कफ

इनके अतिरिक्त वाग्भट का 'अष्टाज्ञ संग्रह” एवं “अष्टाड़ हृदय भी प्राप्त होता

है।

व्याख्या काल :- 7 से 5 शताब्दी

वाग्भट प्राचीन काल का अंतिम संहिताकार था किन्तु उसने जो मार्ग बनाया उसका अनुसरण निरन्तर होता रहा। ऐसी एक संक्षिप्त संहिता की आवश्यकता सदा बनी रही जो समस्त आयुर्वेद का सार समाहित किये हो तथा वैद्यों के लिये व्यावहारिक पथ-प्रदर्शक हो। यह अवश्य है कि युग की आवश्यकता के अनुसार उसके स्वरूप में विभिन्‍नता आना स्वाभाविक था ऐसे कुछ ग्रन्थों के नाम में “संहिता” शब्द जुड़ा है और कुछ में नहीं है तथापि दोनों की प्रवृतियाँ समान हैं। इनमें से कुछ प्रमुख ग्रन्थ इस प्रकार हैं- . 'कल्याण कारक च्ज इसके लेखक '“गग्रादिव्याचार्य' हैं।

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 73

2. योग शतक इसके लेखक नागार्जुन माने जाते हैं।

3. सिद्धसार संहिता यह बीद्ध आचार्य दुर्गगुप्तात्मज रविगुप्त की रचना है।

4. वररुचि संहिता - इसके लेखक वररुचि हैं।

5. नामभर्तृतन्त्र ्डः निश्चलकर ने नागदेव तथा विजयरक्षित ने नागभर्तृतन्त्र को उद्धृत किया है।

इसके रचयिता कलहदास हैं।

यह पण्डित केशवकृत ग्रन्थ है।

इसके रचयिता दामोदरसूनु शार्डगधर कहे जाते हैं।

6. कलक (कोलह) संहिता - आयुर्वेद प्रकाश 8. शार्डगधर संहिता

4

|

9. परहित संहिता ्द्‌ इसके रचयिता श्री नाथ पण्डित थे। 0. भाव प्रकाश यह भाव-मिश्र की प्रसिद्ध रचना है। 7. योगतरंगिणी यह त्रिमल्लभट्ट की प्रसिद्ध रचना है। 2. टोडरानन्द यह टोडरमल की कृति कहा जाता है। 8. आयुर्वेद विज्ञान हे इसका प्रणयन 9वीं शती के अन्त में कविराज विनोदलाल सेन गुप्त ने किया।

व्याख्या-वाइमय

प्राचीन काल में जो आर्षतन्त्र लिखे गये वे संक्षिप्त: सूत्र-शैली में थे जिनका * कुछ विशदीकरण प्रति संस्कार के प्रसंग में हुआ जब उन्हें संहिता का रूप उपलब्ध हुआ, फिर भी सिद्धान्तों एवं व्यवहारों के और विशदीकरण की अपेक्षा थी अतः विद्वानों ने उन पर व्याख्या लिखना प्रारम्भ किया। इस प्रकार कालक्रम से संहिताओं तथा अन्य ग्रन्थों के समानान्तर व्याख्या का एक विशाल वाह्ञमय प्रस्तुत हो गया। व्याख्या काल को भी कई भागों में विभक्त किया जा सकता है यथा- प्राचीन काल

प्राचीनकाल मूलतः सर्जनात्मक प्रवृति का था अतः उसमें मूल-तन्त्र और संहिताएँ लिखी गयीं। उनके प्रतिसंस्कार भी हुए फिर भी व्याख्या का प्रारम्भ प्राचीन काल में ही हो गया था यद्यपि इन व्याख्याओं की संख्या अधिक नहीं है। जेज्जट (9वीं शती) द्वारा उद्धृत टीकाकारों को प्राचीन काल में रखना उचित है। इनका काल 7-8 ईस्वी शती रखना चाहिये। इस काल के प्रमुख व्याख्याकार निम्नांकित हैं- . भटूटारहरिश्चन्द्र

यह “चरक संहिता” की “चरक न्यास” व्याख्या के रचयिता हैं। शताब्दियों तक भटूटार की व्याख्या की विद्वत्समाज पर धाक जमी रही। उसके बाद ही जेज्जट का स्थान था। चरकीय मान्यताओं के अवबोध के लिये भट््‌टार की व्याख्या का

74 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

अवलम्ब अनिवार्य माना जाता था।# 2. स्वामिकुमार या स्वामिदास

इन्होंने 'चरक संहिता” की “चरक पडिजका' नामक व्याख्या की रचना की ।" यह व्याख्या भटूटारहरिश्चन्द्र कृत *चरकन्यास' की अनुगामिनी है।" स्वामि कुमार का काल 77वीं शती है। 3. आषाढ वर्मा _

इन्हें जेज्जट, चक्रपाणि और निश्चलकर ने उद्धृत किया है। इन्होंने चरक संहिता पंर 'परिहार-वार्तिक” नामक टीका लिखी। 4. हिमदत्त

इन्होंने “चरक-संहिता” एवं “अष्टाइ् हृदय” पर टीका लिखी, किन्तु इनकी टीकाएँ शीघ्र ही लुप्त हो गयीं। 5. क्षीरस्वामिदत्त

इन्होंने “चरक वार्तिक' की रचना की है।

इस युग में और भी अनेक व्याख्याकार हुए हैं जिनका नामोल्लेख एवं कृति

निम्नवत्‌ हैं-

6. पतंजलि गा “चरक वार्तिक', 'सिद्धान्त-सारावली!

7. शिव-सैन्धव - यह “चरक'” के टीकाकार थे।

8. वैष्णव न" यह “चरक' के टीकाकार थे।

9. चेल्लदेव - यह “चरक' के टीकाकार थे।

0. सुवीर इन्होंने 'सुश्रुत-संहिता” पर टीका लिखी,

7. नन्‍्दी गा इन्होंने 'चरक' तथा 'सुश्रु”' पर टीका लिखी, इनकी “योगसार संग्रह' भी रचना है।

१2. वराह जे इन्होंने भी “सुश्रुत-संहिता” पर टीका लिखी।

मध्यकाल

अधिकांश टीकाकार इसी काल में हुए अतः अनेक विद्वान मध्यकाल को संग्रह-काल या टीकाकाल कहना पसन्द करते हैं। जेज्जट (9वीं शती) से इस काल का प्रारम्भ माना जा सकता है।

इस काल के व्याख्याकारों एवं उनकी व्याख्याओं का संक्षिप्त परिचय निम्नवत्‌

है--

9वीं शती

१. जेज्जट इन्होंने 'वृहत्तरयी” की सभी संडिताओं, 'चरक संडिता', "सुश्रुत संहिता”, “अष्टांग हृदय” आदि पर टीकाएँ लिखीं।

2. सुकीर ्ड इन्होंने 'सुश्रुतः पर टीका लिखी।

3. सुधीर क्रम इन्होंने “वचरक' तथा '“सुश्रुत' पर टीका लिखी।

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 75

4. माधव

5. अमितप्रभ 6. भद्गवर्मा 0वीं शत्ती

. चन्द्रनन्दन. “८

2. चन्द्रट फ्न्क

3. भासदत्त - 4. ब्रह्मदेव ्ा

5. भीमदन्त - 6. अज्ञिरि कि १. ईश्वरसेन च्ि पार्वी शत्ती है . गयदास के 2. वाप्य (ष्प) चन्द्र-

3. नरदत्त बल

4. चक्रपाणि दत्त

- वंगदत्त . कार्तिककुण्ड . श्रीकृष्ण वैद्य . अमितप्रभ टीकाकार - » उपस्कार

9 9 >> 9 9९

इन्होंने 'प्रश्ससहस्रविधान' या 'सुश्रुतश्लोक वार्तिक' तथा 'सुश्रुत' एवं चरक पर टिप्पण किया। इन्होंने 'चरक संहिता” पर 'चरक-न्यास” लिखा। इन्होंने भी 'वरक” पर टीका लिखी।

“अष्टांग हृदय” पर “पदार्थ चन्द्रिका' नामक टीका एवं “गण-निघण्दु' की रचना की।

इन्होंने 'चिकित्सा-कलिका” पर विवृति, “योग- समुच्चय' नामक चिकित्सा ग्रन्थ, 'सुश्रुत! की पाठ शुद्धि तथा 'योग-मुष्टि” एवं 'वैद्ययोश” आदि की रचना की।

इन्होंने 'चरक” पर टीका लिखी।

इन्होंने 'चरक' एवं "सुश्रुत' पर टीका लिखी। 'सुश्रुत' की टीका 'गूढ़पदभंग टिप्पण” नामक थी।

यह “चरक' के व्याख्याकार थे।

यह “चरक' के व्याख्याकार थे।

इन्होंने 'वरक' तथा “अष्टांग हृदय” पर टीका लिखी।

इन्होंने 'सुश्रुत-संहिता' पर “न्याय चंद्रिका” तथा “चरक संहिता” पर “'चरक चन्द्रिका' नामक टीका लिखी।

इन्होंने 'वृहत्वयी” पर टीका, (ाष्पचन्द्रतक' की रचना तथा एक निघण्डु की भी रचना की है। इन्होंने 'बृहतन्त्रप्रदी/ नामक “'चरक' की टीका लिखी।

इन्होंने 'चरक” पर “आयुर्वेद दीपिका! नामक तथा "सुश्रुत' पर 'भानुमती” टीका लिखी। “चक्रदत्त' एवं द्रव्य गुण संग्रह', 'शब्दचन्द्रिका', व्याकरण तत्व चंद्रिका', व्यग्रदरिद्रशुभंकर” तथा 'सर्वसारसंग्रह” की भी रचना की।

इन्होंने 'सुश्रुत-ःसंहिता” पर टीका लिखी।

इन्होंने 'सुश्रुत-संहिता” पर टीका लिखी।

इन्होंने 'वचरक भाष्य'” की रचना की।

इन्होंने 'अमितप्रभ” नामक ग्रन्थ की रचना की। इन्होंने 'सुश्रुत' की व्याख्या की।

76 » वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

॥2वीं शत्ती

3. भास्कर ह्न इन्होंने 'सुश्रुत-पञ्जिका' की रचना की।

2. डल्हण - “सुश्रुत-संहिता” पर डल्हण की “निबन्ध संग्रह' व्याख्या है।

3. गदाधर इन्होंने 'सुश्रुत-संहिता” पर टीका लिखी।

4. ईशानदेव. - इनकी “चरक संहिता” प्रसिद्ध है।

5. गुणाकर - वैद्यगुणाकर ने चरक पर कोई वृत्ति लिखी है।

6. ध्रुवषाद यह योगशतक की चन्द्रकला व्याख्या का कर्त्ता है।

7. जिनदास - इन्होंने *चरक-व्याख्या” लिखी। इसके अतिरिक्त

“जाम्बस्वामिचरित', 'कल्पभाष्यचूर्णि', 'कर्मदण्डी' आदि इनकी रचनाएँ हैं।

8. गोवर्धन (दत्त) - इन्होंने “बृहत्तन्त्र-प्रदीप" की टीका लिखी। इसके अतिरिक्त 'रत्न माला', 'न्यास-सारावली' “परिभाषावली', 'चिकित्सालेश” आदि की रचना की

9. मैत्रेय - इन्होंने 'चरक” पर टीका लिखी।

0. रामदेव - इन्होंने 'सुश्रुत-संहिता” पर टीका लिखी।

. नागदेव इन्होंने चरक' पर टीका लिखी।

2. भव्यदत्त गा इन्होंने 'वरक” पर टीका लिखी।

33. बकुलकर_ - इन्होंने 'वरक' तथा 'सुश्रुत' की व्याख्या तथा

“सरोच्चय” नामक ग्रन्थ की रचना की।

4. सनातन “योग-शतक' पर इनकी वल्लभ टीका है।

5. विजयरक्षित - इन्होंने माधवकृत रुगृविनिश्वय की टीका लिखी।

6. श्री कंठ दव - वृन्दमाधव पर इनकी व्याख्या “कुसुमावली' प्रसिद्ध है।

7. वृन्दकुण्ड.. - इन्होंने 'चरक' पर “वृन्दटीका” तथा “वृन्दरभाधव” पर “वृन्द टिप्पण” लिखा।

3वीं शताब्दी

. अरुणदत्त ध् इन्होंने “अष्टांग हृदय” पर 'सर्वाक्ञ सुन्दरी टीका! तथा *सुश्रुत!” पर भी टीका की रचना की।

2. इन्दु इन्होंने “अष्टांग संग्रह” पर 'शशि लेखा व्याख्या! लिखी तथा “अष्टांग-संग्रह” की भी टीका लिखी।

3. निश्वलकर_ - चक्रदत्त पर इन्होंने विस्तृत व्याख्या रत्न-प्रभा' नामक लिखी है।

4. हैमाद्वि “अष्टांग हृदय” की आयुर्वेद रसायन, मुक्ताफल तथा

हरिलीला पर आयुर्वेद टीका तथा 'चतुर्वर्गचिन्तामणि' विषयावतरण-संस्क्रृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवचन / 77

की रचना की।

5. वोपदेव इन्होंने 'शार्डगधर संहिता” पर तथा अपने पिता केशव के 'सिद्धि-मंत्र” पर 'प्रकाश-व्याख्या' तथा स्वरचित “शतश्लोकी” पर “चन्द्रकला व्याख्या” लिखी। इनके अनुसार इन्होंने व्याकरण में 0, आयुर्वेद में 9, ज्योतिष में [, साहित्य में 3 तथा भागवद्‌ में 5 ग्रन्थ लिखे। इन्होंने “हदय दीपकः नामक निषण्दु

रत्न लिखा। 6. आशाधर - इन्होंने 'अष्टांग हृदय” पर “अष्टांग हृदयोद्योत' नामक टीका लिखी। 4वीं शत्ती 3. आठमलल . - इन्होंने शार्डगधर पर “दीपिका-टीका” लिखी है। 2. वाचस्पति +- यह “माधव-निदान” पर “आतंक दर्पण” व्याख्या के रचयिता हैं। 75वीं शत्ती

. शिवदास सेन-यह चरक-संहिता की “तत्व-प्रदीपिका” व्याख्या के रचयिता हैं इस व्याख्या के अतिरिक्त उनकी अन्य भी रचनाएँ हैं- . चक्रदत की तत्वचन्द्रिका व्याख्या। 2. चक्रपाणि कृत द्रव्य-गुण संग्रह की व्याख्या। 3. अष्टांग-संग्रह की तत्वबोध व्याख्या। 4. भव्यदत्त कृत योग रत्नाकर . की टीका। -विवृति कालः-6 से आधुनिक काल तक +7वीं शत्ती :.. काशीराम वैद्य. - इन्होंने 'शार्डगधर संहिता” पर 'गूढ़ार्थदीपिका' व्याख्या लिखी।

2. नरसिंह कविराज - इन्होंने मधुकोष के आधार पर माधवनिदान की एक महत्वपूर्ण व्याख्या 'रोग विनिश्चयविन्थरण सिद्धान्त चिंतामणि” नाम से लिखी चरक पर भी इनकी टीका “चरक तत्व प्रकाश कौस्तुभ” है। इन्होंने 'मधुमती” नामक एक अन्य ग्रन्थ की भी रचना की है।

3. रुद्रभटूट - इन्होंने 'शार्डगधर संहिता” पर “आयुर्वेद दीपिका” या “गूढान्त दीपिका” टीका तथा लोलिम्बराज कृत वैद्य जीवन पर दीपिका टीका लिखी।

8वीं शत्ती

. रामसेन - सेन्द्र सार संग्रह” तथा 'रसेन्द्र चिंतामणि' पर टीका लिखी।

78 » वाल्मीकि ग़मायण तथा आयुर्वेद

9वीं शती

. गंगाधर राय - “चरक संहिता” पर इनकी “जल्पकल्पतरु' व्याख्या विद्वतापूर्ण है।

20वीं शत्ती

. हाराणचन्द्र चक्रवर्ती - इन्होंने 'सुश्रुत संहिता” पर "सुश्रुतार्थ संदीपन” भाष्य लिखा।

2. योगीन्द्र नाथ सेन - “चरक संहिता” पर इन्होंने 'चरकोपस्कार' नामक सुबोध व्याख्या लिखी।

3. ज्योतिष चन्द्र सरस्वती- इन्होंने 'चरक-प्रदीपिका” नाम से 'चरक' की टीका लिखी।

4. दतराम चौबे - “निषण्टु रत्नाकर' जैसे बृहतू ग्रन्थ की रचना की।

' जयदेव विद्यालंकार - इन्होंने 'चरक संहिता” पर टीका लिखी तथा 'चिकित्सा

कलिका' तथा “भैषज्य रत्नावली” की भी इन्होंने हिन्दी टीका लिखी।

6. अत्रिदेव विद्यालंकार_ -

7. राम प्रसाद शर्मा ग्ि

8. भाष्कर गोविन्द घाणेकर -

इन्होंने चरक, सुश्रुत एवं वाग्भट सभी पर हिन्दी टीका लिखी। संपूर्ण अष्टांग संग्रह पर भी इन्होंने हिन्दी टीका लिखी।

आपने “चरक संहिता” एवं 'अष्टांग संग्रह” पर हिन्दी टीका लिखी।

"सुश्रुत संहिता” पर आपने टीका लिखी तथा “औपसर्गिक रोग', 'स्वास्थ्य विज्ञान' आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की।

9. दतात्रेय अनन्त कुलकर्णी- 0. लालचन्द्र वैद्य

. काशीनाथ शास्त्री... -

इन्होंने 'रसरत्न समुच्चय” पर टीका लिखी। इन्होंने “अष्टांग हृदय”, 'भाव प्रकाश” तथा “अष्टांग संग्रह” पर विवेचनात्मक व्याख्या हिन्दी में लिखी

इन्होंने “चरक-संहिता” पर टीका लिखी है।

इस प्रकार संक्षेप में आयुर्वेद का साहित्य विभाजन प्रस्तुत किया गया। इसके आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन काल से अब आधुनिक काल तक आयुर्वेद साहित्य मैं विविध ग्रन्थों का सृजन एवं अध्ययन कार्य हुआ है तथा वर्तमान समय में भी यह प्रगति की ओर अग्रसर है।

पंचम परिच्छेद

वाल्मीकि रामायण के समक्ष विद्यमान आयुर्वेद साहित्य

विषयावतरण-संस्क्रृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 79

वाल्मीकि रामायण--संस्कृत का आदि महाकाव्य है, संपूर्ण काव्य इसके बाद की ही कृति है। रामायण से पूर्व वेदों एवं उपनिषदों आदि का होना पाया जाता है। इन्हीं वेदों में बहुत सी आयुर्वेदिक सामग्री उपलब्ध होती है जिसे रामायण के समक्ष माना जा सकता है। संक्षेप में इसका विवरण प्रस्तुत है--

वेदों में देवता वाद है। प्रत्येक सूक्त का कोई कोई देवता होता है। जिस सूक्त में जिस देवता की प्रार्थना हो वह उसका देवता होता है। इस प्रकार से अग्नि, अप्‌ आदि देवताओं के समान रुद्र, इन्द्र आदि देवता हैं, उनके ही साथ अश्विनी भी देवता हैं। अश्विनौ का मुख्य सम्बन्ध चिकित्सा के साथ है। अश्विनौ ने वैदिक देवताओं की चिकित्सा की थी।! ऋग्वेद में आयुर्वेद

ऋग्वेद सर्वप्रथम माना जाता है अतः इसमें आयु से सम्बन्धित मंत्रों का होना अनिवार्य है। ऋग्वेद में कई ऐसे प्रसंग हैं जो आयुर्वेद की ओर संकेत करते हैं यथा-

एक मंत्र में पुरोहित अपने स्वामी की पत्नी की टाँग कट जाने पर लोहे की टाँग के लिये अश्विनौ से प्रार्थना करता है। वह पक्षी के समान हल्की टाँग चलने के लिए माँगता है-“वपस्ला की टाँग युद्ध में कट गई है, इसलिये तुम जल्दी आकर रात्रि में ही पक्षी के पर के समान हल्की टाँग चलने के लिये लगा दो ।* आँखों का दान

ऋजाश्व को उसके पिता वृषगिरि ने शाप से अन्धा बना दिया था, क्योंकि उसने वृक्क के लिये एक सौ भेड़ों को दिया था। इस ऋजाश्व को अश्विनौ ने पुनः आँखें प्रदान की थीं क्योंकि अश्विनौ ही वृक्क के रूप में थे।४ च्यवन ऋषि को पुनः युवा करना इसका उल्लेख भी क्ग्वेद में है ।“ दिव्य वैद्य

वेद में वैद्य का लक्षण बताते हुए कहा गया है-. संपूर्ण औषधियों को अपने पास ठीक रखने वाला। 2. विशेष प्रबुद्ध-अपने शास्त्र का पूर्ण, सांगोपांगज्ञाता। 3. युक्ति और योजना को जानने वाला। 4. राक्षसों का नाश करने में समर्थ और 5. रोगों को जड़ से उखाड़ सके-ये पाँच लक्षण वैद्य के हैं-

“यत्रौषधिः समग्मत राजानः समितामिव। विप्रः उच्यते भिषग्‌ रक्षोहाभीवचातनः ।?

औषधि-चिकित्सा

वनस्पति या औषधियों के प्रयोग से रोग दूर होते हैं। वेद में औषधि के लिये माता शब्द आता है ।” औषधि के लिये इसमें एक सम्पूर्ण सूक्त है। थोड़े से अंश प्रस्तुत हैं।* औषधियों से रोग-नाश

वीर्यवती औषधियों के सेवन से रोग के बीजों का नाश होता है।”

80 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

रोगों का नाश

विभिन्‍न रोगों के नाश के लिये भी मंत्र हैं।''

इनके अतिरिक्त ऋग्वेद में जल चिकित्सा” प्रसूति सम्बन्धी ज्ञान” सौर चिकित्सा» वायु चिकित्सा“ मानस चिकित्सा” एवं हवन चिकित्सा” आदि का भी उल्लेख मिलता है। यजुर्वेद में आयुर्वेद

यजुर्वेद के दो भाग हैं-एक तैत्तरीय शाखा और दूसरी वाजसनेयी शाखा। इनका सम्बन्ध मुख्यतः कर्मकाण्ड से है, इसलिये शरीर के अंगों के नामों का उल्लेख शतपथ-ब्राह्मण में मिलता है। यजुर्वेद के वर्ण्य-वेषय का ज्ञान एक मात्र वाजसनेयी संहिता के अध्ययन से हो सकता है। इस संहिता में 40 अध्याय हैं।

यजुर्वेद में प्राप्त आयुर्वेदिक तत्व निम्नवत्‌ हैं- औषधि-सूक्त

यजुर्वेद में औषधियों के लिये बहुत से मंत्र आये हैं, इनसे स्पष्ट है कि औषधियों का उपयोग यज्ञकर्म तथा स्वास्थ्य के लिये विशेष होता था। औषधियों से नाना प्रकार की प्रार्थना की गयी है ।” वेद में औषधियों की माता को “ष्कृतिः (सर्वेषां रुग्णानां निष्करत्री) सब रोगों को निकालने वाली कहकर प्रार्थना की गयी है। 'हे औषधियों! तुम भी मेरे रोगों को निकालो ।९*

औषधियाँ कहती हैं कि आकाश द्यु-लोक से आती हुई हम जिस व्यक्ति के पास पहुँच जाती हैं, वह किसी तरह भी नष्ट नहीं होता ।* दिव्य वैद्य

जो रोगों को जड़ से नष्ट करता है, राक्षसों को मारता है, वह वेद में दिव्य भिषक कहा गया है- “कम होने वाले सदा बढ़ने वाले रोग बीजों को नष्ट-भ्रष्ट करने वाला और सब राक्षसों को नीचे की ओर से निकालने वाला है, वह उपदेशक पहला दिव्य वैद्य है ।* अथव॑वेद में आयुर्वेद

अथव॑वेद में आयुर्वेद का विषय विस्तार से आया है। अथर्ववेद का सम्बन्ध ही आयुर्वेद उपाज़ से है-

अधर्ववेद में आये हुए आयुर्वेद सम्बन्धी विषयों की सूची निम्नलिखित है जिससे चिकित्सा विषयक सूक्तों की विस्तृत जानकारी मिल जाती है- अज्जन 7/30/36; अपामार्ग-4/7, 4/8, 4/9, अपांभेषज /4,5,6 6/23, 24, अक्षिरोग भेषज 6/6, आंजन 4/9, 9/45, आप /88 3/3, 7/39, 9/2, 69, आस्राव की औषधि-2/3, औषधि 7/8, 6/59, कुष्ठौषधि 6/95, केशवृंहण 6/36, केशवर्धन 6/87, केशवर्धनी औषधि 6/2।, गर्भसंस्राव 20/96, -6, पिप्पली भैषज्य 6/09, पृश्निपर्णीमैषज्य 6/22, 52, 83, 9/44, रोहिणी वनस्पति 4/2, लाक्षा 5/5, वनस्पति 8/8, वाजीकरण 4/4, विष मैषज्य 7/56,

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 8।

सौभाग्यवर्धन 6/89। रोगादि निवारण

इषुनिष्कासन 6/90, उनमत्तता मोचन 6/], कासशमन 6/05, कुष्ठत्तम्भ नाशन 5/4, कृष्ठनाशन 9/39, क्लीवत्व नाशन 6/38, गर्भबृंहण 6/7, गर्भदोष निवारण 8-6, गण्डमाला चिकित्सा 7/74-76, चिकित्सा 6/96, जल चिकित्सा 6/57, ज्वर नाशन /25, 7/6, तकम नाशन 5/22, दुस्वप्न नाशन 20/96 आदि अन्य भी विविध रोग। कृमि नाशन

कृमिष्न 5/23, कृमि जम्भन 2/37, कृमि नाशन 2/32, 4/37। विष नाशन

विषघ्न 4/6, विष दूषण 6/00, विष नाशन 4/7, सर्पविष दूरीकरण 0/4, सर्प विष नाशन 5/3, 7/88, सर्प विष निवारण 6/2, साँपों से रक्षा 6/56। अरिष्ट नाशन

अरिष्ट क्षपण 6/27, 28, 29, 80, अलक्ष्मी नाशन /8, असुर क्षपण 6/7, 9/66, ईर्ष्या विनाशन 6/8, 7/45 आदि।

इस प्रकार आयुर्वेद से सम्बन्धित विषयों का अथर्ववेद में विस्तार से वर्णन होने के कारण आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद कहा गया है। अथर्ववेद के विभिन्‍न नाम

. अथर्ववेद। 2. आंगिरस वेद। 3. अथर्वाज्िसिस वेद। 4. ब्रह्मवेद। 5. भृग्वाज्िरोवेद 6. क्षत्रवेद 7. भैषज्यवेद | 8. छन्दोवेद | 9. महीवेद। भैषज्य वेद

इसमें आयुर्वेद, चिकित्सा, औषधियों आदि का बहुत वर्णन है, इसलिये इसे “भैषज्य वेद” कहते हैं अथर्ववेद में इसे 'भेषजा” कहते हैं। अधर्ववेद में काण्डों के अनुसार प्रतिपाद्य-विषय संक्षेप में इस प्रकार है- काण्ड -- विविध रोगों की निवृत्ति, पाश-मोचन, रक्षो-नाशन, गर्भ-प्राप्ति। काण्ड -2- रोग, शत्रु एवं कृमिनाशन दीर्घायुष्य। काण्ड -3- ब्रह्म विद्या, विष-नाशन। काण्ड -4- ब्रह्म विद्या, कृत्या-परिहार। काण्ड -5- दुःस्वप्न नाशन, अन्न समृद्धि आदि।

अथर्ववेद में उस समय प्रचलित रीति-रिवाज, प्रधाएँ, मान्यताएँ यहाँ तक कि अंध-विश्वास, रूढ़ियों, जादू-टोने, कृत्या-प्रयोग, अभिचार कर्म, सम्मोहन, वशीकरण, ताबीज, जड़ी-बूटी आदि का विस्तृत उल्लेख है। आयुर्वेद

शरीर के अंग (2-88-] से 7, 20-96-7 से 29) रोगों के नाम (9-8) औषेध-चिकित्सा एवं जल-चिकित्सा (4-4-5) ज्वर, यक्ष्मा, खाँसी, कुष्ठ, हृदय रोग,

82 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

क्षेत्रीय रोगों की चिकित्सा (-2, 2-8, -23) आदि।

इस प्रकार स्पष्ट है कि अथर्ववेद में सभी वेदों से अधिक आयुर्वेद की सामग्री मिलती है। अग्निपुराण में आयुर्वेद

उपयोगिता की दृष्टि से यह सबसे महत्त्वपूर्ण पुराण है। इसे विश्वकोश कहा जा सकता है। इसमें उस समय प्रचलित सभी विद्याओं का संकलन है। यह महाभारत के तुल्य संकलन ग्रंथ है। इसके लेखक ने यह प्रयत्न किया है कि इसमें सभी विषयों का समावेश किया जाये और उनका संक्षिप्त परिचय दिया जाये अतैव इसमें काव्य-शास्त्र, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष, कोशग्रंथ, धनुर्वेद, गान्धर्व वेद, अर्थ-शास्त्र, वनस्पति-शास्त्र, स्थापत्य-कला का सुन्दर वर्णन है। नाट्यशास्त्र, वैदिक-कर्म-काण्ड आदि विषयों का समावेश किया गया है। गरुण पुराण

इसमें 8 सहस्न श्लोक माने जाते हैं। इसमें पुराणों से साक्षात्‌ सम्बद्ध कोई विषय नहीं है, इसमें गणित, फलित ज्योतिष, श्राद्ध-तर्पण, व्याकरण, आयुर्वेद एवं विविध-रत्नों का वर्णन है।

इनके अतिरिक्त ब्राह्मण-य्रन्थों एवं उपनिषदों में भी आयुर्वेद के तत्व थे जो

: रामायण के समक्ष “आयुर्वेद साहित्य” के रूप में विद्यमान थे।

तत्कालीन चिंकित्सकों का सामाजिक सम्मान

रामायण में चिकित्सकों का कया स्थान है यह जानना अत्यन्त आवश्यक एवं रोचक है। आयुर्वेद के आराध्य देव भगवान धन्वन्तरि की कथा सभी धार्मिक ग्रन्थों, पुराणों में एक-सी मिलती है। वाल्मीकि रामायण में भी इसका प्रसंग उपलब्ध होता है। वाल्मीकि ने भगवान धन्वन्तरि को “आयुर्वेद-मय पुरुष” माना है। सभी ग्रन्थ उसे एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि भगवान धन्वन्तरि का अवतरण समुद्र मंथन से हुआ। ;ं

देवता एवं असुर मंदराचल पर्वत को मथानी मानकर समुद्र मंथन करने लगे “तदन्तर 000 वर्ष बीतने पर इस क्षीर सागर में से एक आयुर्वेदमय धर्मात्मा पुरुष प्रगट हुए, जिनके एक हाथ में दण्ड और दूसरे में कमण्डल था। उनका नाम धन्वन्तरि था ।”“ इस प्रकार वाल्मीकि रामायण ने भी धन्वन्तरि की उत्पति उसी प्रकार मानी है जिस प्रकार अन्द्य ग्रन्थों में मानी गयी है। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 45वें सर्ग में श्लोक संख्या 5 से 43 तक इसी प्रकार का वर्णन प्राप्त होता है।

वाल्मीकि रामायण के काल में वैद्य एवं चिकित्सकों की राजकीय एवं सामाजिक स्थिति कैसी थी? इस सम्बन्ध में अलग-अलग तो वर्णन प्राप्त नहीं

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन » 83

होता है। किन्तु वैद्य उस समय राज्य तथा समाज के एक अंग थे और यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों ही प्रकार के चिकित्सक उस समय उपलब्ध थे। कुछ विशिष्ट चिकित्सकों को राजवैद्य स्वीकार किया जाता था तथा अन्य दूसरे साधारण चिकित्सक होते थे।

सामाजिक चिकित्सकों का यद्यपि रामायण में स्पष्ट वर्णन तो नहीं मिलता परन्तु विशिष्ट चिकित्सकों के विषय में पर्याप्त संकेत रामायण में प्रकट होते हैं। देव चिकित्सकों के भी नामों का उल्लेख तथा उनके दिव्य कार्यों का संकेत भी इस ग्रंथ में प्राप्त होता है। उनके नाम आयुर्वेदीय आचार्य परम्परा के नामों से बहुत कुछ मेल खाते हैं। उदाहरणार्थ-ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, वरुण, गरुड़, शिव, विष्णु, बृहस्पति, अश्विनी-कुमार, धन्वन्तरि आदि का नाम उल्लेखनीय है। ये सभी देव-चिकित्सक के दिव्य-रूप में पाठकों के सामने आये हैं। श्री भारद्ाज का नामोल्लेख यद्यपि रामायण में प्राप्त है परन्तु वे चिकित्सक के रूप में पाठकों के सामने नहीं आये हैं।

रामायण में सभी प्रकार के चिकित्सकों का वर्णन मिलता है--काय-चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक, युद्ध-चिकित्सक, विष-चिकित्सक आदि का नाम यत्र-तत्र उपलब्ध हो सकता है। केवल चिकित्सा मात्र नहीं, राजा तथा प्रजा के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी इन चिकित्सकों की ही हुआ करती थी। विभिन्‍न चिकित्सक भिन्‍न-भिन्‍न रोगों के सिद्ध चिकित्सक हुआ करते थे और उनका सम्मान राजा द्वारा यथोचित रूप से किया जाता था। यह सत्य है कि समाज में तथा राज्य सभा में चिकित्सकों का सम्मान-पूर्ण स्थान था। राजा के दैनिक कार्यों, खान-पान आदि में भी उनका हस्तक्षेप रहता था। राजा तथा उनके कुल के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी चिकित्सकों की ही थी।

रघुकुल में राजा दिलीप से लेकर श्रीराम तक सभी राजा अपनी राज्य सभा में चिकित्सकों को स्थान देते थे तथा उन्हें विभिन्‍न प्रकार से सम्मानित कर सन्तुष्ट कियो जाता था। एक स्थान पर इस प्रसंग का उल्लेख इस प्रकार है-कैकयी जब कोप भवन में रुगण बनकर बेहोश पड़ी थी तब राजा दशरथ ने उसके उस भवन में प्रवेश किया। रानी की यह स्थिति देखकर राजा ने उसे विभिन्‍न प्रकार से मधुर वचनों द्वारा आश्वासित किया और उसे स्वस्थ होने की प्रेरणा दी। साथ ही राजा ने उसे यह वचन कहे-“भामिनी! तुम अपना रोग बताओ। मेरे यहाँ बहुत कुशल वैद्य या चिकित्सक हैं, जिन्हें मैंने सब प्रकार से सन्तुष्ट कर रखा है। वे तुम्हारी चिकित्सा कर तुम्हें सुखी बना देंगे॥*

उक्त प्रसंग में यह स्पष्ट है कि वैद्यों को सभी प्रकार से सन्तुष्ट करना राजा का कर्त्तव्य था और राजा तथा उसके परिवार की सब प्रकार से सेवा करना (स्वस्थ बनाना) चिकित्सक की जिम्मेदारी में था। राजा को पूर्ण-विश्वास तथा गर्व होता था इस बात के कहने में कि उसके यहाँ कुशल-चिकित्सक हैं जो उससे पूर्णतया संतुष्ट

,84./ वाल्मीकि रामायंण तथा आयुर्वेद

हैं और जो अपने चिकित्सा के दायित्व में सिद्ध हस्त हैं।

अयोध्या राज्य में चिकित्सकों का कुछ दायित्व सामाजिक भी था। यह बात एक प्रसंग में स्पष्ट उल्लिखित है। श्री राम के वन गमन के बाद जब भरत अयोध्या में आये तो राम को देखकर बहुत उद्विग्न हुए अन्त में उन्होंने राम को वन में जाकर लौटा लाने का निश्चय किया। वैद्यों ने उस समय अपने सामाजिक दायित्व को पहचाना और भरत के साथ उन्होंने वन यात्रा की। यह रामायण में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है-“वैद्या धूप का” अर्थात्‌ भरत की वन यात्रा में उनके साथ अन्य सभी चलने वालों में वैद्य भी थे। भरत के इस यात्रा में चलने वालों में वैद्यों का उल्लेख वैद्यों के सामाजिक सम्मान तथा उनके सामाजिक दायित्व की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं। वैद्य समाज के सम्मानित प्राणी थे तथा राजा द्वारा मान्यता प्राप्त भी थे।

राजा श्री राम के मन में चिकित्सकों के प्रति कितना दायित्व था इसके लिये निम्न उद्धरण हम यहाँ उद्धरित कर देना उपयुक्त समझते हैं। जब भरत श्री राम को लौटा लाने के लिये उनके पास गये तो श्री राम ने भरत से मिलते ही सर्व प्रथम निम्न प्रश्न किये-“तात्‌! क्‍या तुम देवों, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिता के समान आदरणीय वृद्धों, वैद्यों, ब्राह्मणों का सम्मान करते हो ?”*

“राघव! क्या तुम देवों, वृद्ध पुरुषों, बालकों प्रधान-प्रधान वैद्यों का आन्तरिक अनुराग, मधुर वचन और धन-दान इन तीनों के द्वारा सम्मान करते हो ?”«

श्री राम द्वारा पूछे गये उपरोक्त प्रश्नों से यह स्पष्ट है कि राज्य में वैद्यों का सम्मान था, प्रत्येक राजकीय कार्य में उन्हें याद किया जाता था। समारोहों में तथा यों भी राजा द्वारा आंतरिक अनुराग, मधुरालाप तथा धन प्राप्त होता रहता था। इन सभी से वे तुष्ट होकर हमेशा राजा तथा जनता की सेवा करते रहते थे। ये चिकित्सक सभी प्रकार के चिकित्सक थे और विशेष प्रकार की चिकित्साओं में सिद्ध हस्त थे।

सीता की खोज के लिये वानरराज सुग्रीव ने दसों दिशाओं में वानरों को भेजा तब जो वर्णन उन्होंने वानरों के सामने दिया है उससे यह स्पष्ट होता है कि वे शल्य-चिकित्सक तथा वनौषधि विशेषज्ञ थे। उन्हें इस कला का व्यवहार प्राप्त था और हर प्रकार की वनस्पतियों का उन्हें ज्ञान था। अमुक औषधि तथा फल विषैले हैं, उनका प्रयोग या स्पर्श करना यह निर्देश उन्होंने वानरों को दिये हैं। शल्यकर्षण प्रदेश का वर्णन करते हुए उन्होंने यह बताया है कि वहाँ शरीर में प्रविष्ट शल्य को निकालने के लिये सहायक औषधि पैदा होती है। महाराज सुग्रीव का यह सार्व-भौम ज्ञान उनके चिकित्सक होने का स्पष्ट संकेत करता है।

रामायण में स्पष्ट है कि उक्त उच्चतम चिकित्सकों के अतिरिक्त रनिवास में भी ऐसी महिलाएँ रहा करती थीं, जिन्हें देह के सामान्य परीक्षण का ज्ञान हुआ करता था। राजा दशरथ का अवसान हो चुका था, अयोध्या में अन्य कोई

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 85

राजकुमार नहीं था, ऐसी स्थिति में वहाँ रनिवास की स्त्रियों ने राजा दशरथ की शरीर परीक्षा की और उन्हें मृत घाषत किया। राजा में जीवन के कोई चिन्ह उन्होंने नहीं देखे ।' उन्होंने फिर देखा--“राजा का शरीर चेष्टा शून्य था, हृदय तथा हाथ के मूल भाग में संचालित होने वाली नाड़ी की परीक्षा करके वे कॉँप उठीं। उन्होंने समझ लिया कि नृप शांत हो गये /”'" इस प्रकार राज-महल में ऐसी ज्ञान-वान स्त्रियों के होने का संकेत भी यथा स्थान प्राप्त होता है।

उपरोक्त संचित प्रसंगों से यह स्पष्ट है कि वाल्मीकीय रामायण काल में वैद्यों की सामाजिक तथा राजकीय स्थिति पूर्णतः सम्माननीय तथा उन्‍नत थी और वे भी अपने दायित्व को भली प्रकार से निभाते रहते थे।

“वैद्य! और “'भिषक्‌” शब्दों की व्याख्या वैद्य

वविद्या अस्ति अस्य-विद्या + अणु” यह “वैद्य शब्द की व्युत्पत्ति है।'

“वैद्य की आयुर्वेद के विविध संहिताकारों ने पृथक्‌-पृथक्‌ व्याख्या एवं गुण बताये हैं यथा-अष्टांग संग्रह के अनुसार-“रोग के कारण, रोग के लक्षण, रोग की चिकित्सा, रोग की पुनः उत्पति हो, इन चार का जिसे ज्ञान हो, वह राजा के योग्य चिकित्सक है।”” चरक संहिता के अनुसार

“शास्त्र को अच्छी तरह से जानने वाला, दूरदर्शी, क्रिया में कुशल, शुद्धता यह वैद्य के चार गुण हैं।? सुश्रुत संहिता के अनुसार

जो वैद्य शास्त्र और प्रत्यक्ष ज्ञान को भली-भाँति जानता है और साथ-साथ मतिमान भी है वही सुचिकित्सा रूपी अर्थ के साधन में समर्थ हो सकता है जैसे दोनों पहियों वाला रथ युद्ध में कार्य करने में समर्थ होता है।”*

इन संहिताओं के आधार पर वैद्य के गुणों को कहा जा सकता है कि “वैद्य वही हो सकता है जो विधि-पूर्वक शास्त्रों का ज्ञाता, शुभ-अशुभ का ज्ञाता एवं चिकित्सा कार्य में निपुण हो भिषक्‌

“बिभेत्यस्मात्‌ रोग: भी + घुक्‌ हस्वाश्च'-यह “भिषक्‌' शब्द की व्युलत्ति है।

'भिषक्‌' शब्द की भी आयुर्वेद में बहुत से संहिता ग्रन्थों में भिन्‍न-भिन्‍न परिभाषा एवं गुण बताये गये हैं यथा-अष्टांगसंग्रह के अनुसार “अभेद्य/ (अपने प्रतिवादी धूर्त आदि को भेद दे अर्थात्‌ जिसका कोई भेद पा सके), अनुद्धतः (गम्भीर), स्तब्ध (चिरकारी-सोच-विचार कर कार्य करने वाला), ज्ञात-ग्रन्थः (शास्त्र को जानने वाला), अर्थ-शास्त्रवित्‌ (शास्त्र के कर्म को जानता हो), शास्त्रर्थज्ञ (चिकित्सतज्ञ), अनाथान रोगिणो (निरुपाय रोगियों को), पुत्र के समान सम्यक्‌ उपचार करता हो, गुरु ने जिसको चिकित्सा कार्य करने की आज्ञा दे दी हो वह

86 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

“भिषक्‌' शब्द को प्राप्त करता है।*

चरक संहिता के अनुसार-“जिस वैद्य ने शास्त्र और उसके मर्म को समझा हो, औषध और औषध के प्रयोग को जाना हो तथा चिकित्सा कर्म को अच्छी तरह से देख लिया हो वह गुण चतुष्ट्य युक्त भिषक्‌ प्राणों को देने वाला कहा जाता है 23 रामायण में वैद्य शब्द का प्रयोग

रामायण में ही चिकित्सक के लिये संभवत: “वैद्य” शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किया गया है। इसके पूर्व संपूर्ण वैदिक साहित्य अथवा वेदों में चिकित्सक के लिये भिषक्‌ शब्द का प्रयोग हुआ है। कहा गया है-“निशाचर ! जो ज्येष्ठ होने के कारण राज्य पाकर सबयमें प्रधान हो गया हो, राज्य कार्य को अच्छी तरह चला रहा हो और विद्वान (वैद्य), धर्मशील तथा शूरवीर हो उसे भी कूटुम्बी जन अपमानित करते हैं तथा अवसर पाकर उसे नीचा दिखाने की भी चेष्टा करते हैं 7०

वाल्मीकि रामायण में सभी प्रकार के चिकित्सकों का उल्लेख प्राप्त होता है। इसमें युद्ध चिकित्सक का विशेष महत्वपूर्ण स्थान बताया गया है। युद्ध चिकित्सकों का स्थान युद्ध के समय महत्त्वपूर्ण होता है, जिस सेना के साथ युद्ध चिकित्सक हों, कहना चाहिये कि वह सेना युद्ध करने के योग्य नहीं रह सकती। रामायण में भी कुछ ऐसे व्यक्ति थे जो योद्धा होने के साथ-साथ युद्ध चिकित्सक भी थे। क्षत्राणी होने के नाते माता 'कौशल्या' को भी ज्ञान था कि युद्ध में या आकस्मिक आधघात के पश्चात्‌ कौन सी दिव्य औषधि उपादेय होती है। संभव है यह ज्ञान उन्हें राजा दशरथ के द्वारा या राजकीय अन्य सफल चिकित्सकों के द्वारा ही प्राप्त हुआ हो। अपने पुत्र श्री राम के वन गमन के समय उन्होंने उनके लिये हृदय से मंगल कामना व्यक्त की। उस विशाल लोचना माता ने पुत्र के मस्तक पर अक्षत, चंदन एवं रोली लगायी तथा सिद्ध करने वाली विशल्य-करणी नामक शुभ औषधि लेकर अपने पुत्र की रक्षा के उद्देश्य से मंत्र पढ़ते हुए उसको श्री राम के हाथ में बाँध दिया ।” फिर उसके गुणों में उत्कर्ष लाने के लिये मंत्र का जप भी किया ।*

मुनि विश्वामित्र ने भी राम को बला तथा अतिबला नाम के प्रसिद्ध मंत्र प्रदान किये ।* ये मंत्र भी राम को श्रम ज्वर तथा रूप विक्ृति आदि से बचाने वाला बताया गया है।

श्री राम स्वयं भी अनेक सिद्ध औषधियों से परिचित थे। उन्हें भी यह जानकारी संभव है, मुनि अगस्त्य के आश्रम पर पहुँचकर श्री राम ने नई कुटी बनाने की आज्ञा देते हुए अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहा-“सुमित्रा कुमार! हम गज-कंद का गूदा लेकर उसी से पर्णशाला के अधिष्ठाता देव की पूजा करेंगे। छोटे भाई ने वैसा ही किया। श्री राम ने पुनः उसे पकाने के लिये कहा” लक्ष्मण ने उसे पकाया। रक्त-विकार का नाश करने वाले गजकंद को भली-भाँति पका जानकर लक्ष्मण ने कहा-यह काले छिलकों वाला गज-कंद जो बिगड़े हुए सभी

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 87

अंगों को टीक करने वाला है, मेरे द्वारा पका दिया गया ।” इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मण: भी कुशल चिकित्सक थे।

इसके अतिरिक्त वानरराज सुषेण, क्रक्षराज जाम्वान, हनुमान आदि सभी कुशल चिकित्सक थे।

रामायण में विष-चिकित्सक गरुड़ का भी उल्लेख प्राप्त होता है, एक प्रसंग दृष्टव्य है 'महान चिकित्सक गरुड़ द्वारा स्पर्श होते ही श्री राम तथा लक्ष्मण के घाव भर गये और उनके शरीर तत्काल ही सुन्दर कांति युक्त हो गये /* उनमें तेज, बल, उत्साह, वीर्य, ओज, दृष्टि शक्ति, बुद्धि एवं स्मरण-शक्ति आदि महान गुण पहले से भी द्विगणित हो गये।*

इस प्रकार उपरोक्त प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि रामायण में 'वैद्य' शब्द का ही उल्लेख अनेक स्थलों पर प्राप्त होता है तथा सभी प्रकार के चिकित्सकों का वर्णन भी इसमें यत्र-तत्र विविध संदभों में प्राप्त होता है।

संस्कृत साहित्य की विशाल राशि को एक स्थल पर प्रस्तुत करना तथा रामायण का सामान्य परिचय यथा रामायण उपजीव्य काव्य है, रामायण आदि काव्य है, रामायण के विविध संस्करण, आकार, विषयवस्तु, उत्पत्ति, प्रक्षिप्तांश, रचनाकाल, रामायण का महाकाव्यत्व, रामायणकालीन समाज एवं संस्कृति, व्याख्याएँ एवं शोध-कार्य में प्रयुक्त संस्करणों आदि का संक्षेप में परिचय देना, एवं साहित्यिक ग्रन्थों का आयुर्वेदिक दृष्टि से महत्त्व एवं विविध शोध-कार्यों में उनका प्रयोग, इसके अतिरिक्त आयुर्वेद का सामान्य परिचय देना, आयुर्वेद के साहित्य विभाजन का परिचय तथा रामायण काल में उपलब्ध आयुर्वेदिक साहित्य का संक्षिप्त परिचय देना ही परिवर्त का मुख्य विषय है।

संदर्भ- . अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः वाचें चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ।। सु. 30/7

2. संस्कृत साहित्य का वृहत्‌ इतिहास (डा. राजवंश सहाय हीरा) पृ. सं. 5 3. वही पृ. सं. 6 4. भारतीय संस्कृति-पृ. 40 5. अर. 605 6. कि६. 37/4 7. अयो. 50/33 8. अर. 49/36 9. बा. 2/2

0. बा. 2/]2

॥]. बा. 2/2 88 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

2. अर. 49/36 5. ताः स्म प्रतिगृहणन्ति सर्वे ते देवदानवाः। अप्रतिग्रहणादेव ता वै साधारणाः स्मृता:।। बा. 45/35 4. चतुर्णामाश्रमाणां हि गाह॑स्थ्य॑ श्रेष्ठमुत्तममू आहुर्धर्मज्ञ धर्मज्ञास्तं कथ॑ त्यक्तुमिच्छसि ।। अयो. 06/22।। -5. दीयमानं तु तदा प्रतिजग्राह राघवः। अविज्ञाय पितुश्ठन्दमयोध्याधिपतेः प्रभोः।॥ अयो. 8/5 ।। 46. प्रतिगृह्मतु तां पूजां वसिष्ठाद्‌ राजसत्तमः। तपोड॑ग्निहोत्रशिष्येषु कुशल॑ पर्यपृच्छत्‌ ।। बा. 52/4।। 7. शन्रुघ्नश्चापि रामस्य ववन्दे चरणौ रुदनू। तावुभौ समालिंगय रामीः्प्यश्रूण्यवर्तयत्‌ ।। अयो. 99/40 8. विनद्यसमुहानादं श्रमेणोपरताः स्त्रियः। निर्घोषोपरंत तात मन्‍्ये राजनिवेशनम्‌ ।। अयो. 5/3॥। 9. इमां दुःस्वप्न गतिं निशम्य हि, त्वनेकरूपामवितर्कितां पुरा। भयं महत्त हृदयान्न याति मे विचिन्त्य राजानमचिन्त्यंदर्शनम्‌ ।। अयो. 69/2] ।। 20. वाष्योमैरेयपूर्णाश्चमृष्टमांसच्यरवृता: प्रतप्तपिठरैश्चापि मार्गमायूर कौक्कुटैः ।। अयो. 9/70।। - इत्येव॑ रममाणानां देवनामिव ननन्‍्दने। भरद्वाजाश्रमे रम्ये सा रात्रिव्यव्यवर्तत ।। अयो. 9/8 ।। 22. अनुशिष्टोउस्भ्ययोध्यायां गुरुमध्ये महात्मना। पित्रा दशरथेनाहं नावज्ञेयं हि तद्चः।। बा. 26/3।। 23. (अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः। वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्‌ ।। सु. 30/7॥ 24. अथ वर्ष सहश्रेण आयुर्वेदमयः पुमान्‌ - बा. 45/3-32 उदृतिष्ठत्‌ सुधर्मात्मा सदण्ड: सकमण्डलु: ।। पूर्व धन्वन्तरिनाम अप्सराश्च सुवर्चसं ।। बा. 45/32 शशिप्रकाश वंदना वरकुण्डल भूषणा:। अम्लानमाल्याभरणा ददर्श हरियूथपः ।। स. 0/3 ।। 26. तस्यायुषो पुण्यतमो वेदों वेदविदां मतः। वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम्‌ ।। च.स. /48 |। 27. क. इह खल्वायुर्वेदमष्टाइ्नमुपाज्मथर्ववेदस्य सु.सू., /6॥ ख. भिषजा पृष्टेनैवं चतुर्णा...... मात्मनोष्थर्ववेदे भक्तिरादेश्या। च.सू. 30/2॥ ।। ग. क॑ वेदं श्रयति, अथर्ववेदमित्याह। (का.वि. /) घ. आयुषः पालन वेदमुपवेदमथर्वण: (अष्टांग संग्रह) 28. ......एवमेव खुल वेदनासु......आयुर्वेदमेवानुधावन्ति, तस्माद्‌ ब्रूमः- विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन / 89

25.

छँ

ऋग्वेद-यजुर्वेद-सामाथर्ववेदेभ्यः पञ्‌चमोज्यमायुर्वेदः (का.वि.) 29. ऋग्यजुः सामाथववख्यानू दृष्ट्वा वेदान्‌ प्रजापतिः। विचिन्त्य तेषामर्थ आयुर्वेद चकार सः।। कृत्वा तु पंचम वेदं भास्कराय ददौ पुनः।। (ब्रह्म वैवर्त /6/9-0) 30. (अथातो वेदोत्पत्ति मध्याय॑ व्याख्यास्याम:। (सु.स. /) 3. (सु. सू. /6) 32. सु. सू. ॥/7 33. काय चिकित्सा नाम सर्वाक्‍्सश्रितानां व्याधीनां ज्वर-रक्त-पित्त-शोषोन्मादापस्मार कुष्ठातिसारादीनामुपशमनार्थम्‌ सु.सू. ]/3 34. सु. सूं. /8-2॥ 35. सु.सू, /8/ 36. बा. 49/6-0 37. लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम्‌। च.चि. /व 38. रसायनतन्त्रं नाम वयः स्थापनमायुर्मेधावलकरं रोगापहरण समर्थ च। सु.सू. 39. अस्य प्रयोगाच्व्यवनः सुवृद्धोउ्भूत्‌ पुनर्युवा। अ.स.उ. 59 40. “वाजीकंरणतन्त्रं नामाल्पदुष्टक्षीण विशुष्करेतसाम्‌ आप्यायन ,प्रसादो पचयजनननिमित्तं प्रहर्षजननार्थम्‌ सु.सू..” वाजीवातिबलो येन याप्यप्रतिहतो स्त्रियः भवत्यतिप्रियः स्त्रीणां वाजीकरणमेव तत्‌।। येन नारीषु सामर्थ्य वाजिवल्लभते नरः। ब्रजेच्चाभ्यधिक॑ येन वाजीकरणमेवतत्‌ ।। च. थि. 2 4. वाी6 एक 0ए७ ५४४५ ९४४७॥5॥20 वा 898 गा )२९७ १०7 ७9५ शाला- छछा5 ०06 ग्रास्वांटब] छाणिड्आंणा ग्राक्चिर्ज॑2त लग, का 0व0 #ञा5- णांस्बे 459०९5 0ाल्तालार, 5 ८8०१ शीलः (श्र, बण07 0 0665॥ छतक्‍ाला(। ज़ाद वातव॑शा प्राश्वीथा।8.-8.2.7.. #+, 905 (आयुर्वेद का वैज्ञानिक इतिहास-प्रियव्रत शर्मा-?.)५. 737) 42. च. सू. /33 43. सिद्धि. अ.। 44. ऋषि प्रणीते प्रीतिश्चेन्‌ मुक्‍्त्वा चरक सुश्रुती। भेलाधाः कि पठयन्ते तस्मादू ग्राह्मं सुभाषितम्‌ ।।-अ. ह. उ. 40/88 ।। 45. हरिश्चन्द्रकृतां व्याख्यां विना चरक संमतम्‌। यस्तनोत्यकृत प्रज्ञः पातुमिच्छति सोडम्बुधिम्‌ ॥॥ (चन्द्रट) 46. इसकी पाण्डुलिपि राजकीय प्राच्य हस्तलिखित ग्रन्थागार मद्रास में है ।(नं.डी. 309

90 / वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद

47.

48. 49.

50. (3 मे 52. 53.

54.

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55.

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62.

63. « 'अवपतन्तीरवदन्‌ दिव ओषधयस्परि।

65.

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मुनिं हरिश्वन्द्रमृषिं विपश्चिताम्‌ प्रकाशितार्थ कथन चकार यः। तस्यादूभुतार्था श्रुतिमप्रमादतः परीक्ष्य कुर्मश्चरकस्य पड्जिकाम्‌ ।। (सभी संदर्भ आयु. का वैज्ञा.इ.-प्रियव्रतशर्मा-पे. नं. 224)

च. चि. /4/44

“चरित्र हि वेरिवाच्छेदि पर्णमाजा खेलस्य परितक्म्यायाम्‌।

स॒द्यो जंघामायसी विष्पलायै धनेहि ते सर््तवि प्रत्यधत्तम्‌ ।। (ऋ, /76/5)'

ऋ. 7/6/6

ऋ. 7८775

“ओषधी रीति मातरस्तद्धो देवीरूपब्रुवे / ऋ. 0/97/4

या ओषधी: पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।

मनै नु बभूणामहं शर्त धामानि सप्त च।। ऋ. 0/97/

ओषधीरिति मातरस्तद्धो देवीरूपब्रुवे।

सनेयमश्वं गां वास आत्मानं तव पुरुषे।। ऋ. 0/97/4,

ओषधय:ः संवदन्ते सोमेन सह राजा।

यस्मै कृणोति ब्राहमणस्त राजन्‌ पारयामसि।। ऋ. 0/9/22)

“यदिमा बाजयन्नहमोषधीर्हस्तं आदघे।

आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीव गृभो यथा ।। ऋ. 0/97/0!

अक्षीभ्यां ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां चुबुकादधि।

यक्ष्मं शीर्षण्यं मस्तिष्काज्जिहाया विवृहामिते ।। ऋ. 0/64/,

ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो अनूक्याजत्‌।

यक्ष्मं दोषाण्य मंसाभ्यां बाहुभ्यां विवृह्ठमिते।। ऋ. ./64/2,

अज्जे-अड्ढे लोम्नि-लोम्नि यस्ते पर्वणि पर्वणि।

यक्ष्मं त्वचस्यं तव य॑ कश्यपस्य विवर्हेण विष्वंज्व विवृहमसि ।।

ऊरुभ्यां ते अष्ठीवदुभ्यां पाष्यिभ्यां प्रपदाभ्याम्‌।

यक्ष्मं भसघं श्रोणिभ्यां भासद॑ भंससो विवृहामि ते।। अथर्वेद 2/33/5 रु (सभी संदर्भ आ. का बृ.इ. -अत्रिदेव विद्यालंकार-पेज नं. 2-25 से साभार

ऋ., ]0/37/6

. ऋ. 0/62/-4 58. 59. 60. 6.

ऋ., २/33/, 4/5/ ऋ. 0/37/2

ऋ. 0/37/7

अर्थर्व, 30/

वा.सं. 2/75-79, 89, 95 यजु. 2/88

यं जीवमश्नवामहै रिष्यति पुरुष: ।। यजु. 2/97 यज. 46/5

विषयावतरण-संस्कृत साहित्य एवं आयुर्वेद विवेचन 9]

66. अथः वर्ष सहस्नेण आयुर्वेदमयः पुमान्‌ ।। उदृतिष्ठतू सुधर्मात्मा सदण्ड:ः सकमण्डलुः "पूर्व धन्‍्वन्तरिनाम अपस्राश्च सुवर्चसः।। बा. 45/3, 32।। 67. सन्ति मे कुशला वैद्या स्त्वत्वभितुष्टाश्च सर्वशः। सुखिनां त्वां करिष्यन्ति व्याधियाचस्व भामिनी ।। अयो. 0/30॥। 68. कश्चिद्‌ देवान्‌ पितृन्‌ भृत्यान्‌ गुरुन्‌ पितृसमानपि। वृद्धांश्व तात वैद्यांश्च ब्राह्मणश्चापि मन्‍य से ।। अयो. 00/3। 69. कश्चिद्‌ वृद्धाश्व बालकाश्च वैद्यान्‌ मुखाश्च राघवः। दानेन मनसा वाचात्रिभिरेतै बुभूषसे ।। अयो. 00/60 70. अथाप्युचितवत्रास्ता विनयेन नयेन च। नाह्यस्य शयन स्पृष्ट्वा किचिदप्युपलेभिरे ।। अयो. 65/3 |। पर. ता: स्त्रियः स्वप्नशीलज्ञाश्वेष्टां संचलनादिषु। ता वेपथुपरीताश्च राज्ञः प्राणेषु शडकिता:। अयो. 65/4 ।। '. हेतौ लिंगे प्रशमने रोगाणामपुनर्भवे ।। ज्ञानं चतुर्विधं यस्य राजाहों भिषक्तमः।। अ.सं.सू. 2/2.5 ।। 73. श्रुतेपर्य्यवदातृत्वंबहुशोदृष्ट कर्मता दाक्ष्यंशीचमितिज्ञे यंवैद्ये गुणचतुष्टयम्‌ ।। च.सं.सू. 9/4॥। 74. यस्तूभयज्ञों मतिमान्‌ समर्थोज्र्थताधने। आहवे कर्म निर्वोढुं द्विचक्रः स्यन्दनों यथा।। सु.सं.सू. 3/53 ।। 75. अभेद्योष्नुद्धतः स्तब्धः सूनृतः प्रियदर्शनः ।। बहुश्रुतः कालवेदी ज्ञात ग्रन्थोषर्थ शास्त्रवित्‌। अनाथान्‌ रोगिणोयश्च पुत्रवत्समुपाचरेत्‌ ।। गुरुणा समनुज्ञातः भिषक्‌शब्दमश्नुते। अ.सं.सू. 2४8, 9 76. तस्माच्छास्त्रेरर्थ विज्ञाने प्रवृत्त कर्म-दर्शने। भिषक्‌ चतुष्टयेयुक्त: प्राणाभिसर उच्यते ।। च.सं.सू, 9/6॥। 77. प्रधानं साधक वैद्यं धर्मशीलं राक्षसः। ज्ञातयो हामन्यन्ते शूरं परिभवन्ति